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सुंदरपुर गाँव की कहानी में एक शरारती बंदर मोंटू की गलती की वजह से भोले-भाले बकरे भोलू को 'बलि का बकरा' बनने की नौबत आ गई थी।
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रामू काका की पत्नी ने ताज़ा मक्खन निकाला था, जिसे मोंटू ने चुरा लिया और गलती से हांडी गिराकर तोड़ दी, जिससे मक्खन ज़मीन पर फैल गया।
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मोंटू ने अपनी शरारत छिपाने के लिए मक्खन भोलू के मुँह पर लगा दिया, ताकि रामू काका उसे दोषी समझें।
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रामू काका जब रसोई में टूटे हांडी और फैले मक्खन को देख गुस्सा हो गए, तो उन्होंने भोलू को दोषी मानकर उसे सजा देने की ठान ली।
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काका का वफादार कुत्ता शेरू, जिसने मोंटू की शरारत देखी थी, भौंक कर काका का ध्यान खिड़की के बाहर मिट्टी में बंदर के पंजों के निशान की ओर खींचा।
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निशान देखकर रामू काका को असली चोर का पता चला और उन्होंने भोलू को निर्दोष पाया, जिससे भोलू को सजा से बचा लिया गया।
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मोंटू की शरारत का पर्दाफाश होने पर रामू काका ने उसे सबक सिखाने की कोशिश की,
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जिससे मोंटू डरकर जंगल की ओर भाग गया।
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कहानी की सीख है कि बिना परखे किसी पर इल्जाम नहीं लगाना चाहिए
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और सच की हमेशा जीत होती है, जैसा शेरू ने साबित किया।
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