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कहानी "सोने का कलश और मिट्टी का घड़ा" में चंदनपुर के जमींदार प्रताप सिंह की बेटी अवनि की शादी की कहानी है, जो अपनी सुंदरता पर गर्व करती है और एक सुंदर वर चाहती है।
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प्रताप सिंह दो दावेदारों में से एक को चुनने के लिए महर्षि वेदव्यास जी से सलाह लेते हैं। एक दावेदार रजत, अमीर व्यापारी का बेटा है और दूसरा मोहन, एक साधारण किसान।
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महर्षि ने दोनों युवकों को पानी लाने के लिए भेजा, रजत को सोने का कलश और मोहन को मिट्टी का घड़ा दिया।
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रजत का सोने का कलश गर्मी में पानी को उबाल देता है जबकि मोहन का मिट्टी का घड़ा पानी को ठंडा और पीने योग्य रखता है।
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महर्षि ने अवनि को सिखाया कि बाहरी सुंदरता अस्थायी होती है और गुण ही असली मूल्य रखते हैं।
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अवनि को अपनी गलती का एहसास होता है और वह समझती है
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कि जीवनसाथी के लिए गुण और स्वभाव अधिक महत्वपूर्ण हैं।
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अंत में, अवनि मोहन को अपना जीवनसाथी चुनती है, जो गुणवान और विनम्र है।
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कहानी का नैतिक यह है कि बाहरी दिखावा छलावा हो सकता है और कठिन परिस्थितियों में गुण ही काम आते हैं।
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यह कहानी बच्चों को सिखाती है कि सुंदरता की बजाय व्यक्ति के गुणों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
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