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ब्राह्मण और सर्प की कहानी: लालच और अटूट भरोसे का सबक

पढ़िए पंचतंत्र की प्रसिद्ध कहानी 'ब्राह्मण और सर्प' का एक नया रूपांतरण। जानिए कैसे एक सोने के सिक्के के लालच ने सोमदत्त के परिवार की खुशियाँ छीन लीं।

By Lotpot
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शांतिपुर का खेत और अनसुनी दास्तान

विंध्याचल की पहाड़ियों की गोद में बसा 'शांतिपुर' एक ऐसा गाँव था जहाँ समय जैसे ठहर सा गया था। इसी गाँव के छोर पर सोमदत्त नाम का एक ब्राह्मण रहता था। सोमदत्त के पास न तो बड़ा महल था और न ही बहुत धन, लेकिन उसके पास एक ऐसा दिल था जो सबके लिए दया से भरा रहता था। वह पेशे से तो पंडित था, लेकिन अपनी जीविका चलाने के लिए वह एक छोटे से पथरीले खेत में मेहनत करता था।

विधी की विडंबना देखिए, सोमदत्त दिन-भर पसीना बहाता, पर उसके खेत में अनाज की जगह पत्थर ज़्यादा उगते थे। गरीबी उसके घर की दीवारों से झाँकती थी, लेकिन उसने कभी अपनी ईमानदारी का हाथ नहीं छोड़ा। वह हमेशा कहता, "समय का पहिया है, आज नीचे है तो कल ऊपर भी आएगा।"

एक अद्भुत मुलाकात और चमत्कार का उदय

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एक तपती दुपहरी में, जब सूरज आग उगल रहा था, सोमदत्त अपने खेत के बीचों-बीच खड़े एक विशाल और प्राचीन बरगद के पेड़ के नीचे सुस्ता रहा था। वह पेड़ इतना पुराना था कि उसकी जड़ें ज़मीन में गहरी धंसी हुई थीं और उसकी शाखाएं एक छतरी की तरह फैली थीं।

अचानक, सोमदत्त की नज़र पेड़ के तने के पास बने एक बड़े से बिल पर पड़ी। तभी वहाँ से एक विशाल काला नाग बाहर निकला। वह नाग कोई साधारण साँप नहीं लग रहा था। उसके फन पर एक दिव्य चमक थी और उसकी आँखें किसी कीमती रत्न की तरह चमक रही थीं।

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गाँव के लोग अक्सर साँप देखते ही लाठी उठा लेते थे, लेकिन सोमदत्त ने हाथ जोड़ लिए। उसने सोचा, "हे प्रभु! मैं इतने सालों से इस खेत में काम कर रहा हूँ, लेकिन कभी इस स्थान के असली रक्षक देवता का आभार नहीं माना। शायद इसीलिए मेरी मेहनत सफल नहीं हो रही।"

सोमदत्त तुरंत अपने घर की ओर भागा। वह अपनी रसोई से एक मिट्टी के सकोरे (मिट्टी का कटोरा) में ताज़ा दूध लेकर आया। उसने बड़ी श्रद्धा से उसे बिल के सामने रख दिया और बोला, "हे नाग देवता! मेरी अज्ञानता को क्षमा करें। मैं अब तक आपकी सेवा नहीं कर सका। कृपया यह तुच्छ भेंट स्वीकार करें।"

अगले दिन जब सोमदत्त खेत पहुँचा, तो उसने देखा कि दूध का कटोरा खाली था, लेकिन उसके अंदर एक चमकता हुआ सोने का सिक्का रखा था। सोमदत्त की आँखों में आँसू आ गए। वह समझ गया कि उसकी ईमानदारी और श्रद्धा का फल उसे मिल गया है।

समृद्धि का दौर और सोमदत्त का रहस्य

अब यह सिलसिला रोज़ का बन गया। सोमदत्त हर सुबह दूध लाता और नाग देवता उसे बदले में एक शुद्ध सोने का सिक्का देते। धीरे-धीरे सोमदत्त की गरीबी के बादल छंटने लगे। उसने अपना पुराना घर ठीक करवाया, अपने बच्चों के लिए नई किताबें और कपड़े खरीदे। गाँव वाले हैरान थे कि सोमदत्त की किस्मत रातों-रात कैसे बदल गई, लेकिन सोमदत्त ने यह राज़ किसी को नहीं बताया।

वह जानता था कि धन और प्रसिद्धि के साथ ईर्ष्या भी आती है। सोमदत्त और उस नाग के बीच एक अजीब सा, शांत रिश्ता बन गया था। नाग अब सोमदत्त की आहट पहचानता था। जैसे ही सोमदत्त दूध रखता, नाग बाहर आता और सोमदत्त उसे निहारता रहता। उन दोनों के बीच एक अनकहा भरोसा था।

जब लालच ने घर का रास्ता देखा

वक्त अपनी रफ्तार से चलता रहा। एक बार सोमदत्त को किसी विशेष धार्मिक कार्य के लिए दूसरे गाँव जाना पड़ा। उसे वहाँ कम से कम एक हफ्ता रुकना था। उसने सोचा कि यदि वह चला गया, तो नाग देवता की पूजा रुक जाएगी। इसलिए उसने अपने जवान बेटे, रोहन को पास बुलाया।

रोहन पढ़ने-लिखने में तो तेज़ था, लेकिन उसका मन थोड़ा चंचल था। वह अक्सर जल्दी अमीर बनने के सपने देखता था। सोमदत्त ने उससे कहा, "बेटा, मैं कुछ दिनों के लिए बाहर जा रहा हूँ। तुम रोज़ सुबह नियम से उस बरगद के पेड़ के पास जाकर नाग देवता को दूध चढ़ा देना। याद रखना, यह हमारी परंपरा और श्रद्धा का सवाल है।"

रोहन ने हामी भर दी। पहले दिन जब वह गया और दूध चढ़ाकर घर लौटा, तो उसे बर्तन में सोने का सिक्का मिला। सिक्का हाथ में लेते ही रोहन के मन में हलचल शुरू हो गई। उसने सोचा, "अगर एक दिन में एक सिक्का मिलता है, तो उस बिल के अंदर तो हज़ारों सिक्के होंगे। ये नाग तो सोने की खान है। पिताजी कितने भोले हैं, जो रोज़ एक-एक सिक्के का इंतज़ार करते हैं।"

एक विनाशकारी निर्णय: विश्वास की हत्या

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तीसरे दिन की सुबह, रोहन के मन पर लालच का भूत सवार हो चुका था। उसने सोचा कि आज वह सारा खज़ाना एक साथ निकाल लेगा। उसने दूध का कटोरा लिया, लेकिन उसके पीछे एक भारी लकड़ी की लाठी भी छिपा ली।

जैसे ही नाग बिल से बाहर निकला और दूध पीने के लिए नीचे झुका, रोहन ने पूरी ताकत से लाठी उसके फन पर दे मारी। वह वार जानलेवा था, लेकिन नाग बहुत फुर्तीला था। वार उसके फन की जगह उसकी पूंछ पर लगा।

नाग दर्द से पागल हो उठा। उसने देखा कि यह सोमदत्त नहीं, बल्कि कोई लालची इंसान है जिसने उसकी जान लेने की कोशिश की है। अपनी रक्षा के लिए नाग ने बिजली की गति से पलटकर रोहन के पैर पर डस लिया।

ज़हर इतना तीव्र था कि रोहन वहीं खेत में गिर पड़ा। चीखने का मौका तक नहीं मिला। उधर घायल नाग भी अपने बिल में वापस चला गया। शाम को जब गाँव वालों ने रोहन का बेजान शरीर खेत में देखा, तो हाहाकार मच गया।

सोमदत्त की वापसी और अंतिम विदाई

जब सोमदत्त वापस लौटा, तो उसका घर खुशियों की जगह मातम से भरा था। अपने जवान बेटे की मृत्यु ने उसे तोड़ दिया था। लेकिन जब उसे पूरी घटना का पता चला, तो वह समझ गया कि यह नाग की गलती नहीं, बल्कि उसके बेटे के लालच का परिणाम था।

अपने बेटे के अंतिम संस्कार के अगले दिन, सोमदत्त भारी मन से फिर उसी बरगद के पेड़ के पास गया। उसके हाथ में फिर से दूध का कटोरा था। उसने कांपती आवाज़ में नाग को पुकारा।

नाग बिल के मुहाने तक आया, लेकिन बाहर नहीं निकला। उसकी आँखें पहले की तरह शांत नहीं थीं, उनमें एक दर्द और दूरी थी।

नाग ने एक गहरी आवाज़ में कहा, "सोमदत्त! तुम यहाँ क्यों आए हो? अब हमारे बीच वह भरोसा कभी नहीं लौट सकता। तुमने अपने बेटे को खोया और मैंने अपनी पूंछ की सलामती। तुम्हारे बेटे ने लालच में आकर हमारी दोस्ती पर वार किया। अब जब भी तुम मुझे देखोगे, तुम्हें अपने बेटे की मौत याद आएगी, और जब भी मैं तुम्हें देखूँगा, मुझे वह लाठी का प्रहार याद आएगा। हम अब दोस्त नहीं रह सकते।"

नाग ने आखिरी बार एक कीमती रत्न सोमदत्त की ओर सरकाया और बोला, "यह अंतिम भेंट है। अब यहाँ कभी मत आना।" इतना कहकर नाग हमेशा के लिए बिल की गहराई में ओझल हो गया।

सोमदत्त खड़ा रह गया। उसके पास अब दुनिया की सारी दौलत थी, लेकिन उसका बेटा और वह अद्भुत मित्र, दोनों ही जा चुके थे। वह समझ गया था कि विश्वास एक कांच की तरह होता है, जो एक बार टूट जाए तो फिर कभी जुड़ नहीं सकता।

सीख (Moral of the Story):

अत्यधिक लालच विनाश का कारण बनता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि धीरज और संतोष में ही असली सुख है। साथ ही, विश्वास एक ऐसा धागा है जिसे लालच की कैंची एक पल में काट सकती है।

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