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कहानी रामपुर के एक समृद्ध व्यापारी सेठ धर्मचंद और उनके बेटे रोहन की है, जो आलसी और फिजूलखर्च है। सेठ धर्मचंद को चिंता है कि रोहन ने पैसे की असली कीमत नहीं सीखी है।
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सेठ धर्मचंद ने रोहन को एक चुनौती दी: अपनी मेहनत से 10 रुपये कमाकर लाने पर ही उसे रात का खाना मिलेगा। रोहन ने पहले अपनी माँ और बहन से मदद ली, लेकिन सेठ जी ने उनकी नकली कमाई को फेंक दिया।
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तीसरे दिन, सेठ जी की सख्ती के कारण रोहन को खुद बाजार में जाकर काम करना पड़ा। उसने भारी बोरियां उठाकर 10 रुपये कमाए, जिससे उसे मेहनत का असली मतलब समझ आया।
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जब सेठ धर्मचंद ने फिर से 10 रुपये के सिक्के को फेंकने की कोशिश की, तो रोहन ने उन्हें रोक लिया और कहा कि यह उसकी मेहनत की कमाई है, जिससे उसका दर्द और परिश्रम जुड़ा है।
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इस अनुभव के बाद, रोहन ने पैसों की कीमत और मेहनत का महत्व समझ लिया। उसने भविष्य में कभी भी पैसों की फिजूलखर्ची न करने की कसम खाई।
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कहानी हमें सिखाती है कि मेहनत से कमाया धन मुफ्त के धन से अधिक मूल्यवान होता है
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और हमें पैसों का सही उपयोग करना चाहिए।
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आत्मनिर्भरता का महत्व भी कहानी में उजागर किया गया है,
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जहां दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय खुद मेहनत करना सिखाया गया है।
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यह प्रेरणादायक कहानी बच्चों को अपने माता-पिता के पैसों का सम्मान करने और मेहनत की कीमत समझने का पाठ पढ़ाती है।
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