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प्रस्तावना: बुद्धि और चापलूसी का द्वंद्व
इतिहास की कहानियों में अक्सर बुद्धिमान सलाहकारों के किस्से सुनने को मिलते हैं। अक्सर राजाओं के दरबार में कुछ ऐसे दरबारी होते हैं जो मेहनत के बजाय चापलूसी और धोखे से इनाम जीतना चाहते हैं। लेकिन जहाँ 'चतुर चैतन्य' जैसे बुद्धिमान सलाहकार हों, वहां झूठ के पैर ज़्यादा देर नहीं टिक पाते। "चतुर चैतन्य और लाल मोर" की यह कहानी हमें सिखाती है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ और राजा को मूर्ख बनाने की कोशिश हमेशा महंगी पड़ती है। आइए चलते हैं 'चित्रमयी' के दरबार में, जहाँ एक लाल मोर ने सबका ध्यान खींचा, पर चैतन्य ने अपनी तर्कशक्ति से असली रंग उजागर कर दिया।
चित्रमयी का दरबार और महाराज महेंद्र का शौक
दक्षिण भारत का एक सुंदर और समृद्ध राज्य था—'चित्रमयी'। यहाँ के राजा महाराज महेंद्र अपनी कलाप्रियता और दुर्लभ वस्तुओं के संग्रह के लिए जाने जाते थे। उन्हें अनोखे पशु-पक्षियों और दुर्लभ रत्नों का बहुत शौक था। दरबार में चापलूस मंत्रियों की कोई कमी नहीं थी, जो हमेशा राजा को खुश करने के लिए नए-नए 'चमत्कार' ढूंढकर लाते थे।
इन्हीं मंत्रियों में एक था मंत्री दुर्जन सिंह। दुर्जन सिंह को काम करने से ज्यादा इनाम बटोरने का शौक था। वह हमेशा इस ताक में रहता था कि कैसे महाराज को मूर्ख बनाकर स्वर्ण मुद्राएं ऐंठी जाएं। दूसरी ओर, महाराज के सबसे प्रिय और चतुर सलाहकार थे चैतन्य। चैतन्य अपनी हाज़िरजवाबी और तर्क (Logic) के लिए मशहूर थे। दुर्जन सिंह हमेशा चैतन्य को नीचा दिखाने की कोशिश करता, पर हर बार खुद ही अपनी जाल में फँस जाता।
दुर्जन सिंह की 'खूनी' योजना: लाल मोर का आगमन
एक बार चित्रमयी में भारी अकाल पड़ा। लोग परेशान थे, पर दुर्जन सिंह को अपनी जेब भरने की सूझी। उसने सोचा, "अगर मैं महाराज को कोई ऐसी चीज़ दिखाऊं जो दुनिया में कहीं न हो, तो वे मुझे मालामाल कर देंगे।"
उसने एक चतुर चित्रकार को बुलाया और उसे एक साधारण मोर दिया। दुर्जन सिंह ने उसे आदेश दिया, "इस मोर को ऐसे लाल रंग में रंग दो कि यह कुदरती लगे। ऐसा रंग जो छूने से भी न निकले।" चित्रकार ने कई दिनों की मेहनत के बाद मोर को गहरे लाल और सुनहरे रंग से ऐसा रंगा कि वह किसी जादुई पक्षी जैसा दिखने लगा।
अगले दिन दुर्जन सिंह बड़े ठाठ-बाट से दरबार में पहुँचा। उसके पीछे दो सेवक एक बड़े से ढके हुए पिंजरे को लेकर आ रहे थे।
"महाराज की जय हो! मैं आपके लिए हिमालय की गुप्त कंदराओं से एक ऐसा पक्षी लाया हूँ जिसे आज तक किसी इंसान ने नहीं देखा—अग्नि-मयूर यानी लाल मोर!" दुर्जन सिंह ने गर्व से कहा।
दरबार में हैरत और अविश्वास
जैसे ही पिंजरे से पर्दा हटा, पूरा दरबार सन्न रह गया। वहां एक चमकदार लाल रंग का मोर खड़ा था। उसकी गर्दन नीली नहीं, बल्कि गहरे रूबी जैसी लाल थी और उसके पंखों पर सुनहरे चाँद बने थे।
महाराज महेंद्र अपनी गद्दी से खड़े हो गए। "अद्भुत! हमने सुना था कि लाल मोर केवल कथाओं में होते हैं, पर आज प्रत्यक्ष देख लिया। दुर्जन सिंह, तुमने चित्रमयी का मान बढ़ा दिया है।" महाराज ने तुरंत दुर्जन सिंह को 10,000 स्वर्ण मुद्राएं इनाम देने की घोषणा कर दी।
चैतन्य की तर्कशक्ति और संदेह
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जहाँ सारा दरबार मोर की सुंदरता में खोया था, चतुर चैतन्य शांति से उस मोर को निहार रहे थे। उन्होंने गौर किया कि वह मोर बहुत ही असहज महसूस कर रहा था। वह अपने पंख नहीं फड़फड़ा रहा था और बार-बार अपनी चोंच से अपने परों को खुजलाने की कोशिश कर रहा था।
चैतन्य ने तर्क लगाया— "प्रकृति में लाल रंग अक्सर खतरे का संकेत होता है या फिर फूलों में पाया जाता है। मोर जैसे पक्षी का पूरा शरीर लाल होना जैविक रूप से संभव नहीं लगता। और सबसे बड़ी बात, इस मोर के पास से हल्की सी 'तारपीन के तेल' और गोंद की गंध आ रही थी।"
चैतन्य मुस्कुराए और बोले, "महाराज, दुर्जन सिंह जी वाकई काबिले-तारीफ हैं। लेकिन हिमालय के इस दुर्लभ पक्षी को चित्रमयी की गर्मी बर्दाश्त नहीं होगी। मेरा सुझाव है कि इसे एक खास स्नान कराया जाए ताकि यह तरोताज़ा महसूस करे।"
दुर्जन सिंह के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। "नहीं महाराज! यह जादुई मोर है, इसे पानी से डर लगता है।"
बारिश का जादू और असली रंग
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चैतन्य पहले ही समझ चुके थे। उन्होंने चुपके से अपने एक सेवक को इशारा किया। सेवक ने छत के ऊपर से गुलाब जल छिड़कने का नाटक किया। लेकिन उस गुलाब जल में चैतन्य ने चुपके से नींबू का रस और कुछ खास तेल मिला रखा था जो पेंट (रंग) को तुरंत काट देते थे।
जैसे ही मोर के ऊपर वह पानी पड़ा, मोर तेज़ी से अपने पंख फड़फड़ाने लगा। और देखते ही देखते दरबार में एक मज़ेदार नज़ारा दिखा। मोर के शरीर से लाल रंग की धारियां बहने लगीं और कालीन लाल हो गया। कुछ ही मिनटों में वह 'अग्नि-मयूर' वापस एक साधारण हरा-नीला मोर बन गया।
महाराज महेंद्र क्रोध से कांपने लगे। "यह क्या मज़ाक है दुर्जन सिंह? तुमने एक बेज़ुबान पक्षी को रंगकर हमें धोखा देने की जुर्रत की?"
चैतन्य की हाज़िरजवाबी और इनाम
दुर्जन सिंह घुटनों के बल गिर पड़ा। "महाराज, मुझे माफ कर दीजिए। मैं तो बस आपको खुश करना चाहता था।"
चैतन्य ने हंसते हुए कहा, "महाराज, दुर्जन सिंह जी ने एक बात तो सच कही थी। यह मोर सचमुच दुर्लभ है क्योंकि यह दुनिया का इकलौता मोर है जिसने दरबार में 'लाल स्नान' किया है।"
महाराज ने दुर्जन सिंह से वह 10,000 स्वर्ण मुद्राएं वापस लीं और उसे कालकोठरी में डाल दिया। वह सारा इनाम चैतन्य को दिया गया। चैतन्य ने वह धन अपने पास रखने के बजाय चित्रमयी के अकाल से पीड़ित लोगों की मदद के लिए दान कर दिया।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
यह कहानी हमें सिखाती है कि "धोखे की उम्र बहुत छोटी होती है और सच्चाई को तर्क से कभी भी उजागर किया जा सकता है।" चापलूसी करके आप थोड़े समय के लिए किसी का दिल जीत सकते हैं, लेकिन अंत में आपकी बुद्धिमानी और ईमानदारी ही काम आती है। प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करना और झूठ का सहारा लेना हमेशा अपमान का कारण बनता है।
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