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जीवन में झगड़े होना आम बात है, लेकिन उन झगड़ों को सुलझाने के लिए हम किसके पास जाते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है। पंचतंत्र की कहानियाँ हमें यही सिखाती हैं कि "शत्रु कभी मित्र नहीं हो सकता, चाहे वह कितना भी साधु होने का दिखावा क्यों न करे।" आज की कहानी 'चंपकवन' के जंगल की है, जहाँ चीकू चिड़ा और रोलू खरगोश की आपसी तकरार का फायदा एक धोंगी बिल्ली ने उठाया। यह Chatur Billi Ki Kahani हमें सिखाती है कि घर के झगड़े घर में ही सुलझा लेने चाहिए।
कहानी: ढोंगी साधु और मूर्ख फरियादी
चीकू का प्यारा घोंसला
चंपकवन नदी के किनारे एक बहुत पुराना और घना पीपल का पेड़ था। उस पेड़ की एक सुरक्षित खोह (Hollow) में चीकू नाम का एक चिड़ा रहता था। चीकू बहुत मेहनती था। उसने तिनका-तिनका जोड़कर उस खोह को एक आरामदायक घर बनाया था। वह दिन भर दाना चुगता और शाम को अपने नरम बिछौने पर आकर सो जाता।
एक दिन चीकू को पता चला कि पास के गाँव में किसानों ने बाजरे की नई फसल काटी है और खेत में बहुत सारा दाना बिखरा पड़ा है। चीकू के मुंह में पानी आ गया। उसने सोचा, "क्यों न कुछ दिन वहीं जाकर दावत उड़ाई जाए?"
चीकू अपने घर को खाली छोड़कर गाँव की तरफ उड़ गया। वहां खाने की इतनी मौज थी कि वह घर लौटना ही भूल गया। दिन बीतते गए, हफ्ते बीत गए, चीकू वहीं मजे से रहने लगा।
रोलू खरगोश की एंट्री
इधर पीपल के पेड़ के पास एक रोलू नाम का खरगोश आया। रोलू को रहने के लिए कोई सुरक्षित जगह चाहिए थी। सूरज ढल रहा था और उसे डर था कि कोई जंगली जानवर उसे खा न जाए। तभी उसकी नज़र पेड़ की उस खोह पर पड़ी जहाँ चीकू रहता था।
रोलू ने झांककर देखा। अंदर कोई नहीं था। "अरे वाह! क्या शानदार महल है! और एकदम खाली पड़ा है," रोलू ने सोचा। उसने इधर-उधर देखा, जब कोई नहीं दिखा तो वह उस खोह में घुस गया। अंदर बहुत जगह थी और वह बहुत आरामदायक था। रोलू को वह जगह इतनी पसंद आई कि उसने वहीं डेरा जमा लिया।
वापसी और विवाद
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करीब एक महीने बाद, जब खेत का दाना खत्म हो गया, तो चीकू चिड़ा मोटा-ताज़ा होकर अपने पुराने घर लौटा। लेकिन जैसे ही वह अपनी खोह के पास पहुँचा, उसने देखा कि वहां तो रोलू खरगोश मजे से गाजर चबा रहा है।
चीकू का पारा चढ़ गया। वह चिल्लाया, "ए खरगोश! तुम यहाँ क्या कर रहे हो? यह मेरा घर है। चलो निकलो यहाँ से!"
रोलू ने बड़ी शांति से गाजर का एक टुकड़ा निगला और बोला, "कैसा घर? किसका घर? जब मैं यहाँ आया था तो यह खाली पड़ा था। जंगल का नियम है—जो जगह खाली है, उस पर जिसका कब्ज़ा, वो उसका मालिक। अब यह मेरा घर है। तुम कोई और जगह ढूँढ़ लो।"
चीकू ने गुस्से में पंख फड़फड़ाए, "पागल हो गए हो क्या? मैं कुछ दिन बाहर क्या गया, तुम तो कब्ज़ा करके बैठ गए। कुएं, तालाब और पेड़ पर मालिकाना हक़ कभी खत्म नहीं होता। यह मेरा था और मेरा ही रहेगा।"
दोनों में जमकर बहस हुई। चीकू कहता "मेरा है", रोलू कहता "मेरा है"। बात इतनी बढ़ गई कि उन्होंने फैसला किया कि वे किसी धर्मपंडित (न्यायाधीश) के पास जाएंगे और न्याय मांगेंगे।
मौसी का मायाजाल
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वे दोनों न्याय की तलाश में नदी किनारे पहुंचे। वहां उन्होंने एक अजीब नज़ारा देखा।
एक बड़ी सी बिल्ली, जिसका नाम मंदाकिनी था, नदी के किनारे एक पत्थर पर आँखें बंद करके बैठी थी। उसने गले में तुलसी की माला पहन रखी थी और माथे पर तिलक लगा रखा था। वह बड़े ही शांत स्वर में मंत्र पढ़ रही थी।
चीकू और रोलू ठिठक गए। बिल्ली तो उनकी जन्मजात दुश्मन है। चीकू बोला, "भाई, यह तो बिल्ली है। इसके पास जाना खतरे से खाली नहीं।" रोलू ने कहा, "लेकिन देखो तो सही, यह कितनी सात्विक लग रही है। शायद इसने हिंसा छोड़ दी है और अब साधु बन गई है। जंगल में और कोई समझदार दिखता भी तो नहीं।"
दोनों ने हिम्मत जुटाई और थोड़ी दूर खड़े होकर बोले, "माते! हम एक मुसीबत में हैं। हमारा फैसला कर दीजिये।"
मंदाकिनी बिल्ली तो इसी ताक में बैठी थी। उसने धीरे से अपनी एक आँख खोली, फिर बंद कर ली। उसने बड़ी ही मीठी और कोमल आवाज़ में कहा, "बच्चों, मैं बहुत बूढ़ी हो चुकी हूँ। मेरी आँखों से कम दिखता है और कानों से कम सुनाई देता है। तुम लोग डर क्यों रहे हो? मैंने बरसों पहले पाप का रास्ता छोड़ दिया है। अब मैं सिर्फ धर्म और न्याय की बातें करती हूँ। पास आओ, मेरे कान के पास आकर अपनी समस्या बताओ ताकि मैं सही फैसला कर सकूं।"
भरोसे का खूनी अंजाम
चीकू और रोलू उसकी बातों में आ गए। उन्हें लगा कि इतनी बूढ़ी और धर्म-कर्म करने वाली बिल्ली उनका क्या बिगाड़ेगी? बिल्ली ने उन्हें धर्म, अहिंसा और न्याय पर ऐसा प्रवचन दिया कि उनका बचा-खुचा डर भी खत्म हो गया।
जैसे ही वे दोनों बेखौफ होकर बिल्ली के एकदम करीब पहुंचे, मंदाकिनी बिल्ली का असली रूप सामने आ गया।
उसने बिजली की तेज़ी से पंजा मारा। एक ही झपट्टे में उसने चीकू चिड़े को दबोच लिया और दूसरे पंजे से रोलू खरगोश की गर्दन पकड़ ली। इससे पहले कि वे चीख भी पाते, 'साधु' बनी बिल्ली ने उनका काम तमाम कर दिया।
न घर चीकू का हुआ, न रोलू का। दोनों एक धूर्त दुश्मन के पेट में पहुँच गए।
निष्कर्ष: मूर्खता की सजा
जंगल के बाकी जानवरों ने जब यह देखा, तो उन्हें बहुत दुःख हुआ। उन्होंने समझा कि आपसी झगड़े में कभी भी अपने दुश्मन को पंच (Judge) नहीं बनाना चाहिए। अगर चीकू और रोलू आपस में समझौता कर लेते या जंगल के किसी शाकाहारी जानवर (जैसे हाथी या कछुए) के पास जाते, तो आज ज़िंदा होते।
अधिक जानकारी के लिए देखें: पंचतंत्र - विकिपीडिया
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