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ईमानदारी बनाम छोटा रास्ता
अक्सर हमें लगता है कि 'शॉर्टकट' या बेईमानी करके हम दूसरों से आगे निकल सकते हैं। हमें लगता है कि किसी को पता नहीं चलेगा और हम कम मेहनत में ज्यादा फल पा लेंगे। लेकिन सच तो यह है कि बेईमानी की नींव पर खड़ी सफलता ताश के पत्तों के महल जैसी होती है, जो ज़रा सी हवा चलते ही ढह जाती है। "बेईमानी की सजा" की यह कहानी हमें सिखाती है कि ईमानदारी का फल भले ही देर से मिले, पर वह हमेशा मीठा और टिकाऊ होता है। आइए जानते हैं 'रंगीला वन' के झुमरू बंदर की वह दास्तान जिसने पूरे जंगल को एक बड़ा सबक दिया।
रंगीला वन का 'जुगाड़ी' झुमरू बंदर
हिमालय की वादियों के पीछे एक बहुत ही हरा-भरा और खुशहाल जंगल था, जिसे सब 'रंगीला वन' कहते थे। यहाँ हर साल कड़ाके की ठंड पड़ती थी और बर्फबारी होती थी। इसलिए, ठंड आने से पहले सभी जानवरों को अपने लिए भोजन जमा करना पड़ता था।
इसी वन में झुमरू नाम का एक बंदर रहता था। झुमरू फुर्तीला तो था, पर बहुत ही आलसी और बेईमान भी था। वह हमेशा दूसरों की मेहनत पर नज़र रखता था। उसका एक दोस्त था चीकू खरगोश। चीकू बहुत ही मेहनती और सीधा-सादा था। वह दिन भर गाजरें और रसीले फल इकट्ठा करता और उन्हें सुरक्षित गड्ढों में दबा देता था।
झुमरू अक्सर चीकू का मज़ाक उड़ाता, "अरे चीकू! तू दिन भर गधों की तरह मेहनत करता है। देख मुझे, मैं तो बस खेलता हूँ और जब भूख लगती है, तो कहीं न कहीं से जुगाड़ कर लेता हूँ।"
राजा शेर सिंह की घोषणा और सर्दियों की तैयारी
सर्दियाँ शुरू होने वाली थीं। जंगल के राजा शेर सिंह ने एक बड़ी सभा बुलाई। "साथियों, इस बार ठंड बहुत लंबी चलेगी। मैंने जंगल के उत्तरी हिस्से में एक विशाल 'भंडार घर' बनाया है। जो जानवर अपनी टोकरी भरकर सबसे ज्यादा रसीले 'शहद-बेरी' (Honey-Berries) लाएगा, उसे सर्दियों का 'सर्वश्रेष्ठ नागरिक' चुना जाएगा और उसे पूरे सीजन के लिए शाही गुफा में रहने की जगह मिलेगी।"
सभी जानवर उत्साहित हो गए। शहद-बेरी ढूँढना आसान नहीं था क्योंकि वे ऊँचे पहाड़ों की कंदराओं में ही मिलती थीं। चीकू खरगोश अगले ही दिन अपनी टोकरी लेकर निकल पड़ा। उसने कड़ी मेहनत की, ऊँचे पत्थरों पर चढ़ा और अपनी टोकरी को असली, मीठी और रसीली बेरियों से भर दिया।
झुमरू की 'स्मार्ट' योजना
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झुमरू ने देखा कि चीकू की टोकरी लगभग भर चुकी है। उसने सोचा, "अगर मैं इतनी ऊँचाई पर बेरियां ढूँढने गया, तो मेरी तो कमर टूट जाएगी। क्यों न कुछ दिमाग लगाया जाए?"
झुमरू ने एक बड़ी टोकरी ली। उसने जंगल के नीचे पड़े हुए गोल-गोल काले पत्थर और कंकड़ इकट्ठे किए। उसने टोकरी को आधे से ज्यादा उन भारी पत्थरों से भर दिया। ऊपर से उसने थोड़ी सी घास बिछाई और उसके ऊपर केवल एक परत असली शहद-बेरी की सजा दी।
ऊपर से देखने पर टोकरी फूलों और बेरियों से लबालब भरी दिख रही थी। झुमरू ने मन ही मन सोचा, "जब राजा टोकरी का वज़न करेंगे, तो पत्थरों की वजह से मेरी टोकरी सबसे भारी होगी और मैं ही विजेता बनूँगा! किसी को क्या पता चलेगा कि नीचे क्या है?"
दरबार में वज़न और झुमरू की अस्थायी जीत
अगले दिन सभी जानवर अपनी-अपनी टोकरियाँ लेकर राजा शेर सिंह के पास पहुँचे। चीकू खरगोश की टोकरी बहुत सुंदर और खुशबूदार थी। लेकिन जब झुमरू की टोकरी आई, तो उसे उठाने के लिए दो सेवकों को लगना पड़ा।
"वाह झुमरू! तुम्हारी टोकरी तो सबसे भारी है," राजा ने खुश होकर कहा।
चीकू ने हैरानी से देखा, उसे लगा कि शायद झुमरू ने रात भर जागकर काम किया होगा। राजा ने घोषणा की, "झुमरू की टोकरी सबसे भारी है, इसलिए वही इस बार का विजेता है! उसे शाही गुफा में रहने का सम्मान दिया जाता है।"
झुमरू अपनी 'चालाकी' पर बहुत खुश था। वह शाही गुफा में चला गया और बाकी जानवरों की बेरियों को एक बड़े सामूहिक गड्ढे में जमा कर दिया गया।
सर्दी का कहर और बेईमानी का पर्दाफाश
सर्दियाँ शुरू हो गईं। इस बार बर्फबारी इतनी तेज़ हुई कि पूरा जंगल सफ़ेद चादर से ढंक गया। कोई भी जानवर बाहर नहीं निकल सकता था। राजा ने आदेश दिया कि अब 'भंडार घर' खोला जाए और सभी जानवरों को उनकी लाई हुई टोकरियों के हिसाब से खाना दिया जाए।
झुमरू बहुत भूखा था। उसे अपनी लाई हुई "सबसे भारी टोकरी" का हिस्सा मिलने वाला था। जब राजा के सैनिकों ने झुमरू की टोकरी वाला हिस्सा खोला, तो ऊपर की कुछ बेरियां तो सड़ चुकी थीं। जैसे ही उन्होंने नीचे हाथ डाला, वहां से केवल काले पत्थर और कंकड़ निकले!
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पूरा दरबार सन्न रह गया। राजा शेर सिंह की दहाड़ गूँजी, "झुमरू! यह क्या है? तुमने हमें धोखा दिया? तुमने बेरियों के नाम पर पत्थर जमा किए थे?"
झुमरू डर के मारे कांपने लगा। उसकी बेईमानी सबके सामने आ चुकी थी।
निष्कर्ष: बेईमानी की सजा और माफी
झुमरू को तुरंत शाही गुफा से निकाल दिया गया। चूँकि उसने कोई असली भोजन जमा नहीं किया था, इसलिए भंडार घर में उसके लिए कोई हिस्सा नहीं था। झुमरू को कड़ाके की ठंड में भूखा रहना पड़ा। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ कि उसने केवल राजा को नहीं, बल्कि खुद को भी धोखा दिया था।
चीकू खरगोश दयालु था। उसने अपनी बेरियों में से कुछ हिस्सा झुमरू को दिया ताकि वह जीवित रह सके। झुमरू ने रोते हुए सबसे माफ़ी मांगी और कसम खाई कि वह अब कभी बेईमानी नहीं करेगा।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
यह कहानी हमें सिखाती है कि "बेईमानी से मिला फल कभी सुख नहीं देता।" धोखेबाज़ी करके आप दूसरों की नज़रों में थोड़े समय के लिए बड़े बन सकते हैं, लेकिन मुसीबत के समय आपकी सच्चाई ही आपके काम आती है। ईमानदारी का रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन उसका परिणाम हमेशा सुरक्षा और सम्मान देता है। याद रखिए, दूसरों को दिया गया धोखा अंत में हमारे पास ही वापस आता है।
बंदरों और खरगोशों के प्राकृतिक स्वभाव के बारे में और अधिक जानकारी के लिए आप बंदर - विकिपीडिया देख सकते हैं।
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