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'जो जीता वही सिकंदर' की कहानी में भोलूराम नामक एक साधारण लड़का अपनी बुद्धिमानी और सूझबूझ से शहर के घमंडी तेज़ सिंह को साइकिल रेस में हराता है।
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गोलगप्पापुर के निवासी भोलूराम को तेज़ सिंह ने चुनौती दी, जो अपनी महंगी स्पोर्ट्स साइकिल पर बहुत घमंड करता था।
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रेस के दिन, भोलूराम अपनी पुरानी और फटी-पुरानी साइकिल लेकर आया, जबकि तेज़ सिंह ने अपनी चमचमाती नीली साइकिल से शुरुआत की।
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रेस के दौरान, तेज़ सिंह की साइकिल का गियर जाम हो गया, और भोलूराम ने अपनी समझदारी से आलू के पराठे का घी लगाकर उसकी मदद की।
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रास्ते में, भोलूराम ने जंगल के छोटे और फिसलन भरे रास्ते से जाने का फैसला किया, जबकि तेज़ सिंह लंबे रास्ते पर भेड़ों के झुंड में फँस गया।
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भोलूराम ने जंगल वाले रास्ते पर अपनी साइकिल के टायरों पर पुरानी बोरी लपेटकर फिसलन से बचने का उपाय किया।
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अंत में, भोलूराम ने फिनिश लाइन पार की और गोलगप्पापुर का 'सिकंदर' बन गया, जबकि तेज़ सिंह हार मानकर भोलूराम की सूझबूझ की तारीफ की।
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कहानी का निष्कर्ष यह है कि महंगे साधनों से ज्यादा महत्वपूर्ण है उनके उपयोगकर्ता का दिमाग, और सादगी और समझदारी से जीता जा सकता है।
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भोलूराम ने जीते हुए गोलगप्पे पूरे शहर के बच्चों के साथ साझा किए, जिससे यह संदेश मिला कि जीतने के बाद भी विनम्रता और उदारता बनाए रखना चाहिए।
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यह कहानी हमें सिखाती है कि संसाधनों पर घमंड नहीं करना चाहिए और सफलता उन्हीं को मिलती है जो अपनी बुद्धिमानी और नेक नीयत से लक्ष्य को प्राप्त करते हैं।
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