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Sahukar Ka Batua: लालची सेठ और गरीब किसान की कहानी
लालच एक ऐसी बला है जो इंसान की बुद्धि को दीमक की तरह खा जाती है। यह कहानी 'सुंदरपुर' गाँव की है, जहाँ एक तरफ सेठ घसीटाराम जैसा लालची इंसान था, तो दूसरी तरफ भोला जैसा ईमानदार और मेहनती किसान। जब सेठ का नोटों से भरा बटुआ खो गया और भोला ने उसे लौटाया, तो सेठ ने उसे इनाम देने के बजाय उल्टा चोर साबित करने की कोशिश की। लेकिन कहते हैं न, "शेर को सवा शेर मिलता ही है"। इस कहानी में न्याय कैसे हुआ, यह पढ़कर आपको मज़ा आ जाएगा।
कहानी: बेईमानी का फल
सेठ घसीटाराम और उनकी कंजूसी
सुंदरपुर गाँव में सेठ घसीटाराम रहते थे। नाम था 'घसीटाराम', लेकिन वे पूरी दुनिया को अपनी बातों में घसीट लेते थे। वे गाँव के सबसे अमीर साहूकार थे, लेकिन कंजूसी ऐसी कि अगर मक्खी भी चाय में गिर जाए, तो उसे चूसकर बाहर फेंकते थे।
एक दिन सेठ जी बाज़ार से अपनी उधारी वसूल करके लौट रहे थे। उनकी मखमली लाल बटुए में पूरे 100 सोने की मोहरें (Gold Coins) थीं। वे मन ही मन मोहरें गिन रहे थे और खयाली पुलाव पका रहे थे। इसी धुन में, कब उनका बटुआ उनकी जेब से फिसलकर धूल में गिर गया, उन्हें पता ही नहीं चला।
घर पहुँचकर जब उन्होंने जेब टटोली, तो पसीने छूट गए। "हाय! मेरी कमाई! मेरी जान!" सेठ जी ने पूरा घर सिर पर उठा लिया। उन्होंने तुरंत गाँव में मुनादी (Announcement) करवा दी: "जो भी मेरा लाल बटुआ लौटाएगा, उसे मैं खुश होकर 10 सोने की मोहरें इनाम में दूंगा!"
भोला की ईमानदारी
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उसी गाँव में भोला नाम का एक गरीब किसान रहता था। वह खेत से काम करके लौट रहा था कि उसकी नज़र रास्ते में पड़े एक चमचमाते लाल बटुए पर पड़ी। उसने बटुआ उठाया और खोलकर देखा। उसमें सोने की मोहरें चमक रही थीं।
भोला ने सोचा, "यह जरूर किसी की मेहनत की कमाई है। इसे रखना पाप होगा।" उसने गाँव में पता किया और उसे मालूम हुआ कि यह बटुआ सेठ घसीटाराम का है।
भोला सीधा सेठ की हवेली पहुंचा। "सेठ जी, राम-राम! यह लीजिये आपका बटुआ, मुझे यह रास्ते में मिला था," भोला ने बड़ी विनम्रता से कहा।
सेठ घसीटाराम ने झपटकर बटुआ छीना। उन्होंने तुरंत मोहरें गिनीं। पूरी 100 थीं। उनकी जान में जान आई। लेकिन तभी सेठ के दिमाग में लालच का कीड़ा कुलबुलाने लगा। उन्होंने सोचा, "अब बटुआ तो मिल गया, इस गरीब को 10 मोहरें फालतू में क्यों दूँ?"
सेठ की चालाकी और झूठा आरोप
सेठ ने चेहरे पर गुस्से का नाटक किया और चिल्लाया, "अरे ओ धोखेबाज़! इसमें तो 110 मोहरें थीं! तूने 10 मोहरें पहले ही निकाल लीं और अब इनाम मांगने आया है? ऊपर से भोला बनता है?"
भोला सन्न रह गया। "सेठ जी, यह आप क्या कह रहे हैं? मैंने तो इसे खोला तक नहीं। मैंने सिर्फ गिना भी नहीं, बस आपको देने चला आया। मैं गरीब हूँ, चोर नहीं।"
लेकिन सेठ ने एक न सुनी। "चल भाग यहाँ से! मेरी 10 मोहरें तूने चुरा लीं, वही तेरा इनाम है। अब और कुछ नहीं मिलेगा।"
भोला को बहुत दुख हुआ। बात पैसों की नहीं, उसकी ईमानदारी पर लगे दाग की थी। उसने कहा, "सेठ जी, फैसला अब पंचायत में होगा।"
सरपंच का न्याय (Logic और तर्क)
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अगले दिन पंचायत बैठी। गाँव के समझदार सरपंच ताऊ जी ने अपनी पगड़ी संभाली और मामला सुना। सेठ घसीटाराम ने अपनी बात रखी: "सरपंच जी, मेरे बटुए में 110 मोहरें थीं। भोला ने जब लौटाया तो उसमें सिर्फ 100 थीं। इसने इनाम के लालच में पहले ही पैसे निकाल लिए।"
भोला ने हाथ जोड़कर कहा, "जी, मुझे नहीं पता उसमें कितना पैसा था। मुझे मिला और मैंने लौटा दिया।"
सरपंच ताऊ जी ने अपनी सफ़ेद दाढ़ी पर हाथ फेरा। वे सेठ की नस-नस से वाकिफ थे। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि माजरा क्या है। उन्होंने एक तरकीब सोची।
सरपंच ने गंभीरता से पूछा, "सेठ घसीटाराम, क्या तुम्हें पक्का यकीन है कि तुम्हारे बटुए में 110 मोहरें ही थीं?" सेठ ने सीना तानकर कहा, "जी बिल्कुल! एक कम नहीं, एक ज्यादा नहीं।"
सरपंच मुस्कुराए। उन्होंने फैसला सुनाया: "भाइयो! बात साफ़ है। सेठ जी का बटुआ खोया था जिसमें 110 मोहरें थीं। लेकिन भोला को जो बटुआ मिला, उसमें सिर्फ 100 मोहरें हैं। इसका मतलब..."
पूरी सभा शांत हो गई।
सरपंच ने कहा, "इसका मतलब यह बटुआ सेठ घसीटाराम का है ही नहीं!"
सेठ के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "अरे! नहीं-नहीं, बटुआ मेरा ही है! वो लाल रंग, वो कढ़ाई..."
सरपंच ने कड़क आवाज़ में कहा, "कैसे हो सकता है? तुम्हारे बटुए में तो 110 मोहरें थीं। इसमें 100 हैं। कानून के हिसाब से, यह बटुआ किसी और का है जिसे भोला ने ढूंढा है। जब तक इसका असली मालिक (जिसके 100 मोहरें खोये हों) नहीं मिलता, यह बटुआ भोला के पास ही रहेगा। और अगर कोई नहीं आया, तो यह भोला का हुआ।"
सेठ गिड़गिड़ाने लगा, "अरे हुज़ूर! मुझसे गलती हो गई। मैंने झूठ बोला था इनाम बचाने के लिए। इसमें 100 मोहरें ही थीं। मुझे माफ़ कर दो!"
सरपंच ने कहा, "अब बहुत देर हो चुकी है। तुमने पंचायत में झूठ बोला और एक ईमानदार आदमी पर इल्जाम लगाया। अब नियम के अनुसार, तुम्हें अपनी मोहरें तभी मिलेंगी जब तुम अपनी गलती मानोगे और भोला को उसका वादा किया हुआ इनाम (10 मोहरें) अभी के अभी दोगे।"
मरता क्या न करता? सेठ ने रोते-रोते 10 मोहरें निकालकर भोला को दीं और अपनी 90 मोहरें लेकर वापस गया। जो 100 की 100 बचाना चाहता था, उसे भरी सभा में बेइज्जत भी होना पड़ा और पैसे भी देने पड़े।
निष्कर्ष: जैसा बोओगे, वैसा काटोगे
भोला की ईमानदारी ने उसे इनाम दिलाया और सेठ के लालच ने उसे नुकसान पहुँचाया। पूरा गाँव सरपंच की बुद्धिमानी की तारीफ कर रहा था। उस दिन के बाद सेठ घसीटाराम ने कसम खा ली कि वह कभी किसी का हक़ नहीं मारेगा (कम से कम कोशिश तो करेगा!)।
इस कहानी से सीख (Moral)
इस कहानी से हमें दो बड़ी सीख मिलती हैं:
ईमानदारी सबसे अच्छी नीति है (Honesty is the Best Policy): सच का रास्ता मुश्किल हो सकता है, लेकिन जीत हमेशा सच की ही होती है।
लालच का फल बुरा होता है: दूसरों का हक़ मारने की कोशिश में इंसान अक्सर अपना ही नुकसान कर बैठता है। जैसा कि मुहावरा है—"आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे।"
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अधिक जानकारी के लिए देखें: पंचतंत्र की कहानियाँ - विकिपीडिया
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