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'चटपटपुर' के लाला मक्खनलाल की कहानी एक हास्यप्रद पाठ है जो अति कंजूसी के दुष्परिणामों को उजागर करता है।
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लाला मक्खनलाल, जो अपनी कंजूसी के लिए मशहूर थे, ने भगवान को नारियल चढ़ाने की सोची, लेकिन नारियल के पैसे बचाने के चक्कर में उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ा।
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नारियल की कीमत में बचत के लिए लाला जी ने कई मील पैदल चलने का निर्णय लिया, जिससे उनकी सेहत पर भी असर पड़ा।
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मुफ्त का नारियल पाने की चाह में लाला मक्खनलाल ने पेड़ पर चढ़ने का जोखिम उठाया,
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जिससे वे और अन्य दो लोग पेड़ से लटक गए और अंततः गिर पड़े।
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इस दुर्घटना के बाद लाला जी को न केवल हर्जाना देना पड़ा, बल्कि उन्हें अपनी कंजूसी का बड़ा सबक भी मिला।
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इस कहानी से यह सीख मिलती है कि अत्यधिक कंजूसी और मुफ्त के लालच में इंसान अपनी समझ खो देता है, जिससे नुकसान ही होता है।
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कहानी का निष्कर्ष है कि 'मुफ्त' की चीजें कभी-कभी महंगी पड़ सकती हैं,
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और हमें अपनी सुख-सुविधा और स्वास्थ्य की कीमत पर पैसे बचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
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यह कहानी बच्चों को हँसी-हँसी में यह सिखाती है कि अति हर चीज की बुरी होती है और संतुलन बनाना जरूरी है।
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