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मधुबन नामक जंगल में एक रहस्यमयी बुखार फैल गया, जिससे सभी जानवर परेशान हो गए और राजा भानु शेर ने अस्पताल खोलने का फैसला किया।
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मोंटू बंदर, जो शहर में डॉक्टरी का थोड़ा ज्ञान रखता था, ने अस्पताल बनाने में पहल की और पूरे जंगल से चंदा इकट्ठा किया गया जिससे 'संजीवनी अस्पताल' तैयार हो गया।
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प्रारंभ में, डॉक्टर मोंटू ने मेहनत से काम किया और मरीज़ों को ठीक किया। लेकिन धीरे-धीरे उसके मन में लालच पैदा हो गया और उसने सरकारी दवाइयाँ कालवन के अमीर जानवरों को बेचनी शुरू कर दीं।
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मोंटू के दोस्त गोलू भालू ने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन लालच में अंधे मोंटू ने उसकी सलाह को नजरअंदाज कर दिया और अपनी बेईमानी जारी रखी।
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जंगल के जानवरों ने दवाइयों की कमी की शिकायत राजा भानु शेर से की, जिन्होंने चालाक लोमड़ी चंपा को मामले की जाँच का कार्य सौंपा।
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चंपा लोमड़ी ने मोंटू की जासूसी की और उसे रंगे हाथों पकड़ने के लिए एक योजना बनाई,
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जिसमें वह अमीर सेठानी का भेष बनाकर मोंटू को फंसाने पहुँची।
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मोंटू ने लालच में आकर सारी दवाइयाँ चंपा को देने का निर्णय लिया, लेकिन राजा भानु शेर और उनके सिपाही उसे पकड़ने के लिए पहले से तैयार थे।
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मोंटू की बेईमानी उजागर होने पर उसे जंगल से बाहर निकाल दिया गया और उसकी सारी कमाई अस्पताल के फंड में जमा कर दी गई।
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इस कहानी से यह सीख मिलती है कि लालच और बेईमानी का अंत हमेशा बुरा होता है, और ईमानदारी सबसे बड़ी नीति है।
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