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'दो फ़रिश्ते' नामक कहानी रतनपुर राज्य की है, जहाँ दो ढोंगी साधु खुद को स्वर्ग से आए फ़रिश्ते बताकर राजा से स्वर्ग की सीट बुक करने के लिए 100 सोने की मोहरें मांगते हैं।
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राजा भोलेनाथ इन फ़रिश्तों की बातों में आ जाते हैं, लेकिन मंत्री सुमित को इनपर शक होता है और वह इनकी असलियत जानने के लिए एक योजना बनाते हैं।
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मंत्री सुमित ने दोनों फ़रिश्तों को अपने घर दावत पर बुलाकर सोने की थालियों में सुलगते अंगारे और कंकड़ परोस दिए, जिससे फ़रिश्तों की पोल खुलने लगी।
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फ़रिश्तों ने असली भोजन की मांग की, जिस पर सुमित ने जूते और चप्पल पेश किए और कहा कि स्वर्ग जाने के लिए इन्हें खाकर पापों का नाश करना पड़ेगा।
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जब फ़रिश्तों ने भागने की कोशिश की, तो सुमित ने दरवाजा बंद करवा दिया। अगले दिन, उन्होंने राजा से शिकायत की कि मंत्री ने उनका अपमान किया।
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सुमित ने सुझाव दिया कि फ़रिश्तों की विदाई महल की ऊंची मीनार से की जाए, ताकि वे उड़कर स्वर्ग जा सकें। इससे फ़रिश्ते डर गए क्योंकि उनके पंख नकली थे।
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अंततः फ़रिश्तों ने अपनी असली पहचान बताई कि वे पड़ोस के गाँव के नटखट और बंटी हैं, जिन्होंने कर्ज चुकाने के लिए यह नाटक किया था।
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राजा ने उन्हें कारागार में डालने के बजाय शहर की सफाई करने की सज़ा दी, ताकि वे नेक इंसान बन सकें।
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कहानी से सीख मिलती है कि हमें चमत्कारों पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए और हर दावे को तर्क की कसौटी पर परखना चाहिए।
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इस कहानी में मंत्री सुमित की अक्लमंदी और चतुराई के कारण सच सामने आया, और राजा ने भविष्य में बिना जांच-पड़ताल के किसी पर भरोसा न करने की कसम खाई।
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