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विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय के दरबार में एक रहस्यमयी यात्री 'जालंधर' ने परियों का नाच दिखाने का दावा किया। यह यात्री अपनी मीठी बातों से राजा को प्रभावित करने में सफल रहा।
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जालंधर ने राजा को आधी रात को 'कमल सरोवर' के खंडहर में अकेले आने का निमंत्रण दिया, ताकि वह उन्हें परियों का दरबार दिखा सके। राजा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।
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तेनालीराम, जो अपनी चतुराई और हाज़िरजवाबी के लिए मशहूर थे, जालंधर की बातों से सतर्क हो गए। उन्हें यात्री की चाल-ढाल से संदेह हुआ कि वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।
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तेनालीराम ने अपने गुप्तचरों को खंडहर की जांच करने और छिपकर निगरानी करने का आदेश दिया, क्योंकि उन्हें जालंधर की बातों पर भरोसा नहीं था।
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रात को जब राजा अकेले खंडहर पहुंचे, तो जालंधर ने उन्हें अंदर चलने का कहा।
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जैसे ही राजा अंदर जाने लगे, तेनालीराम की योजना के अनुसार सैनिकों ने जालंधर को पकड़ लिया।
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तेनालीराम ने राजा को बताया कि जालंधर वास्तव में दुश्मन राज्य का सेनापति है
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और उसने राजा को मारने की साजिश रची थी। तेनालीराम की सतर्कता और योजना ने राजा की जान बचाई।
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राजा कृष्णदेव राय ने तेनालीराम की चतुराई की सराहना की और उन्हें दरबार में सोने के सिक्कों से पुरस्कृत किया।
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कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि अंधविश्वास और लालच में आकर किसी अनजान व्यक्ति की बातों पर आँख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए। सतर्कता और बुद्धिमानी ही सबसे बड़ा हथियार है।
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