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अक्सर हम होली पर रसायनिक रंगों और पानी की बर्बादी की बात करते हैं, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि प्रकृति (Nature) अपनी होली कैसे मनाती है? यह कहानी 'हरीपुर' के जंगल की एक समझदार चिड़िया पीहू की है। जब उसने देखा कि भीषण गर्मी में पानी की कमी है, तो उसने होली मनाने का एक ऐसा तरीका निकाला जो हम इंसानों के लिए भी एक मिसाल है। यह Holi Ki Kahani हमें पर्यावरण प्रेम और कृतज्ञता (Gratitude) का पाठ पढ़ाती है।
कहानी: पीहू की अनोखी होली
पीहू का सपना और सूखा तालाब
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हरीपुर के जंगल में वसंत का मौसम था, लेकिन सूरज की तपिश अभी से बढ़ने लगी थी। जंगल के किनारे एक पुराने बरगद के पेड़ पर पीहू नाम की एक गौरैया रहती थी। पीहू बहुत चंचल थी, लेकिन उतनी ही समझदार भी।
होली का त्योहार नज़दीक था। गाँव की तरफ से ढोल की आवाज़ें और बच्चों का शोर जंगल तक आ रहा था। पीहू अक्सर पेड़ की ऊँची डाल से गाँव वालों को एक-दूसरे पर रंग डालते देखती थी। उसके नन्हे मन में भी खयाल आया, "सब कितने खुश दिखते हैं रंग लगाकर। काश! मैं भी इस बार होली खेल पाती।"
अगली सुबह पीहू उत्साह में उड़ी और जंगल के बीच वाले पोखर (तालाब) के पास गई। उसने सोचा था कि पानी में अपनी चोंच भिगोकर होली खेलेगी। लेकिन वहां का नज़ारा देख उसका दिल बैठ गया। गर्मी की शुरुआत में ही पोखर लगभग सूख चुका था। बस तलहटी में थोड़ा सा गंदा पानी बचा था।
पीहू ने सोचा, "पानी तो पीने के लिए भी कम पड़ रहा है। अगर इसे होली में बर्बाद किया, तो जंगल के बाकी जानवर क्या पिएंगे?" पीहू समझदार थी। उसने तय किया कि वह पानी वाली होली नहीं खेलेगी। लेकिन होली तो मनानी थी। तो फिर कैसे?
पलाश काका की मदद
पीहू उदास होकर उड़ रही थी कि तभी उसकी नज़र जंगल के कोने में खड़े पलाश (टेसू) के पेड़ पर पड़ी। वह पेड़ संतरी और लाल रंग के फूलों से लदा हुआ था, मानो जंगल में आग लगी हो। उसे 'जंगल की आग' (Flame of the Forest) ऐसे ही नहीं कहते थे।
पीहू की आँखों में चमक आ गई। "अरे! पलाश काका के पास तो रंगों का खजाना है। ये रंग न तो नुकसान पहुंचाते हैं और न ही इन्हें धोने के लिए बाल्टी भर पानी चाहिए," उसने सोचा।
वह फुर्र से उड़कर पलाश के पेड़ के पास पहुंची और चहकते हुए बोली, "पलाश काका! पलाश काका! क्या मुझे आपके थोड़े से फूल मिलेंगे? मुझे होली खेलनी है, लेकिन पानी खराब नहीं करना चाहती।"
बूढ़े पलाश के पेड़ ने हवा में अपनी डालियाँ हिलाकर रजामंदी दी। एक भरे-पूरे पेड़ को दो-चार फूल देने में क्या हर्जा होता? टप-टप करके दो ताज़े, रसीले फूल नीचे घास पर गिर गए।
कुदरती रंग की तैयारी
अब पीहू के पास रंग तो था, लेकिन उसे तैयार करना था। उसने अपनी चोंच से फूलों को उठाया और एक पत्थर के पास बने छोटे से गड्ढे में रख दिया, जहाँ रात की ओस का थोड़ा पानी जमा था।
पीहू ने अपनी नन्ही चोंच से फूलों को उस ओस के पानी में मसला। धीरे-धीरे पानी का रंग गहरा केसरी (Saffron) हो गया। उस रंग से एक भीनी-भीनी महक आ रही थी, जो रसायनिक रंगों की बदबू से कोसों दूर थी। पीहू बहुत खुश हुई। उसका 'हर्बल कलर' तैयार था।
आरव और पीहू का बंधन
अब बारी थी होली खेलने की। लेकिन किसके साथ? पीहू के दिमाग में तुरंत आरव का चेहरा आया।
आरव, जंगल के किनारे रहने वाले किसान का 10 साल का बेटा था। वह बहुत दयालु था। जब भी उसके पिताजी खेत में अनाज काटते, आरव मुट्ठी भर दाने चुपके से अलग रख लेता और उन्हें पीहू और उसके दोस्तों के लिए जमीन पर बिखेर देता था। पीहू को आज भी याद था कि कैसे पिछली सर्दियों में आरव ने उसे एक बिल्ली से बचाया था।
पीहू ने सोचा, "आरव मेरा सबसे अच्छा दोस्त है। आज होली पर पहला रंग उसी को लगाऊंगी।"
रंगों का शगुन
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पीहू ने अपनी चोंच उस केसरी रंग के पानी में डुबोई। उसकी चोंच में रंग की कुछ बूंदें भर गईं। वह बड़ी सावधानी से उड़ी ताकि रंग गिर न जाए।
खेत के किनारे आरव एक पेड़ की छांव में बैठा सुस्ता रहा था। उसकी आँखें बंद थीं। पीहू धीरे से उसके ऊपर वाले पेड़ की डाल पर जा बैठी। उसने नीचे देखा और सही निशाना लगाकर अपनी चोंच से रंग की बूंदें छोड़ दीं।
टप! केसरी रंग की एक नन्ही बूंद सीधे आरव के गाल पर गिरी। एक बूंद उसके माथे पर।
आरव एकदम से चौंक गया। उसे लगा शायद बारिश की बूंद है या कोई कीड़ा। उसने हाथ लगाकर देखा तो उसकी उंगली पर संतरी रंग लग गया। उसने ऊपर देखा। वहां डाल पर पीहू बैठी थी, अपनी पूंछ हिला रही थी और ज़ोर-ज़ोर से चहक रही थी—"चीं-चीं! चीं-चीं!" (मानो कह रही हो, बुरा न मानो होली है!)
आरव समझ गया। वह खिलखिलाकर हँस पड़ा। "अरे वाह! पीहू, तुमने तो मुझे रंग लगा दिया! हैप्पी होली मेरी दोस्त!" आरव ने हाथ हिलाकर पीहू को होली विश किया। पीहू ने भी हवा में एक चक्कर लगाया और खुशी से गाती हुई उड़ गई।
उस दिन पीहू ने न पानी बर्बाद किया, न किसी को नुकसान पहुँचाया। बस प्यार का एक छोटा सा टीका लगाकर सबसे खूबसूरत होली मनाई।
निष्कर्ष: असली खुशी
पीहू और आरव की यह होली हमें बताती है कि त्योहार मनाने के लिए बहुत तामझाम की ज़रूरत नहीं होती। बस दिल में प्यार और प्रकृति के प्रति सम्मान होना चाहिए।
इस कहानी से सीख (Moral)
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है:
पर्यावरण की रक्षा (Eco-friendly Celebration): हमें त्योहार मनाते समय प्रकृति का ध्यान रखना चाहिए। पानी और संसाधनों की बर्बादी से बचना चाहिए।
कृतज्ञता (Gratitude): जिन्होंने हमारी मदद की हो (जैसे आरव ने पीहू की), उन्हें अपने खुशियों के पलों में ज़रूर शामिल करना चाहिए।
Wikipedia Link
अधिक जानकारी के लिए देखें: पलाश (ढाक) - विकिपीडिया
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