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'जैसा बोओगे वैसा काटोगे' पर आधारित यह कहानी हिमालय की वादियों में बसे गाँव 'खुशहालपुर' की है, जहाँ लल्लू नामक व्यक्ति अपनी चालाकियों के लिए मशहूर है।
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लल्लू को अपने पड़ोसी सोमनाथ काका की मेहनत और सफलता से जलन होती है। वह काका के खेत को बर्बाद करने की योजना बनाता है और वहाँ कड़वे कद्दू के बीज बो देता है।
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मौसम की मार और नौकर की गलती से वही कड़वे बीज लल्लू के अपने बगीचे में बो दिए जाते हैं, जबकि लल्लू इसे मीठे खरबूजे समझता है।
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गाँव में हर साल होने वाले 'सब्जी महोत्सव' में लल्लू अपने विशालकाय कद्दू (असल में कड़वा) को प्रस्तुत करता है, जबकि काका के उन्नत किस्म के मीठे कद्दू से राजा प्रभावित होते हैं।
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लल्लू का कद्दू चखने पर राजा के मुँह का स्वाद बिगड़ जाता है और पूरी सच्चाई सामने आ जाती है।
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सोमनाथ काका ने पहले ही लल्लू की चालाकी का पता लगा लिया था और बीजों की अदला-बदली कर दी थी।
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लल्लू को उसकी गलती का एहसास होता है और राजा उसे सजा देते हैं
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कि वह अगले छह महीने तक केवल वही कड़वे कद्दू खाएगा जो उसने उगाए हैं।
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कहानी का नैतिक संदेश यह है कि हमें दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए
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जैसा हम खुद के लिए चाहते हैं। छल-कपट का अंत कड़वा ही होता है।
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