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कहानी 'राह का साथी' पंचतंत्र से ली गई है और ब्रह्मदत्त नामक एक ब्राह्मण युवक की कहानी प्रस्तुत करती है, जिसे उसकी माँ ने एक छोटे से केकड़े को साथ रखने की सलाह दी।
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ब्रह्मदत्त की माँ ने उसे अकेले सफर पर जाने से मना किया और एक केकड़े को कपूर की डिबिया में रखने के लिए कहा, जिससे वह सुरक्षित रहे।
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यात्रा के दौरान ब्रह्मदत्त एक पीपल के पेड़ के नीचे सो गया, जिसके नीचे एक काले नाग का बिल था।
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कपूर की खुशबू से आकर्षित नाग बाहर आया और डिबिया में रखा केकड़ा उस पर हमला करने की कोशिश करने लगा।
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केकड़े ने नाग की गर्दन को अपने पंजों से कसकर पकड़ लिया, जिससे नाग की मौत हो गई और ब्रह्मदत्त की जान बच गई।
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जब ब्रह्मदत्त जागा, तो उसने देखा कि नाग मरा पड़ा है और केकड़ा उसकी गर्दन पकड़े हुए है, जिससे उसे माँ की सलाह का महत्व समझ में आया।
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ब्रह्मदत्त ने केकड़े को तालाब में वापस छोड़ दिया और यह कसम खाई
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कि वह कभी भी बड़ों की नसीहत को नजरअंदाज नहीं करेगा।
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इस कहानी से यह सीख मिलती है कि माता-पिता की सलाह हमारे भले के लिए होती है
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और सफर में कोई साथी होना जरूरी है, चाहे वह कितना भी छोटा क्यों न हो।
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