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परोपकार का बदला: नन्हे कुश और उसकी निस्वार्थ दयालुता की प्रेरक कहानी

पढ़िए 'परोपकार का बदला' पर आधारित नन्हे कुश की भावुक कहानी। कैसे एक गरीब लड़के की दयालुता ने उसे एक बड़े संकट से बचाया। बच्चों के लिए एक बेहतरीन शिक्षाप्रद कहानी।

By Lotpot
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निस्वार्थ सेवा और उसके परिणाम

हमारे जीवन में 'परोपकार' एक ऐसा गुण है जो हमें जानवरों से अलग और ईश्वर के करीब ले जाता है। अक्सर लोग सोचते हैं कि दूसरों की मदद करने से हमारा क्या फायदा? लेकिन "परोपकार का बदला" हमेशा भौतिक वस्तुओं या पैसों के रूप में नहीं मिलता, बल्कि यह उस समय हमारे पास लौटकर आता है जब हमें इसकी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है। यह कहानी 'शीतलपुर' गाँव के एक छोटे से बालक कुश की है, जिसने अपनी गरीबी के बावजूद दूसरों के आंसू पोंछना सीखा। आइए जानते हैं कि कैसे कुश के एक छोटे से नेक काम ने उसकी पूरी ज़िंदगी बदल दी।

शीतलपुर का नन्हा दीपक: कुश और उसकी सादगी

हिमालय की तलहटी में बसा एक छोटा सा गाँव था—'शीतलपुर'। यहाँ के लोग सीधे-सादे थे और खेती-बाड़ी करके अपना जीवन बिताते थे। इसी गाँव में कुश नाम का एक 10 साल का लड़का अपनी विधवा माँ के साथ रहता था। कुश के पास न तो अच्छे कपड़े थे और न ही खिलौने, लेकिन उसके पास एक ऐसा दिल था जो दूसरों का दुख देखकर पिघल जाता था।

कुश की माँ गाँव के ज़मींदार के यहाँ खाना बनाने का काम करती थी। कुश अक्सर स्कूल से आने के बाद अपनी माँ की मदद करता या पास के जंगल से सूखी लकड़ियाँ बीनकर लाता। गाँव के बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते थे क्योंकि वह हमेशा फटे हुए पर साफ़ कपड़े पहनता था। लेकिन कुश को इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता था। वह जानता था कि असली अमीरी जेब में नहीं, बल्कि स्वभाव में होती है।

वह तपती दोपहर और प्यासा मुसाफिर

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एक बार शीतलपुर में भीषण गर्मी पड़ी। गाँव के कुएं सूखने लगे थे और दोपहर के समय सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था। कुश जंगल से लकड़ियाँ लेकर लौट रहा था। उसका गला भी प्यास से सूख रहा था और उसके पास केवल एक छोटी सी सुराही में थोड़ा सा पानी बचा था।

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तभी उसने देखा कि रास्ते के किनारे एक बूढ़ा मुसाफिर एक सूखे पेड़ की छाया में बेहाल पड़ा है। उसके होंठ सूखकर सफेद हो गए थे और वह बोल भी नहीं पा रहा था।

कुश के मन में एक द्वंद्व (Conflict) चला— "अगर मैंने अपना पानी इसे दे दिया, तो मैं घर तक कैसे पहुँचूँगा? मुझे तो अभी दो मील और चलना है।"

लेकिन फिर उसने सोचा— "मैं तो जवान हूँ, थोड़ा कष्ट सह लूँगा, लेकिन यह वृद्ध व्यक्ति अगर अभी पानी नहीं पिएगा तो इसके प्राण निकल सकते हैं।" कुश ने बिना सोचे अपनी सुराही उस बूढ़े आदमी के मुँह से लगा दी। पानी पीते ही उस मुसाफिर की जान में जान आई। उसने कुश के सिर पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, तुमने आज मुझे जीवनदान दिया है। ईश्वर तुम्हारा भला करे।"

कुश मुस्कुराया और खाली सुराही लेकर चिलचिलाती धूप में आगे बढ़ गया। उसे प्यास तो लग रही थी, लेकिन उसके मन में जो सुकून था, वह किसी भी ठंडे शरबत से बढ़कर था। इसे ही कहते हैं परोपकार की शुरुआत।

घायल सारस और कुश की सेवा

कुछ दिन बीते, कुश एक नदी के किनारे से गुज़र रहा था। उसने देखा कि झाड़ियों में एक सुंदर सफेद सारस (Crane) फँसा हुआ है। किसी शिकारी के जाल ने उसके पंखों को लहूलुहान कर दिया था। सारस दर्द से तड़प रहा था।

गाँव के दूसरे लड़कों ने देखा और कहा, "अरे कुश! इसे यहीं छोड़ दो, ये मर जाएगा। वैसे भी शिकारी वापस आता ही होगा।"

लेकिन कुश ने उनकी बात नहीं मानी। उसने बड़ी सावधानी से जाल काटा और सारस को अपने घर ले आया। उसकी माँ ने पहले तो चिंता की, पर कुश की लगन देख कर उन्होंने भी मदद की। कुश रोज़ जड़ी-बूटियाँ पीसकर उसके घावों पर लगाता और अपनी रोटी में से आधा हिस्सा उसे खिलाता।

धीरे-धीरे सारस ठीक होने लगा। एक दिन वह पूरी तरह स्वस्थ हो गया और नीले आसमान में उड़ गया। जाते समय वह कुश के चारों ओर तीन चक्कर लगाकर गया, जैसे वह उसे धन्यवाद दे रहा हो। कुश की माँ ने कहा, "बेटा, तुमने एक बेज़ुबान की रक्षा की है, इसका फल तुम्हें ज़रूर मिलेगा।"

जब कुश के परिवार पर आया संकट

समय गुज़रा और शीतलपुर में अकाल पड़ गया। बारिश न होने के कारण फसलें बर्बाद हो गईं। कुश की माँ बीमार पड़ गई और घर में दाना-पानी खत्म हो गया। ज़मींदार ने भी मदद करने से मना कर दिया क्योंकि उसके अपने भंडार खाली हो रहे थे।

कुश दाने-दाने को मोहताज हो गया। वह दवा के लिए शहर जाना चाहता था, पर उसके पास जूते तक नहीं थे और रास्ता पथरीला था। वह असहाय होकर अपनी माँ के पास बैठकर रोने लगा। उसे लगा कि अब सब खत्म हो गया है।

परोपकार का जादुई बदला: मदद की वापसी

उसी रात, जब कुश सो रहा था, उसे अपनी खिड़की पर किसी के पंख फड़फड़ाने की आवाज़ सुनाई दी। उसने आँखें खोलीं तो दंग रह गया। वह वही सफेद सारस था जिसे कुश ने बचाया था। लेकिन इस बार वह अकेला नहीं था। उसके पीछे वही बूढ़ा मुसाफिर खड़ा था जिसे कुश ने पानी पिलाया था।

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हैरानी की बात यह थी कि वह बूढ़ा मुसाफिर कोई साधारण व्यक्ति नहीं, बल्कि पड़ोस के राज्य का एक बहुत बड़ा राज-वैद्य (Royal Doctor) था, जो उस दिन वेश बदलकर यात्रा कर रहा था।

"बेटा कुश, मुझे याद है तुमने अपनी प्यास भूलकर मेरी जान बचाई थी," राज-वैद्य ने कहा। "और यह सारस, जो मेरा पालतू मित्र है, इसने मुझे तुम्हारा घर ढूँढने में मदद की।"

राज-वैद्य ने तुरंत कुश की माँ का इलाज शुरू किया। वे अपने साथ औषधि और अनाज का ढेर लेकर आए थे। उन्होंने न केवल कुश की माँ को ठीक किया, बल्कि कुश की पढ़ाई का सारा ज़िम्मा भी उठा लिया। उन्होंने कहा, "परोपकार का बदला कभी खाली नहीं जाता। तुमने बिना स्वार्थ के बीज बोया था, आज फल काटने का समय है।"

निष्कर्ष: जीवन का सबसे बड़ा पाठ

कुश बड़ा होकर उसी राज्य का मुख्य वैद्य बना और उसने जीवन भर गरीबों की मुफ्त सेवा की। शीतलपुर के लोग जो कभी उसका मज़ाक उड़ाते थे, आज उसके नाम की मिसाल देते हैं। कुश ने साबित कर दिया कि दूसरों की भलाई करने वाला कभी अकेला नहीं होता; कुदरत और ईश्वर स्वयं उसके रक्षक बन जाते हैं।

कहानी की सीख (Moral of the Story)

यह कहानी हमें सिखाती है कि "परोपकार ही सबसे बड़ा धर्म है और किया गया नेक काम कभी व्यर्थ नहीं जाता।" भले ही मदद करते समय हमें लगे कि हमारा नुकसान हो रहा है, लेकिन वास्तविकता में हम अपने लिए एक सुरक्षित भविष्य की नींव रख रहे होते हैं। दयालुता और निस्वार्थ सेवा का फल हमेशा मीठा होता है। हमें बिना किसी लालच के दूसरों की मदद करनी चाहिए, क्योंकि समय आने पर 'परोपकार का बदला' हमें वह सब कुछ वापस दे देता है जो हमने दूसरों को दिया था।

परोपकार और नैतिक शिक्षा के बारे में और अधिक जानने के लिए आप परोपकार - विकिपीडिया देख सकते हैं।

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