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'रंगीलापुर' के मशहूर जौहरी हीराचंद को एक शाही निमंत्रण मिलता है, जिसमें उन्हें महारानी के लिए नायाब हीरे के हार बनाने के लिए बुलाया जाता है।
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हीराचंद को अपनी दुकान में कीमती हीरे छोड़कर जाने की चिंता होती है, इसलिए वे अपनी बुद्धिमानी से हीरों को एक अचार की बरनी में छुपा देते हैं।
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अपने बचपन के दोस्त मक्खन लाल पर भरोसा करके, हीराचंद अचार की बरनी को उसके पास रखते हैं ताकि वह सुरक्षित रहे।
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विदेश से लौटने पर, जब हीराचंद अपनी बरनी वापस लेते हैं, तो वे पाते हैं कि हीरे गायब हैं और केवल अचार बचा है।
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मामला महाराजा गोल-मटोल के दरबार में पहुंचता है, जहां चतुर चाचा नामक बुद्धिमान सलाहकार मामले की जांच करते हैं।
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चतुर चाचा के सुझाव पर, स्वादु जी नाम के रसोइए को बुलाया जाता है, जो अचार की ताजगी की जांच करते हैं और बताते हैं कि अचार नया है।
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मक्खन लाल की चालाकी उजागर होती है जब वह कबूल करता है कि उसने लालच में आकर हीरे निकाल लिए थे और नया अचार उसमें भर दिया था।
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महाराजा मक्खन लाल को हीराचंद के हीरे लौटाने और जुर्माना भरने का आदेश देते हैं, जिससे ईमानदारी की जीत होती है।
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कहानी की सीख यह है कि लालच का फल हमेशा कड़वा होता है और सच को छिपाया नहीं जा सकता; ईमानदारी और बुद्धिमानी से किसी भी समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।
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