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पर्यावरण और मनुष्य का संबंध अटूट है। प्रकृति ने हमें शुद्ध हवा, स्वच्छ जल और उपजाऊ मिट्टी दी है, लेकिन आधुनिकता की दौड़ में हमने इन संसाधनों को प्रदूषित कर दिया है। आज प्रदूषण एक वैश्विक संकट बन चुका है, जिससे न केवल हमारा स्वास्थ्य बल्कि पूरी पृथ्वी का अस्तित्व खतरे में है। अक्सर माना जाता है कि प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल सरकार की है, परंतु सच यह है कि समाज के सबसे छोटे सदस्य यानी “बच्चे” इस लड़ाई में सबसे बड़े सिपाही साबित हो सकते हैं।
आप पूछेंगे कि ऐसा क्यों?
तो हम बता दें कि बच्चे किसी भी देश का भविष्य होते हैं। उनमें सीखने की क्षमता और बदलाव लाने का उत्साह बड़ों की तुलना में अधिक होता है। यदि बचपन से ही बच्चों में पर्यावरण के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी का भाव जगाया जाए, तो वे एक ऐसी पीढ़ी के रूप में विकसित होंगे जो प्रकृति का सम्मान करेगी। इसके अलावा, बच्चे अपने माता-पिता और बड़ों के व्यवहार को बदलने की शक्ति रखते हैं।
बच्चे अपने घर और स्कूल में कचरे को कम करने की शुरुआत कर सकते हैं। वे कचरे को “गीला” और “सूखा” के आधार पर अलग-अलग करना सीख सकते हैं। Reduce (कम करना), Reuse (पुनः उपयोग) और Recycle (पुनर्चक्रण) के मंत्र को अपनाकर वे प्लास्टिक के उपयोग को न्यूनतम कर सकते हैं।
प्रदूषण कम करने का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा बचाना है। बच्चे यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि जब कमरे में कोई न हो, तो बिजली के स्विच बंद रहें। वे ब्रश करते समय या नहाते समय पानी की बर्बादी रोक सकते हैं। ऊर्जा की कम खपत का अर्थ है बिजली उत्पादन के लिए कोयले का कम जलना, जो सीधे तौर पर वायु प्रदूषण को कम करता है। इस विषय में सबसे महत्वपूर्ण है नए पेड़-पौधों को लगाना, क्योंकि पेड़ वायु प्रदूषण को सोखने वाले प्राकृतिक फिल्टर हैं। बच्चे अपने जन्मदिन या विशेष उत्सवों पर पौधे लगा सकते हैं। स्कूल के बगीचों या घर की बालकनियों में छोटे-छोटे पौधे लगाकर वे वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।
इसी के साथ बता दें कि बच्चे अपने परिवार और समाज में जागरूकता फैलाने का सबसे प्रभावी जरिया हैं। जब एक बच्चा अपने पिता को सार्वजनिक स्थान पर कूड़ा फेंकने से टोकता है या अपनी माँ को बाजार जाते समय कपड़े का थैला साथ ले जाने की याद दिलाता है, तो उसका प्रभाव किसी विज्ञापन से कहीं अधिक होता है। त्योहारों पर होने वाला प्रदूषण एक बड़ी चुनौती है। इसको भी बच्चों के साथ ही निपटा जा सकता है। बच्चे पटाखों का बहिष्कार करके वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम कर सकते हैं। इसी तरह, रसायनों से मुक्त रंगों वाली होली मनाकर वे जल स्रोतों को दूषित होने से बचा सकते हैं।
प्रदूषण के विरुद्ध संघर्ष में बच्चों का सहयोग अपरिहार्य है। यद्यपि वे नीति-निर्माता नहीं हैं, लेकिन वे बदलाव के सबसे मजबूत संवाहक हो सकते हैं। बच्चों द्वारा उठाए गए छोटे-छोटे कदम जैसे प्लास्टिक का त्याग, पानी की बचत और पेड़ लगाना भविष्य में एक बड़े सकारात्मक बदलाव की नींव रखते हैं। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां एक स्वस्थ और स्वच्छ वातावरण में सांस लें, तो आज के बच्चों को “पर्यावरण रक्षक” बनाना हमारा प्राथमिक कर्तव्य है।
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