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रिया और अमन सुंदरपुर गाँव में रहते थे, जहाँ माता-पिता के गुजर जाने के बाद रिया ने अपने छोटे भाई अमन की जिम्मेदारी उठाई।
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रिया का सपना था कि वह डॉक्टर बने, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उसने अपनी पढ़ाई छोड़कर अमन की पढ़ाई जारी रखने का निर्णय लिया।
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उसने सिलाई-कढ़ाई का काम शुरू किया और अपनी कमाई से अमन की फीस और किताबों का खर्चा उठाया, जबकि अमन ने पढ़ाई में उत्कृष्टता हासिल की।
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अमन ने शहर के सबसे बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला लिया और रिया ने अपनी माँ के कंगन बेचकर उसकी फीस भरी।
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अमन ने गाँव में बिजली लाने का प्रोजेक्ट शुरू किया और अपनी सफलता के लिए रिया को श्रेय दिया।
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एक दिन अमन को रिया की पुरानी किताबें और डायरी मिलीं,
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जिससे उसे रिया के बलिदान का पता चला।
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अमन ने अपनी पहली तनख्वाह से रिया का दाखिला एक ओपन यूनिवर्सिटी में कराया ताकि रिया का सपना पूरा हो सके।
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कहानी का नैतिक संदेश यह है कि सच्चा प्यार निस्वार्थ होता है
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और परिवार के लिए किया गया त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।
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