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यह कहानी एक जिज्ञासु बालक आरव और उसके गुरुजी के बीच के संवाद पर आधारित है, जो ईश्वर की अनुभूति को समझने के लिए एक सरल प्रयोग का उपयोग करते हैं।
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हिमालय की तलहटी में स्थित शांतिपुर गाँव में रहने वाला आरव गुरुजी से पूछता है कि जब लोग कहते हैं "ईश्वर हर जगह हैं", तो वे दिखाई क्यों नहीं देते।
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गुरुजी आरव को नमक और पानी का प्रयोग करने के लिए कहते हैं, जिससे आरव को समझ आता है कि जैसे नमक पानी में घुलकर अदृश्य हो जाता है, वैसे ही ईश्वर भी हर जगह होते हैं लेकिन दिखाई नहीं देते।
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इस प्रयोग के माध्यम से, गुरुजी आरव को सिखाते हैं कि ईश्वर को बाहरी चीज़ों में नहीं, बल्कि अपने अनुभव और आचरण में महसूस किया जा सकता है।
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जब आरव नमक को वापस देखना चाहता है, तो गुरुजी पानी को उबालकर नमक को प्रकट करते हैं, यह दिखाने के लिए कि तप और साधना से ईश्वर की अनुभूति होती है।
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गुरुजी बताते हैं कि ईश्वर को खोजने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है; अच्छे कर्म और सत्य बोलने से ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होता है।
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कहानी का नैतिक यह है कि अनुभव और साधना से ही ईश्वर को समझा जा सकता है, और अच्छे कर्मों के माध्यम से उन्हें अपने भीतर महसूस किया जा सकता है।
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संत नामदेव का उल्लेख किया गया है, जो भक्ति आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, और उनके पद सिख धर्म के 'गुरु ग्रंथ साहिब' में शामिल हैं।
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लेखक बच्चों को यह संदेश देते हैं कि हर अच्छी सोच और नेक काम भगवान का ही रूप है,
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इसलिए हमेशा अच्छे बनें और दूसरों की मदद करें।
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