Category "Interesting Facts"

28Sep2021

प्राचीन मिस्र के राजाओं को उनकी प्रजा शाब्दिक रूप से दिव्य मानती थी। फराओ शब्द का अर्थ है ‘‘महान घर‘‘, जैसा कि ईश्वर के घर में है। माना जाता है कि 90 वर्ष तक शासन करने वाले राजा पेपी द्वितीय कीड़े से इतना परेशान हो गये, की उसने अपनी एक दासी को आज्ञा दी कि वह मक्खियों को दूर रखने के लिए खुद पर शहद लगा ले ।

4Sep2021

Dracula Ant: जीव जगत में गति के मामले में एक नया अभूतपूर्व रिकाॅर्ड बना हैं। ‘Dracula Ant’ की एक प्रजाति के जबड़े 0.000015 सैकेंड में शून्य से 250 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हरकत कर सकते हैं।

‘मिस्ट्रियम कैमिलेई’ नामक इस चींटी की प्रजाति के हाई-स्पीड वीडियो से खुलासा हुआ है कि इसके जबड़े मानव आंखों की पलकें झपकने से भी 5,000 गुना तेजी से हरकत कर सकते हैं।

चींटियों की यह दक्षिण-पूर्व एशिया के उष्णकटिंबधीय इलाकों में पाई जाने वाली एक दुर्लभ प्रजाति है जिसके बारें में अब तक नाममात्र जानकारी जुटाई गई हैं।

‘राॅयल सोसायटी ओपन सांइस’ नामक जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार इसके जबड़े सभी जीवों से सबसे तेजी से झटका दे सकते हैं।

इलिनोइस विश्वविद्यालय के एंड्रयू सुआरेज बताते हैं, ‘‘ये चींटियां अन्य कीटों को मारने के लिए अपने जबड़ों से वे उन्हें जबरदस्त झटका मारती हैं और संभवतः इस हमले से वे उन्हें चैंका देती हैं और फिर उस शिकार को वे अपनी बांबियों में ले जाती हैं जहाँ उन्हें नन्हे लार्वा को खिलाया जाता है।

चंूकि इनके जबडों की रफ्तार बेहद तीव्र है इसलिए इसे कैमरे पर रिकाॅर्ड कर पाना भी कोई आसान काम नहीं था।

इसके लिए वैज्ञानिकों को बेहद शक्तिशाली तथा तेज कैमरों की मदद लेनी पड़ी ताकि इन चीटिंयों के जबड़ों की सारी हरकत को फिल्माया जा सके। इसके लिए एक्स-रे इमेंजिंग टैक्नोलाॅजी का भी इस्तेमाल किया गया।

ये चींटियां अपने जबड़ों से झटका देने के लिए कुछ-कुछ उंगलियों से चुटकी बजाने जैसी तकनीक का उपयोेग करती हैं। इनके जबड़े अन्य चींटियों की तुलना में अधिक चैड़े तथा लचीले होते हैं। वे जबड़ों के अगले हिस्सों को आपस में जोर से जोड़ लेती हैं जिससे उनमें भीतर की ओर तेज दबाव पैदा हो जाता है और यह सारी ताकत तब छूट जाती है जब एक जबड़ा दूसरे से ठीक ऊपर से सरका दिया जाता है। ठीक वैसे ही जैसे हम उंगलियों से चुटकी बजाते हैं

हाई स्पीड वीडियो रिकाॅर्ड में इनके जबड़ों की गति 250 किलोमीटर प्रतिघंटा तक रिकाॅर्ड की गई है जो धरती पर पाए जाने वाले सभी जीवों में सर्वाधिक है।
वैसे वैज्ञानिकों को लगता है कि धरती पर इनसे भी तेज गति से हरकत कर सकने वाली चींटियों तथा दीमकों की प्रजातियाँ मौजूद हैं जिन्हें अभी तक खोजा नहीं जा सका है।

इसलिए पड़ा ‘ड्रैकुला’ नाम

‘मिस्ट्रियम कैमिलेई’ चींटियों की ‘Dracula Ant’ प्रजाति का हिस्सा हैं। इनका यह नाम इसलिए पड़ा है क्योंकि इस प्रजाति की रानी चींटियां अपने ही लार्वा का खून पीकर जीती हैं।

2Sep2021

एयरफोर्स पायलट से एस्ट्रोनाॅट

बात अप्रैल 1984 की है। तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी (Indira Gandhi)  थी। उन्होंने जब अंतरिक्ष में मौजूद राकेश शर्मा से वीडियो काॅलिंग के जरिए पूछा कि ऊपर से हिंदुस्तान कैसा दिखता है, तो स्काॅवर्डन लीडर शर्मा बोलेः मैं बिना किसी हिचक के कह सकता हूँ सारे जहां से अच्छा….।

राकेश शर्मा पहले भारतीय थे, जिन्हें अंतरिक्ष में जाने का मौका मिला। उनका जन्म 13 जनवरी 1949 को पंजाब के पटियाला में हुआ था। उन्हें बचपन से ही हवाई जहाजों में दिलचस्पी थी। 1966 में बतौर अफसर उन्होंने इंडियन एयरफोर्स ज्वाॅइन की। 1971 के वाॅर में फाइटर पायलट के रूप में राकेश शर्मा ने बेहतरीन प्रदर्शन किया। 1984 में उन्हें सोवियत संघ और भारत के ज्वांईट स्पेस प्रोग्राम के लिए चुना गया।

2 अप्रैल 1984 को दो सोवियत एस्ट्रोनाॅट्स के साथ सोयूज टी-11 राकेश शर्मा अंतरिक्ष में गए। वह कुल 7 दिन, 21 घंटे और 40 मिनट अंतरिक्ष में रहे। अंतरिक्ष में जाने से एक साल पहले वह माॅस्को से 70 किमी दूर स्टार सिटी गए थे। यहीं पर अंतरिक्ष-यात्रियों की ट्रेनिंग रूसी भाषा में होनी थी इसलिए वह रोजाना 6-7 घंटे रूसी भाषा सीखते थे और करीब तीन महीने में उन्होंने ठीक-ठाक रूसी सीख ली थी। इसके साथ ही जीरो ग्रैविटी में काम करने की महीनों लंबी ट्रेनिंग भी पूरी की जैसे कि पैर ऊपर और सिर नीचे रखकर सोना, बिना पानी के ब्रश करना आदि। उन्होंने इतिहास रच दिया। हाल में उन पर फिल्म बनाने का ऐलान भी किया गया है। फिल्म का नाम होगा ‘सारे जहाँ से अच्छा’ फिलहाल राकेश शर्मा अलग-अलग संस्थानों में मोटिवेशनल लेक्चर देते हैं।

देसी तकनीक से छाए अंतरिक्ष में

राकेश शर्मा अंतरिक्ष में रूस की मदद से गए थे लेकिन आप शायद जानते होंगे कि दिसंबर 2021 में भारत पूरी तरह से अपने दम पर अंतरिक्ष में इंसान भेजना चाहता है। इसके लिए प्रोजेक्ट गगनयान पर जोर-शोर से काम चल रहा है। अनुमान है कि इस प्रोजेक्ट पर करीब 10 हजार करोड़ रूपये खर्च होंगे। गगनयान प्रोजेक्ट सफल होने पर इंसान को अंतरिक्ष भेजने वाला भारत चैथा देश बन जाएगा। इससे पइले रूस, अमेरिका और चीन यह काम कर चुके हैं।

आप भी बन सकते हैं

अगर आप भी तारों भरे आकाश में सैर करना चाहते हैं तो आपको एस्ट्रोनाॅट बनना होगा। हाँ, इसके लिए बड़े होकर आपको मैथ्स, फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलाॅजी, मेडिकल, इंजीनियरिंग या कंप्यूटर साइंस जैसे सब्जेक्ट्स में गै्रजुएशन या मास्टर्स डिग्री (एम एस सी, एक ई) लेनी होगी। अगर प्लेन उड़ाने का एक हजार घंटे या ज्यादा का अनुभव आपके पास होगा, तो भी काम बन जाएगा। साथ ही, अंतरिक्ष-यात्री बनने के लिए फिजिकली और मंेंटली फिट होना बहुत जरूरी है। हेल्थ, फिटनेस, मेंटल, लेवल, दिमागी कुशलता आदि के लिए कई लेवल पर टेस्ट होते हैं। अगर आप इन सबमें पास हो गए और आपका चयन बतौर एस्ट्रोनाॅट हो गया तो करीब 2-3 लंबी ट्रेनिंग लेनी होगी। इसमें प्रेशरसूट पहनने, लाॅचिंग के वक्त पैदा होने वाले भीषण शारीरिक दबाव को सहने, अंतरिक्ष स्टेशन में रूटीन के काम करना, अंतरिक्ष की मरम्मत आदि सिखाया जाता है तो फिर देर किस बात की, तैयारी शुरू की जाए।

23Aug2021

Bhimrao Ramji Ambedkar: भीमराव रामजी आम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्होंने अछूतों (दलितों) के सामाजिक भेदभाव के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया था। वह भारत के संविधान के वास्तुकार थे, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ।

19Aug2021

सुपरमैन हमेशा उड़ता नहीं था
मूल काॅमिक किताब में सुपरमैन एक ही बार में ऊंची इमारतों पर छलांग लगा सकता है, लेकिन फिर उसे सीधे धरती पर वापस आना पड़ा,

5Aug2021

होली का इतिहास : ‘पुराण’ शब्द का उद्गम संस्कृत के ‘पुर नव’ शब्द से हुआ है, जिसका अर्थ है ‘जो नगर में नया है’। पुराण तथ्यों बातों को नए ढंग से प्रस्तुत करने का तरीका है। यह रंग-बिरंगी कथा-कहानियों से परिपूर्ण ग्रन्थ है। सतह पर तो ये कहानियाँ काल्पनिक लगती हैं परन्तु वास्तव में इनमें अति सूक्ष्म सत्य है।

एक असुर राजा हिरण्यकश्यप चाहता था कि सभी उसकी पूजा करें। परन्तु उसका अपना ही पुत्र ‘प्रहलाद’ उस राजा के घोर शत्रु भगवान नारायण का परम भक्त था। इस बात से क्रोधित राजा अपनी बहन होलिका की सहायता से प्रहलाद से मुक्ति चाहता था। अग्नि में भी न जलने की शक्ति प्राप्त होलिका प्रहलाद को अपनी गोद में ले कर जलती हुई आग (चिता) में बैठ गई। परन्तु इस आग में होलिका स्वयं जल गई और प्रहलाद आग में से सही-सलामत बाहर निकल आया।

यहाँ हिरण्यकश्यप बुराई का प्रतीक है और प्रहलाद निश्छलता, विश्वास एवं आनंद का। आत्मा को केवल भौतिक वस्तुओं के प्रति ही प्रेम रखने के लिए ही सीमित नहीं किया जा सकता। हिरण्यकश्यप भौतिक संसार से मिलने वाला समस्त आनंद चाहता था, पर ऐसा हुआ नहीं। किसी जीवात्मा को सदा के लिए भौतिकता में कैद नहीं रखा जा सकता। इसका अंततः अपने उच्चतर स्व अर्थात नारायण की ओर बढ़ना स्वाभाविक है।

History of Holi Know interesting stories of Holi

होली मनाने का कारण

  1. आप सभी को शायद पता होगा की भारत में बृज, मथुरा, वृन्दावन और बरसाने की लट्ठमार होली व श्रीनाथजी, काशी आदि की होली बहुत ही प्रसिद्ध है।
  2. ऐसा भी माना जाता है की होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोगो को शिव के गणों का वेश धारण करना होता है।
  3. ऐसा मान लिया जाता है की इस दिन अधिकतर लोग आपसी दुश्मनी भुलाकर होली के दिन गले लगाकर एक दूसरे के दोस्त बन जाते है। यह त्योहार आपसी प्रेम की निशानी है।
  4. कुछ लोगों का यह भी कहना हैं कि भगवान कृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खुशी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था इसी कारण बृज में होली की बहुत मान्यता है।
  5. पहले दिन होलिका को जलाया जाता है। जिसे होलिका दहन भी कहते है।
  6. बादशाह अकबर भी जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर नूरजहाँ के साथ होली खेलते थे।
  7. भारत के कई हिस्सों में आज भी खेले खाने वाली होली पाँच दिन तक मनाई जाती है।
  8. यह त्योहार फाल्गुन महीने में आता है जिस कारण कई लोग इसे फाल्गुनी भी कहते है।
  9. यह भारत के अलावा नेपाल और अन्य भारतीय प्रवासी देशो में धूमधाम से मनाया जाता है।
  10. रंगो का यह त्योहार प्रमुख रूप से दो दिन तक मनाया जाता है।
  11. लोग इस दिन एक-दूसरे को रंग लगाते है।
  12. लोगो को होली में रंगों का सही ढंग से उपयोग करना चाहिए. केमिकल से बने रंगों से हमेशा बचना चाहिए। और केवल हर्बल रंगों का इस्तेमाल करना चाहिए।
2Aug2021

रानी की वाव-पाटन इतिहास: गुजरात में रानी की वाव और राण-की वाव का निर्माण सोलंकी साम्राज्य के समय में किया गया था।

प्राचीन मान्यताओ के अनुसार इसका निर्माण सोलंकी साम्राज्य के संस्थापक मुलाराजा के बेटे भीमदेव प्रथम (सन् 1022 से 1063) की याद में 1050 सन् के समय में उनकी विधवा पत्नी उदयामती ने बनवाया था, जिसे बाद में करणदेव प्रथम ने भी पूरा किया था।

इस बावली को बाद में सरस्वती नदी ने पूरी तरह से जलव्याप्त कर दिया था और 1980 तक यह बावली पूरी तरह से पानी से ही भरी हुई थी। लेकिन फिर कुछ समय बाद जब आर्कियोलाॅजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने इसे खोज निकाला था, उस समय इसकी हालत काफी खस्ता थी।

आर्किटेक्चरः

प्राचीन जानकारो के अनुसार यह आकर्षक बावली तकरीबन 64 मीटर लम्बी, 27 मीटर गहरी और 20 मीटर चैड़ी हैं।

अपने समय की सबसे प्राचीन और सबसे अद्भुत निर्मितियो में इस बावली का समावेश किया गया है। लेकिन वर्तमान में इसमें बहुत पानी भरा हुआ है।

वर्तमान में हमें बावली का थोडा सा हिस्सा ही पूरी तरह से दिखाई देता है। लेकिन बावली में स्थापित एक पिल्लर हमें आज भी दिखाई देता है, जो प्राचीन समय की कलाकृतियांे का अद्भुत उदाहरण है।

भारत की सबसे प्राचीनतम और अद्भुत और सुंदर निर्मितियो और कलाकृतियों में से यह एक है।

बावली के नीचे एक छोटा द्वार भी है, जिसके भीतर 30 किलोमीटर की एक सुरंग भी है, लेकिन फिलहाल इस सुरंग को मिट्टी और पत्थरो से ढक दिया गया है।

पहले यह सुरंग बावली से निकलकर सीधी सिद्धपुर गाँव को जाकर मिलती थी। कहा जाता है की राजा इसका उपयोग गुप्त निकास द्वार के रूप में करते थे।

Rani Ki Vav

अलेंत किनारों की दीवारेः

बावड़ी में बनी बहुत सी कलाकृतिंया को मूर्तियों में ज्यादातर भगवान विष्णु से संबंधित है। भगवान विष्णु के दशावतार के रूप में ही बावली में मूर्तियों का निर्माण किया गया है, जिनमे मुख्य रूप से कल्कि, राम, कृष्ण, नरसिम्हा, वामन, वाराही और दूसरे मुख्य अवतार भी शामिल है।

इसके साथ-साथ बावली में नागकन्या और योगिनी जैसी सुंदर अप्सराओ की कलाकृतिंया भी बनायी गयी है। बावड़ी की कलाकृतिंया को अद्भुत और आकर्षित रूप में बनाया गया है।

आज से तकरीबन 50-60 साल पहले के आयुर्वेदिक पौधे आज भी हमें रानी की वाव में देखने को मिलते है, जिनका उपयोग प्राचीन समय में बहुत सी गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए किया जाता था।

गुजरात में स्थापित इस वाव का महत्त्व केवल पानी जमा करने के लिए नही है बल्कि इसका आध्यात्मिक महत्त्व भी है। वास्तव में गुजरात की वाव का निर्माण प्राचीन आर्किटेक्चर स्टाइल में ही किया गया है, जिसके अंदर मंदिर और एक गुप्त सुरंग भी है। जैसे-जैसे हम इसके अंदर जाते है, वैसे-वैसे इसमें पानी का प्रमाण बढ़ जाता है।

रानी को वाव में बनी सीढियाँ निचली सतह तक बनी हुई है। और इस बीच बावली की दीवारों को अलंकृत भी किया गया है और दीवारों पर विविध कलाकृतिंया भी की गयी है।

इन कलाकृतिंया में मुख्यतः विष्णु के दशावतार, ब्रह्मा, नर्तकी और मनमोहक द्ृश्यों की कलाकृतिंया शामिल है। बावली में जहाँ पानी की सतह है वहाँ पर हमें विष्णु का शेषनाग वाला अवतार देखने को मिलता है।

19Jun2021

Agra Facts : आगरा किला, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, उत्तर प्रदेश के आगरा में स्थित एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। यह ताजमहल से लगभग 2.5 किलोमीटर दूर है, जो दुनिया के सात अजूबों में से एक है। वर्तमान समय की संरचना मुगलों द्वारा बनाई गई थी, हालांकि यह कहा जाता है कि यह 11 वीं शताब्दी से ‘‘बादलगढ़’’ के नाम से यहां खड़ा है।
अधिक दिलचस्प इतिहास तथ्यों पर एक नजर डालें।

6Apr2021

रोलर कोस्टर (Roller Coaster) की सवारी सबसे रोमांचक अनुभवों में से एक हैं। इसमें तेज रफ्तार के साथ ऊपर-नीचे व सीधे-उलटे होते हुए जब तेजी से आगे बढ़ते हैं तो रोमांच का एक अलग ही आनंद महसूस होता है। विश्व भर के एम्यूजमैंट पार्क्स  में छोटे-बड़े से लेकर बेहद लम्बे तथा ऊंचे-नीचे कई डिजाइनों वाले रोलर कोस्टर हैं। कुछ पर सवारी तो इतनी डरा देती है कि उन पर केवल मजबूत दिल वाले ही सवार हो सकते हैं।

4Apr2021

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती (Maharishi Swami Dayanand Saraswati), आधुनिक भारत के महान चिन्तक, समाज-सुधारक व देशभक्त थे। उन्होंने 1874 में एक आर्य सुधारक संगठन – आर्य समाज की स्थापना की। वे एक संन्यासी तथा एक महान चिंतक थे।