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भाग्य और योग्यता का मेल
अक्सर हम जीवन में देखते हैं कि कभी-कभी किसी ऐसे व्यक्ति को बहुत बड़ी सफलता या कोई कीमती चीज़ मिल जाती है, जिसके वह काबिल नहीं होता। इसी स्थिति को दर्शाने के लिए हमारे बड़े-बुजुर्गों ने मुहावरा बनाया है—"अंधे के हाथ बटेर लगना"। यहाँ 'बटेर' एक छोटे और फुर्तीले पक्षी का प्रतीक है जिसे पकड़ना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन अगर कोई उसे बिना प्रयास के पकड़ ले, तो वह केवल एक इत्तेफाक होता है। यह कहानी 'नीलांचल घाटी' के एक आलसी लड़के गोलू की है, जिसे किस्मत से एक खजाना तो मिला, पर क्या वह उसे संभाल पाया? आइए जानते हैं।
नीलांचल घाटी का सबसे बड़ा आलसी: गोलू
हिमालय की वादियों में बसा एक छोटा सा गाँव था 'नीलांचल'। यहाँ के लोग बहुत मेहनती थे। कोई खेतों में पसीना बहाता, तो कोई जंगल से लकड़ियाँ चुनता। लेकिन इसी गाँव में गोलू नाम का एक लड़का रहता था, जिसका 'काम' से पुराना दुश्मनी का नाता था।
गोलू का पूरा दिन पेड़ों की छाया में सोने, मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने और दूसरों की बातें सुनने में बीतता था। उसके माता-पिता उसे समझाते-समझाते थक गए थे, लेकिन गोलू हमेशा कहता, "पिताजी, मेहनत तो गधे भी करते हैं, मैं तो उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब मेरी किस्मत चमकेगी और मुझे कुछ भी करना नहीं पड़ेगा।"
गोलू का एक दोस्त था चिंटू। चिंटू बहुत ही व्यावहारिक और मेहनती लड़का था। वह कहता, "गोलू, किस्मत भी उन्हीं का साथ देती है जो खुद अपनी मदद करते हैं।" पर गोलू बस एक कान से सुनता और दूसरे से निकाल देता।
वह दोपहर और किस्मत का अनोखा खेल
एक दिन, दोपहर की कड़ी धूप में गोलू एक पुराने सूखे कुएं के पास नीम के पेड़ के नीचे सो रहा था। अचानक, ऊपर से एक बड़ा सा बाज (Eagle) गुज़रा। उस बाज के पंजों में एक पीतल का छोटा सा घड़ा (कलश) फंसा हुआ था, जो शायद किसी पुराने मंदिर या खंडहर से उसने उठाया था।
उड़ते समय बाज का संतुलन बिगड़ा और वह कलश सीधे गोलू के पेट पर आ गिरा। गोलू हड़बड़ा कर उठा। उसने देखा कि उसके सामने एक चमकता हुआ पीतल का कलश पड़ा है।
"अरे! यह क्या है? क्या ऊपर से सोना गिर रहा है?" गोलू ने हैरानी से कहा।
उसने कलश खोला तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह कलश कोई साधारण बर्तन नहीं था, बल्कि उसमें चमकते हुए प्राचीन सिक्के और दुर्लभ रत्न भरे थे। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसे—"अंधे के हाथ बटेर लग जाना"। बिना किसी खुदाई के, बिना किसी मेहनत के, गोलू को वह मिल गया था जिसके लिए लोग पूरी उम्र लगा देते हैं।
बिना मेहनत की सफलता का अहंकार
गोलू खुशी के मारे नाचने लगा। उसने गाँव में शोर मचा दिया, "देखो! मेरी किस्मत चमक गई! अब मुझे कभी काम नहीं करना पड़ेगा।"
गाँव के लोग हैरान थे। चिंटू ने जब यह सुना, तो वह भी देखने आया। उसने गौर से कलश को देखा और कहा, "गोलू, यह वाकई कीमती है। लेकिन याद रखना, यह तुम्हें किस्मत से मिला है। इसे सही जगह निवेश करो या इसकी सुरक्षा का इंतज़ाम करो, वरना इसे खोने में देर नहीं लगेगी।"
लेकिन गोलू तो हवा में उड़ रहा था। उसने चिंटू का मज़ाक उड़ाया, "तुम जैसे मेहनती लोग कभी किस्मत की ताकत नहीं समझ सकते। मुझे कुछ करने की ज़रूरत नहीं, अब तो बस ऐश होगी!"
जब 'बटेर' हाथ से फिसलने लगी
अब गोलू ने अपनी जीवनशैली पूरी तरह बदल ली। उसने मेहनत करना तो दूर, सोचना भी बंद कर दिया। वह रोज़ उन सिक्कों को निकालकर बाजार जाता और फिजूलखर्ची करता। उसने न तो कलश को कहीं छुपाया और न ही यह सोचा कि ये सिक्के कभी खत्म भी हो सकते हैं।
धीरे-धीरे, गोलू के पास मुफ़्त का खाना खाने वाले चापलूस दोस्तों की फौज जमा हो गई। वे उसे उकसाते, "गोलू भाई, आप तो राजा हैं! ये पैसे तो कभी खत्म नहीं होंगे।"
तर्क और बुद्धि का इस्तेमाल न करने के कारण, गोलू यह नहीं देख पा रहा था कि उसकी असावधानी की वजह से चोरों की नज़र उस पर पड़ चुकी थी। एक रात, जब गोलू अपनी आदतों के मुताबिक गहरी नींद में सो रहा था, कुछ शातिर चोर उसके घर में घुसे।
गोलू इतना लापरवाह था कि उसने कलश को तकिये के पास ही रखा हुआ था। चोरों ने बड़ी आसानी से वह कलश उठा लिया। उन्हें तो बस वह 'बटेर' (खजाना) उठाना था जो गोलू के पास बिना किसी सुरक्षा के पड़ा था।
होश आया, पर तब तक देर हो चुकी थी
अगली सुबह जब गोलू उठा, तो उसने हाथ फैलाकर कलश ढूंढा, पर वहाँ कुछ नहीं था। वह जोर-जोर से रोने लगा, "मेरा खजाना चोरी हो गया! मेरी किस्मत लुट गई!"
पूरा गाँव इकट्ठा हो गया। चिंटू भी वहाँ पहुँचा। उसने देखा कि गोलू का घर का दरवाज़ा तक खुला था।
चिंटू ने दुखी होकर कहा, "गोलू, जब तुम्हें वह खजाना मिला था, तो वह 'अंधे के हाथ बटेर लगने' जैसा था। लेकिन उस बटेर को पिंजरे में रखना या उसे संभालना तुम्हारी योग्यता पर निर्भर था। तुमने बिना मेहनत के मिली चीज़ का सम्मान नहीं किया, इसलिए वह चली गई।"
गोलू को अब समझ आया कि किस्मत से कोई चीज़ मिल तो सकती है, लेकिन उसे बनाए रखने के लिए मेहनत और समझदारी की ज़रूरत होती है। गोलू की 'बटेर' अब किसी और के हाथ में थी।
निष्कर्ष: मेहनत ही असली खजाना है
इस घटना के बाद गोलू बदल गया। उसने रोना छोड़ा और पहली बार फावड़ा उठाकर चिंटू के साथ खेत की ओर चल पड़ा। उसने समझ लिया था कि किस्मत से मिली सफलता एक 'फ्लूक' (fluke) हो सकती है, लेकिन पसीने की कमाई का सिक्का हमेशा पास रहता है।
नीलांचल घाटी में अब गोलू आलसी के रूप में नहीं, बल्कि एक उभरते हुए मेहनती किसान के रूप में जाना जाने लगा। उसने खुद से वादा किया कि अब वह कभी 'अंधे के हाथ बटेर लगने' का इंतज़ार नहीं करेगा, बल्कि खुद अपनी मेहनत से अपना मुकाम बनाएगा।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
यह कहानी हमें सिखाती है कि "बिना योग्यता और परिश्रम के मिली सफलता कभी स्थायी नहीं होती।" मुहावरा "अंधे के हाथ बटेर लगना" हमें चेतावनी देता है कि अगर हमें कोई चीज़ किस्मत से मिल भी जाए, तो उसे संभालने के लिए हमें बुद्धिमानी और प्रयास की आवश्यकता होती है। असली खुशी और सुरक्षा उसी चीज़ में है जिसे हमने अपनी मेहनत से हासिल किया हो।
मुहावरों और उनके अर्थ के बारे में और अधिक जानने के लिए आप मुहावरा - विकिपीडिया देख सकते हैं।
