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इस कहानी का केंद्र बिंदु 'विक्रम' है, जो आनंदपुर गाँव का एक होनहार धावक है, जिसे 'उड़न-छल्ला' के नाम से जाना जाता था। उसकी रफ़्तार और जीत की ललक ने उसे गाँव का चहेता बना दिया था।
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विक्रम की सबसे अच्छी दोस्त ममता उसे हमेशा मेहनत और विनम्रता का महत्व समझाती रहती थी, लेकिन विक्रम को अपनी जीत का इतना घमंड हो गया कि उसने अभ्यास और दोस्तों की कद्र करना बंद कर दिया।
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विक्रम के व्यवहार में बदलाव आया; उसने अपने कोच 'उस्ताद जी' की बातों को अनसुना करना शुरू कर दिया और अभ्यास में लापरवाही बरतने लगा।
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राज्य स्तरीय रेस के दौरान विक्रम ने आत्मविश्वास में चूर होकर लापरवाही दिखाई, जिससे उसका ध्यान भटक गया और वह रेस हार गया। उसकी हार का कारण उसकी लापरवाही और घमंड था, न कि उसकी रफ़्तार की कमी।
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विक्रम की हार ने उसे न केवल सबक सिखाया बल्कि उसके घमंड को भी चूर-चूर कर दिया। ममता ने उसे समझाया कि उसकी हार का असली कारण उसकी लापरवाही थी।
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विक्रम ने अपनी गलतियों को स्वीकार किया और उस्ताद जी से माफी मांगी।
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उसने समझा कि असली चैंपियन वही होता है जो विनम्रता और निरंतर अभ्यास के साथ अपनी जीत को संभाले।
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अगले साल विक्रम ने फिर से रेस में हिस्सा लिया और इस बार उसने न केवल रेस जीती बल्कि विनम्रता के साथ सुमित और अपने गुरु का सम्मान किया।
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कहानी की सीख यह है कि सफलता को पचाना उसे हासिल करने से ज्यादा कठिन है।
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घमंड और लापरवाही आपकी प्रतिभा को नष्ट कर सकते हैं, जबकि विनम्रता और निरंतर अभ्यास आपको लंबे समय तक विजेता बनाए रखते हैं।
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