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कहानी "चतुर चैतन्य और लाल मोर" में एक बुद्धिमान सलाहकार चैतन्य और चापलूस मंत्री दुर्जन सिंह के बीच के द्वंद्व को दर्शाया गया है।
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चित्रमयी राज्य के राजा महाराज महेंद्र को दुर्लभ वस्तुओं का शौक था, और दुर्जन सिंह अपनी चापलूसी से उन्हें प्रभावित करने की कोशिश करता था।
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दुर्जन सिंह ने एक साधारण मोर को लाल रंग से रंगवाकर उसे जादुई पक्षी 'अग्नि-मयूर' के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे राजा ने उसे इनाम देने की घोषणा की।
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चैतन्य ने मोर की अस्वाभाविकता और उससे आ रही गंध के आधार पर उसे नकली बताया और राजा को सलाह दी कि मोर को स्नान कराया जाए।
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चैतन्य की योजना के अनुसार, मोर के ऊपर गुलाब जल के साथ नींबू का रस और तेल छिड़का गया, जिससे उसका लाल रंग उतर गया।
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मोर के असली रंग उजागर होने पर राजा महेंद्र ने दुर्जन सिंह को दंडित किया और चैतन्य को इनाम दिया।
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चैतन्य ने अपने इनाम को राज्य के अकाल पीड़ित लोगों की मदद के लिए दान कर दिया।
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कहानी से यह सीख मिलती है कि धोखा और चापलूसी से कुछ समय के लिए सफलता मिल सकती है,
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लेकिन अंत में ईमानदारी और बुद्धिमानी ही काम आती है।
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यह कहानी यह भी दर्शाती है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और झूठ का सहारा लेना हमेशा अपमान का कारण बनता है।
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