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क्या आपने कभी किसी ऐसे डॉक्टर को देखा है जो खुद समोसे खाता हो और आपको तला-भुना खाने से मना करे? यह कहानी Sacha Updesh (सच्चा उपदेश) के असली मतलब को एक मजेदार तरीके से समझाती है। यह किस्सा है बिट्टू, उसकी परेशान मम्मी और गाँव के मशहूर बाबा गपोड़ीलाल का। क्या बाबा का ज्ञान बिट्टू की मिठाई की लत छुड़ा पाएगा? या बाबा जी खुद ही फंस जाएंगे?
कहानी: पहले आचरण, फिर प्रवचन
बिट्टू और उसकी 'मीठी' मुसीबत
चंदनपुर गाँव में एक बच्चा रहता था—बिट्टू। बिट्टू को दुनिया की हर चीज़ से नफरत हो सकती थी, सिवाय एक चीज़ के—बेसन के लड्डू।
सुबह हो या शाम, बिट्टू की जेब में, बस्ते में, और कभी-कभी तो तकिए के नीचे भी लड्डू मिलते थे। उसकी मम्मी, सविता बेचारी बहुत परेशान थीं। बिट्टू के दांत खराब हो रहे थे, लेकिन वह मानता ही नहीं था। सविता ने डराया, धमकाया, यहाँ तक कि मिठाई के डिब्बे ताले में बंद कर दिए, लेकिन बिट्टू तो जैसे लड्डू सूंघने की शक्ति लेकर पैदा हुआ था। वह ताला नहीं, तो मम्मी का दिल पिघलाकर लड्डू मांग ही लेता था।
बाबा गपोड़ीलाल का दरबार
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गाँव के मंदिर के पीछे एक पुराने नीम के पेड़ के नीचे बाबा गपोड़ीलाल का आश्रम था। बाबा जी अपने ज्ञान के लिए कम और अपनी भारी-भरकम तोंद के लिए ज्यादा मशहूर थे। गाँव वाले मानते थे कि बाबा के पास हर समस्या का समाधान है।
थक-हार कर सविता अपने बेटे बिट्टू को लेकर बाबा के पास पहुंची। "बाबा जी," सविता ने हाथ जोड़कर कहा, "मेरा बेटा मिठाई बहुत खाता है। इसकी यह आदत छुड़ा दीजिये, वरना इसके सारे दांत गिर जाएंगे।"
बाबा गपोड़ीलाल उस समय आराम से एक मसनद (गोल तकिया) पर लेटे हुए थे। उन्होंने एक आँख खोलकर बिट्टू को देखा, फिर अपनी तोंद पर हाथ फेरा और गंभीर आवाज़ में बोले, "हम्म... समस्या गंभीर है। बालक, इधर आओ।"
बिट्टू डरते-डरते आगे बढ़ा। उसे लगा बाबा कोई कड़वी दवा देंगे। लेकिन बाबा ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और फिर सविता से कहा, "मैय्या, तुम इस बालक को लेकर अगले हफ्ते आना। आज इसका मुहूर्त ठीक नहीं है।"
सविता हैरान थी। इतनी दूर चलकर आई और बाबा ने बिना कुछ कहे वापस भेज दिया? लेकिन बाबा पर सवाल कौन उठाए? वह चुपचाप वापस चली गई।
सात दिन का रहस्यमय इंतज़ार
अगला एक हफ्ता बिट्टू के लिए स्वर्ग जैसा था। उसे लगा बाबा ने शायद मम्मी को मना कर दिया है, इसलिए उसने जमकर लड्डू खाए। दूसरी तरफ, सविता को समझ नहीं आ रहा था कि बाबा ने एक हफ्ते का समय क्यों माँगा। क्या वह कोई विशेष मंत्र तैयार कर रहे थे? या कोई जड़ी-बूटी खोजने हिमालय गए थे?
पूरे गाँव में चर्चा होने लगी। किसी ने कहा, "बाबा शायद ग्रहों की चाल बदल रहे हैं।" किसी ने कहा, "अरे नहीं, बाबा जरूर कोई बड़ा अनुष्ठान कर रहे होंगे।"
बाबा का सीधा-सादा मंत्र
हफ्ता बीत गया। सविता फिर से बिट्टू को खींचते हुए आश्रम ले गई। आज बाबा गपोड़ीलाल सीधे बैठे थे और उनके चेहरे पर एक अलग ही चमक (या शायद पसीना) थी।
सविता ने कहा, "बाबा, सात दिन हो गए। अब तो बता दीजिये कोई उपाय।"
बाबा ने बिट्टू को अपने पास बुलाया। उसका हाथ अपने हाथ में लिया और प्यार से उसकी आँखों में देखा। माहौल एकदम शांत हो गया। चिड़ियाँ भी चहकना भूल गईं। सबको लगा कोई भारी ज्ञान बरसने वाला है।
बाबा बोले, "बेटा बिट्टू, मिठाई खाना छोड़ दो। यह सेहत के लिए खराब है।"
बस। इतना ही।
सविता और बिट्टू दोनों का मुंह खुला का खुला रह गया। सविता ने इधर-उधर देखा, फिर बाबा को। "बस? इतना ही? बाबा, यह बात तो आप पिछले हफ्ते भी कह सकते थे! इसके लिए हमें सात दिन इंतज़ार क्यों करवाया?"
सविता का गुस्सा जायज़ था। यह लाइन तो वह घर पर रोज सौ बार बोलती थी।
बाबा की ईमानदारी और लड्डुओं का त्याग
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बाबा गपोड़ीलाल मुस्कुराए। उन्होंने अपनी खाट के नीचे से एक खाली डिब्बा निकाला और बोले, "मैय्या, गुस्सा मत करो। बात दरअसल यह है कि पिछले हफ्ते तक मैं खुद बेसन के लड्डू का बहुत शौकीन था।"
बिट्टू की आँखें चमक उठीं। "आप भी?"
बाबा हंसे, "हाँ बेटा। मेरी खाट के नीचे हमेशा लड्डू का डिब्बा रहता था। जब तुम पिछले हफ्ते आए थे, तब भी मेरे मुंह में एक लड्डू घुला हुआ था। मैं उस वक़्त इस बच्चे को मिठाई छोड़ने का उपदेश कैसे देता, जब मैं खुद उसका गुलाम था?"
बाबा ने आगे समझाया, "किसी को सच्चा उपदेश देने से पहले, मुझे खुद उस पर अमल करना ज़रूरी था। इसलिए मैंने एक हफ्ता माँगा। इन सात दिनों में मैंने एक भी लड्डू नहीं खाया। खुद को तपाया। आज जब मैंने मिठाई पर जीत हासिल कर ली, तभी मेरी आवाज़ में वह ताकत आई कि मैं इस बच्चे को मना कर सकूं।"
बिट्टू, जो अब तक बाबा को एक बोरिंग साधु समझ रहा था, अब उन्हें इज़्ज़त से देखने लगा। उसने सोचा, "अगर बाबा अपने प्यारे लड्डुओं को छोड़ सकते हैं, तो मैं भी कोशिश कर सकता हूँ।"
निष्कर्ष: असली सीख
उस दिन के बाद बिट्टू ने मिठाई खानी कम कर दी। पूरी तरह तो नहीं छूटी (आखिर वह बच्चा था), लेकिन अब वह चोरी-छिपे नहीं खाता था। बाबा गपोड़ीलाल का 'सच्चा उपदेश' काम कर गया था क्योंकि उसमें शब्दों का वजन नहीं, बल्कि आचरण की सच्चाई थी।
इस कहानी से सीख (Moral)
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि "कथनी से बड़ी करनी होती है" (Actions speak louder than words). हमें दूसरों को वही सलाह देनी चाहिए जिस पर हम खुद अमल करते हों। उपदेश देना आसान है, लेकिन उसे निभाना ही असली बुद्धिमानी है।
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