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'सच्चाई की राह' कहानी चंदनपुर के 10 वर्षीय आर्यन की है, जिसने कठिन परीक्षा में ईमानदारी और सच बोलकर समाज को सत्य की ताकत का अहसास कराया।
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चंदनपुर कस्बे में सेठ धर्मदास ने 'सत्यव्रत परीक्षा' नामक प्रतियोगिता आयोजित की, जिसमें विजेता को विदेश में उच्च शिक्षा और जीवन भर आर्थिक सहायता देने का वादा था।
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प्रतियोगिता में बच्चों को नीले पत्थर लेकर पहाड़ी पर स्थित मंदिर तक जाना था। आर्यन ने रास्ते में एक बूढ़े आदमी की मदद के लिए रुककर इंसानियत दिखाई।
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मंदिर पहुंचने पर आर्यन के पत्थर काले हो गए, जबकि अन्य बच्चों के पत्थर नीले और चमकदार बने रहे, जिससे आर्यन निराश हो गया।
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सेठ धर्मदास ने खुलासा किया कि सभी बच्चों को साधारण पत्थर दिए गए थे, जिन पर नीले रंग का लेप था, जो धूप और पसीने से उड़ जाता था।
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अधिकांश बच्चों ने रास्ते में पत्थरों पर नकली रंग चढ़ाया, जबकि आर्यन ने ईमानदारी से यात्रा की, जिससे उसके पत्थर काले हो गए।
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सेठ जी ने बताया कि बूढ़ा आदमी उनका सेवक था, और आर्यन की इंसानियत और ईमानदारी ने उसे प्रतियोगिता का असली विजेता साबित किया।
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आर्यन को विदेश में पढ़ने का अवसर और उसके पिता के लिए बगीचा मिला। कहानी का संदेश है
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कि सच की विजय होती है और ईमानदारी स्थायी सफलता दिलाती है।
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कहानी चंदनपुर के लोगों को अपनी सादगी और सच्चाई की ओर लौटने का प्रेरणादायक सबक देती है।
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