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असली दोस्त कौन | Jungle Story

मीठी बातें करने वाला हर शख्स दोस्त नहीं होता। पढ़िए 'दोस्ती का भ्रम' की यह दिलचस्प कहानी जहाँ एक चालाक लोमड़ी ने भोले मुर्गे को अपने जाल में फंसाना चाहा।

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दुनिया में सबसे खतरनाक दुश्मन वो होता है जो दोस्त बनकर आता है। अक्सर हम मीठी-मीठी तारीफों के जाल में फंसकर Dosti Ka Bhram पाल लेते हैं और उन लोगों पर भरोसा कर बैठते हैं जो असल में हमारा बुरा चाहते हैं। यह कहानी 'चंपापुर' के एक सुरीले मुर्गे रंकु और एक धूर्त लोमड़ीचमेली की है। रंकु को अपनी आवाज़ और अपनी नई 'दोस्त' पर बहुत घमंड था, लेकिन जब जान पर बन आई, तब उसे समझ आया कि असली दोस्त और मतलबी दोस्त में क्या फर्क होता है।

कहानी: तारीफों का ज़हरीला जाल

रंकु का सुर और घमंड

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चंपापुर गाँव के किनारे एक बड़ा सा खेत था, जहाँ रंकु नाम का एक मुर्गा रहता था। रंकु दिखने में बहुत सुंदर था—लाल कलगी, चमकदार सुनहरे पंख और एक रौबदार चाल। लेकिन रंकु की सबसे बड़ी खासियत थी उसकी आवाज़। जब वह सुबह बांग देता, तो लगता जैसे संगीत बज रहा हो।

रंकु को अपनी तारीफ सुनना बहुत पसंद था। खेत का पुराना कुत्ता शेरू उसे अक्सर समझाता, "रंकु भाई, अपनी सुरक्षा का ध्यान रखा करो। जंगल पास ही है, और तुम बाड़ (Fence) के बहुत करीब चले जाते हो।" रंकु अकड़ कर जवाब देता, "अरे शेरू काका! आप तो बस जलते हो। मेरी आवाज़ सुनने के लिए तो दूर-दूर से लोग आते हैं। मुझे कोई खतरा नहीं है।"

चमेली लोमड़ी की एंट्री

जंगल के किनारे झाड़ियों में चमेली नाम की एक लोमड़ी रहती थी। वह बहुत चालाक और भूखी थी। कई दिनों से उसकी नज़र रंकु पर थी, लेकिन शेरू कुत्ते की वजह से वह खेत में घुस नहीं पाती थी।

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चमेली ने सोचा, "शिकार को ताकत से नहीं, दिमाग से पकड़ना होगा। इस मुर्गे को अपनी तारीफ बहुत पसंद है, यही इसकी कमज़ोरी है।"

एक सुहानी शाम, जब शेरू सो रहा था, रंकु खेत की बाड़ पर बैठकर गाना गा रहा था। चमेली धीरे से बाड़ के नीचे आई और बड़ी ही विनम्रता से बोली, "वाह! वाह! क्या गला पाया है! क्या ये साक्षात तानसेन गा रहे हैं?"

रंकु ने नीचे देखा। एक लोमड़ी उसे बड़े प्यार से निहार रही थी। रंकु थोड़ा डरा, लेकिन तारीफ सुनकर उसका सीना फूल गया। "तुम कौन हो?" रंकु ने पूछा।

चमेली ने हाथ (पंजे) जोड़कर कहा, "मैं चमेली हूँ। मैं जंगल की 'संगीत सभा' की अध्यक्ष हूँ। मैंने कई पक्षियों को गाते सुना है, लेकिन आपकी आवाज़ में जो जादू है, वो कहीं नहीं। सच में, आप तो जंगल के राजा बनने लायक हैं।"

दोस्ती का गहराता भ्रम

रंकु खुश हो गया। उसे लगा कि आखिरकार किसी ने उसकी असली प्रतिभा को पहचाना। उस दिन के बाद, चमेली रोज़ शाम को आती। वह रंकु के लिए जंगल से कभी मीठे बेर लाती, तो कभी रंग-बिरंगे फूल। वह घंटों बैठकर रंकु की झूठी तारीफें करती।

रंकु को दोस्ती का भ्रम हो गया। उसे लगने लगा कि चमेली उसकी सबसे अच्छी दोस्त है। शेरू कुत्ते ने रंकु को चेतावनी दी, "रंकु, लोमड़ी जात कभी किसी की सगी नहीं होती। उससे दूर रहो।" रंकु ने चिढ़कर कहा, "काका, आप उसकी अच्छाई नहीं देख सकते। वह मेरी कला की कद्रदान है। आप सब तो बस मुझे दाना चुगने वाला पक्षी समझते हो, लेकिन वह मुझे 'कलाकार' मानती है।"

शेरू ने सिर हिलाया और चुप हो गया। उसे पता था कि विनाश नज़दीक है।

दावत का न्योता और असली चेहरा

एक दिन चमेली ने अपना आखिरी दांव चला। वह बहुत उदास चेहरा बनाकर आई। रंकु ने पूछा, "क्या हुआ चमेली बहन?"

चमेली बोली, "रंकु जी, मैंने जंगल के सभी जानवरों को बताया है कि मेरा दोस्त कितना अच्छा गाता है। वे सब आपसे मिलना चाहते हैं। आज रात मैंने जंगल में आपके सम्मान में एक 'विशेष दावत' रखी है। क्या आप मेरे साथ चलेंगे? बस एक रात की बात है, फिर मैं आपको वापस छोड़ जाऊंगी।"

रंकु फूला नहीं समाया। जंगल में दावत! और वो भी उसके सम्मान में! बिना सोचे-समझे, रंकु बाड़ से नीचे कूद गया। "चलो दोस्त! आज मैं सबको अपना गाना सुनाऊंगा।"

चमेली मन ही मन हँसी। "हां, आज दावत तो होगी, लेकिन गाने की नहीं, तुम्हारे मांस की!"

वे जंगल के अंदर जाने लगे। जैसे-जैसे वे गहरे जंगल में पहुंचे, चमेली की चाल बदलने लगी। उसकी विनम्रता गायब हो गई और आँखों में क्रूरता आ गई। एक सुनसान जगह पर पहुँचकर चमेली रुकी और रंकु की तरफ पलटी।

"दावत कहाँ है?" रंकु ने पूछा। चमेली ने अपने नुकीले दांत दिखाए और गुर्राई, "दावत मेरे पेट में है, और भोजन तुम हो! बेवकूफ मुर्गे, क्या लोमड़ी और मुर्गे की भी कभी दोस्ती हो सकती है?"

रंकु की सूझबूझ

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रंकु के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसे शेरू काका की बात याद आई। उसे समझ आ गया कि वह दोस्ती के भ्रम में अपनी मौत के पास खुद चलकर आया है। चमेली उस पर झपटने ही वाली थी कि रंकु ने अपनी घबराहट छिपाई और ज़ोर से हँसा।

चमेली रुक गई। "तुम हँस क्यों रहे हो? मरने वाले हो!"

रंकु बोला, "अरे चमेली, तुम मुझे खा लेना। मुझे कोई गम नहीं। लेकिन मुझे हँसी इस बात पर आ रही है कि तुम भी बेवकूफ निकली।" "क्या मतलब?" चमेली ने गुस्से से पूछा।

रंकु ने कहा, "शेरू काका कह रहे थे कि जंगल की लोमड़ियां बासी शिकार खाती हैं। मैंने सोचा था तुम ताज़ा खाने की शौकीन हो। लेकिन तुम्हें पता नहीं कि आज सुबह ही मैंने खेत में पड़ा 'ज़हरीला कीड़ा' खा लिया था। मेरा पूरा शरीर अभी ज़हर से भरा है। मुझे तो चक्कर आ रहे थे, इसलिए मैंने सोचा तुम्हारे पास आ जाऊं। अगर तुम मुझे खाओगी, तो तुम भी तड़प-तड़प कर मर जाओगी।"

चमेली डर गई। वह चालाक थी, लेकिन वह अपनी जान से भी प्यार करती थी। वह सोच में पड़ गई। "तुम झूठ बोल रहे हो!" वह गुर्राई।

रंकु ने आँखें बंद कर लीं और लड़खड़ाने का नाटक किया, "विश्वास नहीं होता तो खा लो। देखो, मेरा रंग भी नीला पड़ रहा है।" (रात के अंधेरे में चमेली को ठीक से दिख नहीं रहा था)।

चमेली घबरा गई। उसने सोचा, "बेकार में जान क्यों गंवानी। कोई और शिकार ढूँढ़ लूंगी।" वह पीछे हटी और वहां से भाग खड़ी हुई।

वापसी और सबक

जैसे ही चमेली ओझल हुई, रंकु ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर दौड़ लगाई। वह भागता-भागता खेत की बाड़ तक पहुँचा और उड़कर सुरक्षित अपनी जगह पर बैठ गया। उसका सांस फूल रहा था और दिल ज़ोर से धड़क रहा था।

शेरू काका जाग रहे थे। उन्होंने रंकु की हालत देखी और समझ गए। रंकु ने सिर झुकाकर कहा, "काका, आप सही थे। वह दोस्ती नहीं, मेरा भ्रम था। तारीफ सुनने के लालच ने मुझे अंधा कर दिया था।"

उस दिन के बाद रंकु ने कभी किसी अजनबी की चिकनी-चुपड़ी बातों पर भरोसा नहीं किया। उसने अपनी कला का प्रदर्शन सिर्फ अपनों के बीच किया, जो उसकी सुरक्षा भी करते थे।

निष्कर्ष: असली परख

रंकु की कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा दोस्त वह नहीं जो सिर्फ़ आपकी 'तारीफ' करे, बल्कि वह है जो आपको 'सही रास्ता' दिखाए, चाहे वह कड़वा ही क्यों न लगे।

इस कहानी से सीख (Moral)

इस कहानी से हमें ये अनमोल सीख मिलती हैं:

  1. चापलूसी से बचें: जो लोग ज़रूरत से ज्यादा और बिना मतलब के आपकी तारीफ करें, उनसे सावधान रहना चाहिए।

  2. समानता में दोस्ती: दोस्ती हमेशा बराबरी वालों में और सही नीयत वालों के साथ करनी चाहिए। शिकारी कभी शिकार का दोस्त नहीं हो सकता।

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