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कहानी 'साहूकार का बटुआ' सुंदरपुर गाँव के एक लालची सेठ घसीटाराम और एक ईमानदार किसान भोला की है। सेठ का बटुआ खो जाता है, जिसमें 100 सोने की मोहरें थीं, और भोला उसे ढूंढकर लौटाता है।
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भोला की ईमानदारी के बावजूद, सेठ घसीटाराम ने उसे 10 मोहरें चुराने का झूठा आरोप लगाया, ताकि वह इनाम देने से बच सके। सेठ की इस चालबाजी ने भोला को गहरा दुख पहुंचाया।
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भोला ने अपनी ईमानदारी की रक्षा के लिए पंचायत में न्याय की गुहार लगाई। पंचायत के सरपंच ने मामले की सुनवाई की और सेठ की लालची चाल को समझ लिया।
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सरपंच ने चतुराई से फैसला सुनाया कि चूंकि सेठ का दावा था कि उसके बटुए में 110 मोहरें थीं और भोला के पास मिले बटुए में 100, तो यह बटुआ सेठ का नहीं हो सकता।
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सेठ को मजबूरी में अपनी गलती माननी पड़ी और भोला को 10 मोहरों का वादा किया हुआ इनाम देना पड़ा, जिससे उसकी बेइज्जती भी हुई और उसे नुकसान भी झेलना पड़ा।
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कहानी का निष्कर्ष यह है कि ईमानदारी हमेशा जीतती है और लालच का अंत बुरा होता है।
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सेठ के लालच ने उसे नुकसान पहुंचाया, जबकि भोला की ईमानदारी ने उसे इनाम दिलाया।
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इस घटना के बाद सेठ ने कसम खाई कि वह कभी किसी का हक नहीं मारेगा और अपनी कंजूसी पर नियंत्रण रखने की कोशिश करेगा।
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कहानी हमें यह सीख देती है कि सच का रास्ता कठिन हो सकता है,
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लेकिन अंततः जीत सच की होती है, और लालच का फल हमेशा बुरा होता है।
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