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एक भोला-भाला अनपढ़ किसान सोचता है कि चश्मा पहनने से वह पढ़ना सीख जाएगा, क्योंकि उसने गांव के पढ़े-लिखे लोगों को चश्मा लगाकर पढ़ते देखा था।
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किसान शहर जाकर एक चश्मे की दुकान में पहुंचता है और दुकानदार से पढ़ने के लिए एक चश्मा मांगता है।
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दुकानदार किसान को विभिन्न चश्मे दिखाता है और एक किताब भी थमाता है, लेकिन किसान को कुछ भी पढ़ाई नहीं आता।
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दुकानदार को तब पता चलता है कि किसान किताब को उल्टा पकड़कर पढ़ने की कोशिश कर रहा है।
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दुकानदार समझाता है कि चश्मा केवल आंखों की रोशनी सुधारता है,
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पढ़ना सिखाना नहीं। पढ़ाई एक कला है जो सीखनी पड़ती है।
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किसान को अपनी गलतफहमी का एहसास होता है और वह वादा करता है
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कि पहले पढ़ना सीखेगा, बाद में जरूरत पड़ने पर चश्मा लेगा।
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कहानी की सीख यह है कि उपकरण और साधन ज्ञान नहीं देते; ज्ञान मेहनत और सीखने से मिलता है।
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अज्ञानता सबसे बड़ा अंधकार है और शिक्षा इसे दूर करने की एकमात्र कुंजी है। बिना मेहनत के शॉर्टकट ढूंढना मूर्खता है।
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