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कंजूसी और बुद्धिमानी का फर्क
बचत करना एक अच्छी आदत है, लेकिन जब बचत 'कंजूसी' की सीमा पार कर 'महा-कंजूसी' बन जाए, तो वह अक्सर हँसी का पात्र बन जाती है। हम अक्सर अपने जीवन में ऐसे लोगों से मिलते हैं जो दो पैसे बचाने के लिए अपना सारा सुख-चैन दांव पर लगा देते हैं। यह कहानी 'चटपटपुर' के एक ऐसे ही महान हस्ती की है, जिनकी कंजूसी के किस्से पूरे जिले में मशहूर थे। इस कहानी के माध्यम से बच्चे हँसी-हँसी में यह सीखेंगे कि हद से ज्यादा लालच और कंजूसी हमेशा नुकसान ही पहुँचाती है।
चटपटपुर के शान: लाला मक्खनलाल और उनकी अनोखी आदतें
दूर एक छोटा सा शहर था 'चटपटपुर'। इस शहर में लाला मक्खनलाल नाम के एक बहुत ही अमीर व्यापारी रहते थे। लाला जी के पास धन की कोई कमी नहीं थी, पर उनका दिल एक फटे हुए पुराने बटुए जैसा छोटा था। लोग कहते थे कि लाला मक्खनलाल अगर एक बार अपनी मुट्ठी बंद कर लें, तो हवा भी बाहर नहीं निकल पाती थी।
उनकी कंजूसी के चर्चे कुछ ऐसे थे—वे अपनी रोटियों पर घी नहीं लगाते थे, बल्कि घी के डिब्बे को सिर्फ रोटियों के सामने रख देते थे ताकि रोटियाँ घी की खुशबू देख कर ही तृप्त हो जाएं। उनकी छाता इतनी पुरानी थी कि उसमें बारिश का पानी कम और धूप ज्यादा आती थी, फिर भी वे नई छाता नहीं खरीदते थे क्योंकि उनका मानना था कि 'कपड़ा ही तो फटा है, डंडा तो अभी नया है!'
एक नारियल की इच्छा और कंजूसी का ताना-बाना
एक दिन लाला मक्खनलाल का मन हुआ कि वे भगवान को एक नारियल चढ़ाएं और फिर उसे प्रसाद के रूप में खाएं। अब नारियल की बात आते ही उनके दिमाग में दो रुपये बचाने का हिसाब चलने लगा। वे अपनी धोती कसकर बांधी और निकल पड़े बाज़ार की ओर।
बाज़ार पहुँचकर उन्होंने पहले नारियल वाले से पूछा, "भाई, एक ताज़ा पानी वाला नारियल कितने का है?"
नारियल वाले ने जवाब दिया, "लाला जी, सिर्फ 10 रुपये का।"
लाला जी ने अपना माथा पीटा और बोले, "10 रुपये? अरे भाई, इतना महंगा! मैं तो इसके 5 रुपये ही दूँगा।"
नारियल वाला मुस्कुराया और बोला, "लाला जी, अगर आपको 5 रुपये में चाहिए, तो यहाँ से दो मील दूर थोक बाज़ार चले जाइए। वहाँ आपको सस्ता मिल जाएगा।"
बाज़ार दर बाज़ार: मुफ्त की तलाश में लाला जी
लाला मक्खनलाल ने सोचा, "दो मील चलने में क्या बुराई है? चप्पल थोड़े ही घिसेंगी, पर 5 रुपये तो बचेंगे!" वे धूप में पैदल ही चल पड़े। थोक बाज़ार पहुँचकर उन्होंने एक और दुकानदार से दाम पूछा।
दुकानदार ने कहा, "लाला जी, यहाँ नारियल 5 रुपये का है।"
लाला जी बोले, "5 रुपये? अरे, मैं इतनी दूर पैदल चलकर आया हूँ, मुझे तो यह 2 रुपये में चाहिए।"
दुकानदार चिढ़ गया और बोला, "2 रुपये में तो यह आपको सीधे समुद्र किनारे की मंडी में ही मिलेगा। यहाँ से पाँच मील दूर है।"
लाला मक्खनलाल का पसीना बह रहा था, लेकिन 'बचत' का भूत सवार था। उन्होंने सोचा, "5 रुपये का नारियल और 2 रुपये में मिले, तो 3 रुपये का शुद्ध मुनाफा! और पैदल चलने से सेहत भी तो बनती है।"
पाँच मील पैदल चलने के बाद वे समुद्र किनारे पहुँचे। वहाँ नारियल की भरमार थी। लाला जी ने एक बूढ़े माली से पूछा, "बाबा, एक नारियल कितने का दोगे?"
माली ने कहा, "बेटा, 2 रुपये का।"
लाला जी अब अपनी हदें पार कर चुके थे। वे बोले, "बाबा, इतनी दूर से आया हूँ, प्यास भी लगी है। क्या मुझे यह मुफ्त (फ्री) में नहीं मिल सकता?"
माली ने पेड़ की ओर इशारा करते हुए कहा, "बेटा, अगर हिम्मत है तो खुद पेड़ पर चढ़ जाओ। जितने नारियल चाहो, मुफ्त में तोड़ लो।"
नारियल का पेड़ और लाला जी की उड़ान
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'मुफ्त' शब्द सुनते ही लाला मक्खनलाल की आँखों में चमक आ गई। उन्होंने अपनी उम्र और अपनी तोंद का भी ख्याल नहीं किया। उन्होंने अपनी धोती को ऊपर चढ़ाया और 'हईशा' कहकर नारियल के ऊँचे पेड़ पर चढ़ने लगे।
लाला जी जैसे-तैसे पेड़ के सबसे ऊपर पहुँच गए। उन्होंने एक बड़ा सा नारियल पकड़ा और उसे जोर से खींचा। नारियल तो टूट गया, लेकिन उसी समय लाला जी के पैर फिसल गए। अब लाला जी के हाथ में नारियल था और वे हवा में लटके हुए थे।
वे चिल्लाए, "बचाओ! कोई मुझे बचाओ!"
तभी नीचे से एक ऊँट वाला गुज़रा। लाला जी ने उसे पुकारा, "भाई ऊँट वाले, अगर तुम अपने ऊँट पर खड़े होकर मेरे पैर पकड़ लो, तो मैं तुम्हें 100 रुपये दूँगा।"
ऊँट वाला लालची था। उसने सोचा 100 रुपये का काम आसान है। वह ऊँट पर खड़ा हुआ और लाला जी के पैर पकड़ लिए। लेकिन तभी ऊँट ने एक रसीली झाड़ी देखी और आगे बढ़ गया। अब लाला जी के पैरों पर ऊँट वाला लटका हुआ था और लाला जी पेड़ से!
लाला जी ने फिर चिल्लाया, "मदद! मदद!"
पीछे से एक घुड़सवार आया। लाला जी ने उससे कहा, "भाई, अगर तुम हम दोनों को उतार दो, तो मैं तुम्हें 500 रुपये दूँगा।"
घुड़सवार ने भी लालच में आकर घोड़े पर खड़े होकर ऊँट वाले के पैर पकड़ लिए। लेकिन घोड़ा भी घास के चक्कर में आगे निकल गया। अब पेड़ पर तीन लोग लटके हुए थे—सबसे ऊपर लाला जी, उनके नीचे ऊँट वाला और सबसे नीचे घुड़सवार।
घुड़सवार चिल्लाया, "लाला जी, पकड़ ढीली मत करना! मैं आपको 1000 रुपये दूँगा।"
ऊँट वाला बोला, "मैं भी आपको 2000 रुपये दूँगा, बस पकड़ कर रखना!"
3000 रुपये की बात सुनते ही लाला मक्खनलाल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने जोश में आकर अपनी दोनों बाहें फैला दीं और चिल्लाए, "वाह! पूरे 3000 रुपये!"
जैसे ही उन्होंने हाथ फैलाए, नारियल हाथ से छूट गया और तीनों धड़ाम से नीचे रेतीली जमीन पर गिरे।
निष्कर्ष: कंजूसी का महंगा हिसाब
गिरने के बाद लाला मक्खनलाल की हड्डियाँ तो बच गईं, लेकिन उनके कपड़े फट चुके थे और चप्पलें कहीं खो गई थीं। जिस 10 रुपये के नारियल के लिए उन्होंने 7 मील की यात्रा की, उसके बदले उन्हें ऊँट वाले और घुड़सवार को हर्जाना देना पड़ा। साथ ही, बाज़ार से वापस घर जाने के लिए उन्हें पालकी वाले को 50 रुपये देने पड़े क्योंकि उनके पैरों में चलने की ताकत नहीं बची थी।
लाला जी समझ गए थे कि 'मुफ्त' की चीज़ कभी-कभी बहुत महंगी पड़ती है।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
यह कहानी हमें सिखाती है कि "अति सर्वत्र वर्जयेत्" (Excess of everything is bad)। बचत करना अच्छी बात है, लेकिन अत्यधिक कंजूसी और मुफ्त के लालच में इंसान अपनी बुद्धि खो देता है, जिसका परिणाम हमेशा नुकसानदायक ही होता है। हमें अपनी सुख-सुविधा और स्वास्थ्य की कीमत पर पैसा बचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
कंजूसी के मनोविज्ञान के बारे में और अधिक जानने के लिए आप लालच - विकिपीडिया देख सकते हैं।
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