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अक्सर हम समझते हैं कि दूसरों को बेवकूफ बनाकर अपना काम निकाल लेना 'समझदारी' है। लेकिन असल में, इसे 'चालाकी' कहते हैं, और चालाकी का अंत हमेशा बुरा होता है। सच्ची समझदारी वह है जिससे सबका भला हो और किसी को नुकसान न पहुँचे। यह कहानी 'सुनहरी घाटी' के एक ऐसे ही नन्हे खरगोश की है, जो खुद को बहुत बड़ा 'उस्ताद' समझता था। "नीलू खरगोश और चालाकी की सजा" की यह कहानी बच्चों को सिखाती है कि ईमानदारी का रास्ता लंबा ज़रूर हो सकता है, लेकिन वह हमेशा सुरक्षित होता है।
सुनहरी घाटी का 'उस्ताद' नीलू खरगोश
हिमालय की तलहटी में एक बहुत ही खूबसूरत इलाका था जिसका नाम था 'सुनहरी घाटी'। यहाँ के पेड़ हमेशा फलों से लदे रहते थे और नदियाँ शहद जैसी मीठी थीं। इस घाटी में नीलू नाम का एक खरगोश रहता था। नीलू दिखने में तो बहुत प्यारा था—उसका फर हल्का नीलापन लिए हुए ग्रे रंग का था और उसके बाएं कान पर एक छोटा सा सफ़ेद धब्बा था।
नीलू की समस्या यह थी कि वह खुद को जंगल का सबसे बुद्धिमान प्राणी समझता था। जहाँ बाकी खरगोश दिन भर मेहनत करके गाजरें खोदते और सर्दियों के लिए खाना जमा करते, नीलू अपना समय यह सोचने में बिताता था कि वह दूसरों की मेहनत का फायदा कैसे उठा सके। वह अक्सर कहता, "मेहनत तो मज़दूर करते हैं, नीलू जैसे कलाकार तो बस दिमाग़ चलाते हैं!"
सर्दियों की तैयारी और नीलू का जाल
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सर्दियाँ आने वाली थीं। जंगल के राजा शेर खान ने घोषणा की कि सभी जानवर अपने-अपने कोठारों में अगले तीन महीनों के लिए खाना जमा कर लें। सभी खरगोशों को एक साथ मिलकर 'गाजर के मैदान' से गाजरें लानी थीं।
नीलू ने सोचा, "कौन धूप में इतनी खुदाई करेगा? क्यों न कुछ ऐसा किया जाए कि मेरी टोकरी भी भर जाए और मुझे पसीना भी न आए।"
उसने अपने सीधे-सादे दोस्त भोलू खरगोश को पकड़ा। भोलू बहुत मेहनती था लेकिन थोड़ा भोला था। नीलू ने उससे कहा, "भोलू भाई, मैंने सुना है कि मैदान के उत्तरी हिस्से में सोने जैसी मीठी गाजरें हैं। तुम वहाँ जाओ, तब तक मैं यहाँ के रास्ते की सफाई कर देता हूँ ताकि तुम्हें भारी टोकरी लाने में आसानी हो।"
भोलू बेचारा खुशी-खुशी दूर वाले मैदान की ओर निकल गया। नीलू ने क्या किया? उसने रास्ते में सफाई करने के बजाय एक गहरा गड्ढा खोदा और उसे सूखे पत्तों से ढक दिया। उसने सोचा कि जब दूसरे खरगोश अपनी भारी टोकरियाँ लेकर लौटेंगे, तो वे इस गड्ढे में गिरेंगे, गाजरें बाहर गिर जाएंगी और वह चुपके से उन्हें उठा लेगा।
चालाकी का पहला कदम
नीलू अपनी योजना पर बहुत खुश था। वह एक झाड़ी के पीछे छुपकर इंतज़ार करने लगा। तभी वहाँ से गोनू हाथी गुज़रा। गोनू के पास गन्ने का एक बड़ा गट्ठर था। नीलू ने सोचा, "अगर हाथी इस गड्ढे में गिरा तो गन्ने भी मेरे होंगे!"
लेकिन गोनू हाथी बहुत समझदार था। उसने अपनी सूँड से पत्तों को हटाकर देख लिया कि वहाँ गड्ढा है। उसने नीलू को झाड़ी में छिपे देखा पर कुछ नहीं बोला। उसने बस मुस्कुराते हुए अपना रास्ता बदल लिया। नीलू को लगा कि गोनू को कुछ पता नहीं चला।
जब दांव उलटा पड़ गया: लालच का गड्ढा
दोपहर हो गई थी। भोलू खरगोश दूर वाले मैदान से बहुत सारी गाजरें लेकर लौट रहा था। नीलू ने दूर से उसे आते देखा। लेकिन तभी उसे याद आया कि उसने तो एक ही गड्ढा खोदा था, क्या पता भोलू उसे पार कर ले? लालच में आकर नीलू ने सोचा कि वह एक और गड्ढा थोड़े आगे खोद देता है।
वह हड़बड़ी में गड्ढा खोदने लगा। तभी उसे जंगल के दूसरे छोर से लोमड़ी के आने की आहट सुनाई दी। नीलू घबरा गया। वह लोमड़ी से डरता था। वह तेज़ी से भागा, लेकिन अपनी ही चालाकी का शिकार हो गया। वह भूल गया कि उसने पहला गड्ढा कहाँ खोदा था!
धड़ाम!
नीलू खुद अपने ही बनाए हुए पत्तों वाले गड्ढे में जा गिरा। गड्ढा गहरा था और उसकी मिट्टी गीली थी, जिसकी वजह से वह ऊपर नहीं चढ़ पा रहा था।
मदद की पुकार और शर्मिंदगी
नीलू गड्ढे के अंदर से चिल्लाने लगा, "बचाओ! बचाओ! कोई मुझे बाहर निकालो!"
तभी भोलू खरगोश वहाँ से गुज़रा। उसने देखा कि नीलू गड्ढे में फँसा है। भोलू ने अपनी टोकरी नीचे रखी और नीलू की मदद करने के लिए हाथ बढ़ाया। लेकिन नीलू इतना शर्मिंदा था कि वह अपनी आँखें नहीं मिला पा रहा था।
वहाँ गोनू हाथी भी आ गया। उसने कहा, "नीलू, तुमने यह गड्ढा दूसरों के लिए खोदा था न? देखो, चालाकी की सजा यही है। जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह खुद उसमें एक दिन ज़रूर गिरता है।"
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नीलू की आँखों में आँसू आ गए। उसने रोते हुए सबसे माफ़ी मांगी। भोलू ने अपनी गाजरों में से कुछ नीलू को दीं, पर नीलू ने उन्हें लेने से मना कर दिया। उसने कहा, "नहीं भोलू, आज मैं भूखा रहूँगा ताकि मुझे अपनी इस चालाकी की सजा याद रहे।"
निष्कर्ष: नीलू का हृदय परिवर्तन
उस दिन के बाद नीलू खरगोश पूरी तरह बदल गया। उसने चालाकी छोड़ दी और 'सुनहरी घाटी' का सबसे मेहनती खरगोश बन गया। अब जब भी कोई नया खरगोश चालाकी करने की कोशिश करता, नीलू उसे अपनी कहानी सुनाता और कहता, "दोस्त, दिमाग़ का इस्तेमाल दूसरों की मदद के लिए करो, उन्हें गिराने के लिए नहीं।"
कहानी की सीख (Moral of the Story)
यह कहानी हमें सिखाती है कि "जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह खुद उसमें गिरता है।" चालाकी और धोखेबाज़ी से आप थोड़े समय के लिए फायदा पा सकते हैं, लेकिन अंत में आपको उसका नुकसान ही उठाना पड़ता है। ईमानदारी और कड़ी मेहनत ही सफलता का एकमात्र सही रास्ता है। समझदारी वह है जिससे सबका भला हो।
खरगोशों और उनके सामाजिक व्यवहार के बारे में और अधिक जानने के लिए आप खरगोश - विकिपीडिया देख सकते हैं।
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