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इस कहानी में चंदनपुर गाँव के बिट्टू नाम के बच्चे की मिठाई की लत और उसके समाधान की मजेदार कहानी है, जहाँ बिट्टू की माँ सविता उसकी इस आदत से बेहद परेशान है।
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बिट्टू को बेसन के लड्डुओं से बेहद लगाव है, जिससे उसकी माँ ने उसे डराया और समझाया, लेकिन वह अपनी मिठाई की लत नहीं छोड़ पा रहा था।
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गाँव के मशहूर बाबा गपोड़ीलाल से मदद की उम्मीद में, सविता अपने बेटे को उनके पास ले जाती है, लेकिन बाबा जी किसी उपाय के बजाय उन्हें अगले हफ्ते आने के लिए कहते हैं।
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एक हफ्ते बाद, बाबा गपोड़ीलाल ने बिट्टू को मिठाई छोड़ने की सलाह दी, जिससे सविता और बिट्टू हैरान रह गए क्योंकि यह सलाह तो सविता पहले ही दे चुकी थी।
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बाबा गपोड़ीलाल ने खुलासा किया कि उन्होंने खुद लड्डुओं की लत छोड़ी है, इसलिए अब वे इस सलाह को प्रभावी रूप से दे पा रहे हैं।
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बाबा के इस ईमानदार और आत्म-अनुशासित आचरण ने बिट्टू को प्रभावित किया, और उसने मिठाई खाना कम कर दिया।
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कहानी का मुख्य संदेश है कि सच्चा उपदेश तभी प्रभावी होता है जब उपदेश देने वाला खुद उस पर अमल करे।
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यह कहानी हमें सिखाती है कि "कथनी से बड़ी करनी होती है" अर्थात् हमारे कर्म हमारे शब्दों से अधिक प्रभावशाली होते हैं।
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बाबा गपोड़ीलाल का आचरण और उनके द्वारा दिखाया गया उदाहरण बिट्टू के लिए प्रेरणा बना, जिससे उसने अपनी बुरी आदत पर काबू पाना शुरू किया।
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इस कहानी से हमें यह भी समझ में आता है कि दूसरों को सलाह देने से पहले हमें खुद उस पर चलना चाहिए, क्योंकि उपदेश देना आसान है लेकिन उसे निभाना असली बुद्धिमानी है।
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