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रामदीन काका, सुंदरपुर गाँव के एक मेहनती कुम्हार, ने अपने पुश्तैनी घर और रोज़ी-रोटी को एक भयानक बाढ़ में खो दिया, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय नई शुरुआत की।
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रामदीन का कच्चा मकान नदी किनारे स्थित था, और वह मिट्टी के बर्तन बनाने में माहिर थे। उनकी पत्नी सुमित्रा और बेटी गुड़िया के साथ उनका जीवन खुशहाल था, जब तक कि बाढ़ ने उनकी दुनिया को तबाह नहीं कर दिया।
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बाढ़ की रात रामदीन और उनका परिवार सुरक्षित स्थान पर भागने में सफल रहा, लेकिन उनका घर और मेहनत का सामान पानी में बह गया, जिससे रामदीन को गहरा धक्का लगा।
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राहत शिविर में, रामदीन ने गाँव छोड़ने से इनकार कर दिया और अपने हुनर का उपयोग करके एक नया, पक्का मकान बनाने का संकल्प लिया, जो बाढ़ से सुरक्षित हो।
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रामदीन ने ईंट-भट्टे पर काम करना शुरू किया और मजदूरी के बदले पक्की ईंटें इकट्ठा कीं। गाँव वाले पहले उनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी मेहनत देखकर मदद करने लगे।
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सुमित्रा और गुड़िया ने भी रामदीन का साथ दिया, और छह महीने की मेहनत के बाद, उन्होंने एक छोटा लेकिन मजबूत पक्का मकान खड़ा कर लिया।
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गृह प्रवेश के दिन, पूरे गाँव ने रामदीन के प्रयासों को सराहा और उन्हें सम्मान दिया। रामदीन ने अपनी बेटी गुड़िया से कहा कि तूफान उन्हें बेहतर के लायक बनाने आया था।
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रामदीन का नया बसेरा न केवल बाढ़ से सुरक्षित है, बल्कि उनके बर्तनों का काम भी दोगुना बढ़ गया है, जिससे उनका घर गाँव के लिए मिसाल बन गया।
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यह कहानी हमें सिखाती है कि कठिनाइयों के बावजूद आत्मविश्वास और हौसला इंसान को फिर से खड़ा कर सकता है,
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और आपदा को अवसर में बदलने की प्रेरणा देती है।
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