लाल साड़ी से सैकड़ों लोगों की जान बचाई ओमवती ने

बहादुरी, देशहित और जनकल्याण की भावना के लिए किसी डिग्री की जरूरत नहीं पड़ती। कभी कभी ऐसा भी होता है कि कोई इंसान बिना किसी खास शिक्षा के, गाहे बगाहे वो कर जाता है जो पढ़े लिखे इंसान भी नहीं करते। उत्तर प्रदेश एटा डिस्ट्रिक्ट, आवागढ़ ब्लॉक के गुलेरिया गांव में  एक पैंसठ वर्ष की ग्रामीण स्त्री अपने घर से खेत की तरफ जा रही थी। रेल पटरियों के बगल से चलते चलते जब वो डिस्ट्रिक्ट हेडक्वार्टर से बीस किलोमिटर दूर,  कुस्बा रेल्वे स्टेशन के पास पहुंची तो अचानक उसने देखा कि रेल की पटरी एक जगह बुरी तरह टूटी पड़ी है। वो चौंक गई, उसे पता था कि इस लाइन पर से यात्रियों से भरी कई बड़ी गाड़ियां गुजरती है।

दूर से उसे एक गाड़ी तेजी से आती हुई भी दिखाई दे रही थी। आसपास कोई नहीं था। वो तुरंत सोचने लगी कि कैसे वो उस गाड़ी के ड्राईवर को सचेत करे और गाड़ी रोक ले। अचानक उसे एक उपाय सूझा, उसने अपनी लाल साड़ी उतारी और पटरी पर खड़े होकर जोर जोर से लहराने लगी। लेकिन उसे वहाँ से हटना पड़ा क्योंकि तेजी से गाड़ी नज़दीक आती जा रही थी।

उस महिला ने अपनी बुद्धि और बहादुरी का इस्तमाल करते हुए पास की झाड़ियों से एक बड़ी टहनी तोड़ी और उसे पटरी पर अटकाते हुए उसपर अपनी लाल साड़ी को फैला दिया। उधर एटा से तुंडला जाने वाली पैसेंजर ट्रेन के ड्राईवर ने जब पटरी पर लाल कपड़ा बँधा देखा तो समझ गया कि कुछ गड़बड़ है। उसने तुरंत ब्रेक लगा दिया। जब गाड़ी रुकी, तो उसने देखा कि पटरी टूटी पड़ी है।

ड्राईवर ने अपने सिनिअर्स को ख़बर भेजी और रेल्वे की पूरी टीम वहां आ गई। पटरी की मरम्मत एक घंटे में हो गई और तब जाकर पैसेंजर्स से भरी हुई गाड़ी आगे बढ़ी। वहां उपस्थित रेल्वे की टीम ने उस ग्रामीण महिला को कुछ रुपये पुरस्कार स्वरूप देना चाहा लेकिन महिला ने इंकार करते हुए कहा कि उसने सिर्फ मानवता का धर्म पूरा किया है,  उसके लिए यही सबसे बड़ा पुरस्कार है कि सैकड़ों इंसानो की जान वो बचा सकी।

उस सीधी, सादी ग्रामीण महिला का नाम है ओमवती और उसे बचपन से ही ये पता था कि लाल रंग खतरे की निशानी होती है, इसलिए उसने अपनी लाल साड़ी को उतार कर ड्राइवर को खतरे का सिग्नल दिया था। उसकी एक सोच और हिम्मत ने सैकड़ों लोगों की जान बचाई।

– सुलेना मजुमदार अरोरा