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कहानी 'रंक से राजा' सुवर्णपुर राज्य की है, जहाँ राजा भूपेंद्र अपनी संतान न होने के कारण अपने उत्तराधिकारी की तलाश में थे। उन्होंने राज्य के सभी बच्चों के लिए एक अनोखी परीक्षा की घोषणा की।
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दीपक, एक गरीब अनाथ लड़का जो मिट्टी के खिलौने बेचता था, इस परीक्षा में शामिल हुआ। उसके पास बहुत कम साधन थे, लेकिन उसकी ईमानदारी और सच्चाई उसकी सबसे बड़ी ताकत थी।
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राजा ने सभी बच्चों को एक-एक 'जादुई बीज' दिया और कहा कि एक साल में जिसकी फसल सबसे सुंदर होगी, वही राज्य का राजा बनेगा। दीपक ने पूरी मेहनत से बीज की देखभाल की, लेकिन कुछ नहीं उगा।
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अन्य बच्चों ने झूठ का सहारा लिया और बाजार से सुंदर पौधे खरीदकर लाए, लेकिन दीपक ने खाली गमला ही प्रस्तुत किया, जो उसकी सच्चाई की निशानी थी।
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राजा ने खुलासा किया कि दिए गए बीज उबाले हुए थे और अंकुरित नहीं हो सकते थे। दीपक की ईमानदारी ने उसे राजा बनने का हकदार बना दिया।
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राजा भूपेंद्र ने दीपक की सच्चाई की सराहना करते हुए उसे राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया, जिससे दरबार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
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इस कहानी से यह सीख मिलती है कि सच्चाई और ईमानदारी भले ही कठिन मार्ग हो,
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लेकिन अंत में विजय हमेशा सत्य की ही होती है।
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झूठ का सहारा लेकर सफलता प्राप्त करना क्षणिक हो सकता है,
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लेकिन दीर्घकालिक सफलता के लिए ईमानदारी सबसे महत्वपूर्ण है। दीपक की कहानी इस बात का प्रमाण है।
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