“आज, बच्चे अपने माता-पिता की ताकत बन गए हैं”– यह कहना है  ‘तेरा यार हूं मैं’ के सुदीप साहिर का

तेरा यार हूं मैं: हम सभी यह मुहावरा सुनते हुए बड़े हुए हैं- द चाइल्ड इज़ द फादर ऑफ द मैन’। लेकिन सच कहूं तो, जब मैं बच्चा था, मेरा हमेशा यही सवाल था कि “असल में इसका मतलब क्या होता है?”

जब मैंने पहली बार यह मुहावरा सुना था तबसे समय बहुत बदल चुका है, और आज 2020 में, दो महत्वपूर्ण शब्दों ‘बच्चे’ और ‘पिता’ के बीच का संबंध इस मुहावरे से कहीं अधिक विकसित हो गया है।

बतौर कलाकार, मैंने कई किरदार निभाए हैं, और अभी वर्तमान में, मैं ‘तेरा यार हूं मैं’ में एक टीनेज बेटे के पिता राजीव बंसल का किरदार निभा रहा हूं। असल ज़िंदगी में भी, मैं एक टीनेज लड़के का पिता हूं। मैं इन बच्चों की जगह भी रह चुका हूं और अपने पिता की जगह भी, जिसमें मैं अभी के दौर में हूं। अगर मैं इस सफर में वापिस मुड़कर देखूं तो, मुझे सिर्फ खुशी होती है और आमतौर पर यह इस निष्कर्ष के साथ समाप्त होता है- कि समय के साथ परिवार में हम सभी की भूमिका बदल गई हैं और बच्चों की भी बदलती भूमिका के बारे में बात करने की ज़रुरत है।

अगर आप मेरी उम्र के हैं और यह पढ़ रहे हैं, तो इस बात की थोड़ी सी सम्भावना है कि आप अपना तर्क दे सकते हैं कि बच्चे के रूप में हम सभी महत्‍वपूर्ण सामाजिक और पीढ़ीगत बदलाव से गुज़रे हैं। हालांकि, मैं यहां पर जिस बिंदु पर ध्यान केंद्रित करना चाहूंगा वो है ऊपर लिखे मुहावरे – बच्चा आदमी का पिता है’ के आकर्षक सफर की, असल ज़िंदगी में देखा जाए तो यह मुहावरा शायद कभी उतना ज़्यादा प्रासंगिक नहीं रहा क्योंकि मुझे लगता है कि हम जो वास्‍तव में करने के लिए सोचते हैं, उसकी तुलना में ऐसी बहुत सी चीजें हैं जिन्‍हें हम अपने बच्‍चों से सीख सकते हैं।

Ssudeep Sahir as Rajeev and Ansh Sinha as Rishabh

यह एक खास वजह थी कि जब सोनी सब ने मुझसे ‘तेरा यार हूं मैं’ के लिए संपर्क किया था तो मैं बहुत ही रोमांचित था क्योंकि मुझे याद नहीं है कि कब मैंने टेलीविज़न का ऐसा शो देखा था जोकि पिता-पुत्र के रिश्ते पर इतने बड़े पैमाने पर ध्यान केंद्रित करता हो। शायद यह कॉन्‍सेप्ट टेलीविज़न के लिए नया हो सकता है लेकिन हम सभी के लिए यह बहुत ही प्रासंगिक है।

इस साल दिसंबर में मैं 40 साल का हो जाऊंगा, सिर्फ एक साल बड़ा नहीं हुआ हूं बल्कि एक दशक समझदार भी। हम उस समाज में पले-बढ़े हैं जहां हमें पारम्परिक तौर पर यह विश्वास दिलाया जाता है कि माता-पिता ही उनके बच्चों के गुरु है। हालांकि, जहां तक मेरा निजी तौर पर और ‘तेरा यार हूं मैं’ में राजीव के रूप में मेरा अनुभव है, आज दुनिया में बच्चों के लिए अनुभव करने के लिए कई चीज़ें है जो शायद हमें उस उम्र में नहीं मिलीं और कुछ सीखने की शुरुआत यहीं से होती है।

मैं धन्य हूं ऐसे पिता पाकर जो मेरे साथ बेटे से ज़्यादा दोस्त की तरह व्यवहार करते हैं, और इसके परिणामस्वरूप हमारा रिश्ता हमेशा सहज रहता है। मेरा मानना है कि बच्चों को यह समझने के लिए विश्वास कि ज़रूरत होती है कि आप हमेशा उनकी तरफ हैं और जो भी आप करते हैं और कहते हैं वह उनके लिए फायदेमंद है।

जब उन्हें आप पर एक बार विश्वास हो जाता है, वह अपनी सीखी हुई नयी चीज़ों को शेयर करने के लिए ज़्यादा इच्छुक होंगे, वो एक नई बोली बोलेंगे, और सबसे ज़रूरी चीज़ आपको पता चलेगा कि वह क्या और कैसा महसूस करते हैं। आज,बच्चे उनके माता-पिता की कमज़ोरी बनने से ज़्यादा उनकी ताकत बनते हैं और सबसे महत्वपूर्ण चीज़, उनके रिश्‍ते की नींव पूरे परिवार को साथ में रखती हैं।  मैं निश्चित रूप से इस बात पर यकीन करना चाहूंगा कि बदलते समय के साथ, हमारे बच्चे हमारे दोस्तों की तरह हो गए हैं, उनकी भी भूमिका में उसी तरह का विकास हो रहा है जैसा हमारा माता-पिता के रूप में, क्या आप सहमत नहीं हैं?