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गुलमोहर सोसाइटी के 12 वर्षीय गौरव, जिसे सब प्यार से 'गुड्डू' कहते हैं, ने अपनी जासूसी कौशल से स्कूल की ऐतिहासिक 'सिल्वर ट्रॉफी' की चोरी का रहस्य सुलझाया।
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गुड्डू हमेशा अपने जासूसी किट के साथ तैयार रहता था और मानता था कि हर अपराधी कोई न कोई सुराग छोड़ता है। उसकी जासूसी नज़र और तर्कशक्ति ने उसे इस मामले में मदद की।
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स्कूल की 'महाराणा प्रताप सिल्वर ट्रॉफी' प्रिंसिपल ऑफिस से गायब हो गई थी। पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला, लेकिन गुड्डू ने मामले को देखने की अनुमति ली।
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गुड्डू ने घटनास्थल पर कुछ अनोखे सुराग पाए: नीला रेशमी धागा, खिड़की पर कीचड़ के निशान और अलमारी पर चॉकलेट की गंध।
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गुड्डू ने अपनी डायरी में संदिग्धों की सूची बनाई और तर्क लगाया कि खिड़की से कीचड़ के निशान कैसे आए, जबकि खिड़की बंद थी।
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गुड्डू ने स्कूल के माली से बात की और पाया कि बारिश के बाद बगीचे में कीचड़ था। उसने पेड़ की टहनी पर नीला कपड़ा फंसा देखा, जो प्रिंसिपल ऑफिस की खिड़की तक पहुंचता था।
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गुड्डू ने मदारी के बंदर 'चीकू' को ट्रॉफी चुराते हुए पाया। बंदर ने चॉकलेट के लालच में खिड़की के रास्ते से ट्रॉफी चुराई थी।
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गुड्डू ने साबित कर दिया कि जासूसी के लिए अवलोकन और धैर्य की आवश्यकता होती है। उसे स्कूल का 'ऑफिसियल डिटेक्टिव' घोषित किया गया।
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कहानी की सीख है कि सफलता अवलोकन और धैर्य में छिपी होती है।
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तथ्यों को जोड़कर और तर्क का सहारा लेकर किसी भी मुश्किल पहेली को हल किया जा सकता है।
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