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सर्वश्रेष्ठ हिंदी कहानी - यह कहानी रामपुर गाँव के दो किसानों, रामदीन और भोला की है, जो आपस में हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी नासमझी और ईर्ष्या को देखकर गाँव के एक समझदार बुजुर्ग, काका हरिराम, ने उन्हें एक अनोखे तरीके से समझाने का फैसला किया। उन्होंने जानवरों की एक ऐसी कहानी सुनाई, जिसमें आपसी बैर का भयानक अंजाम दिखाया गया था। यह सर्वश्रेष्ठ हिंदी कहानी (best hindi story hindi) हमें यह सिखाती है कि जब हम अपनों से ही उलझते हैं, तो बाहरी दुनिया हमारी कमजोरी का फायदा उठाने से नहीं चूकती।
तो चलिए, अब विस्तार से पढ़ते हैं यह रोचक और शिक्षाप्रद कहानी।
जैसी करनी वैसी भरनी
पुराने समय की बात है, रामपुर नाम का एक हरा-भरा गाँव था। उस गाँव में रामदीन और भोला नाम के दो किसान रहते थे। उनके खेत अगल-बगल ही थे, लेकिन उनके दिल एक-दूसरे से मीलों दूर थे। वे बात-बात पर आपस में उलझ पड़ते थे। कभी सिंचाई के पानी को लेकर तू-तू मैं-मैं होती, तो कभी खेत की मेढ़ को लेकर झगड़ा शुरू हो जाता। दोनों ही एक-दूसरे को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे।
उनकी इस रोज-रोज की किचकिच से पूरा गाँव परेशान था। गाँव के सबसे बुजुर्ग और समझदार व्यक्ति, काका हरिराम, यह सब देख रहे थे। वे जानते थे कि अगर इन दोनों को समय रहते नहीं समझाया गया, तो ये अपना ही नुकसान कर बैठेंगे।
एक शाम, ढलते सूरज के साथ काका हरिराम ने रामदीन और भोला को बरगद के पेड़ के नीचे बुलाया। दोनों आए तो सही, लेकिन मुंह फुलाए हुए और एक-दूसरे से नज़रें चुराते हुए।
काका हरिराम ने अपनी सफेद दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा, "बेटा रामदीन, और तुम भोला, तुम दोनों की यह दुश्मनी मुझे एक पुरानी घटना की याद दिलाती है। बैठो, आज तुम्हें एक किस्सा सुनाता हूँ, जो मैंने अपने दादाजी से सुना था।"
दोनों किसान अनमने ढंग से बैठ गए।
काका ने कहानी शुरू की:
"बहुत दूर एक घने
सूअर ने गुर्राते हुए कहा, 'हट जा मेरे रास्ते से, पहले पानी मैं पीऊँगा।'
सिंह ने दहाड़ मारी, 'जंगल का राजा मैं हूँ, पहले पानी पीने का हक मेरा है।'
बस फिर क्या था, दोनों में भयंकर लड़ाई छिड़ गई। सूअर अपने नुकीले दांतों से वार करता और सिंह अपने पंजों से। धूल का गुबार उड़ने लगा। घंटों तक लड़ाई चली। दोनों ही लहूलुहान हो गए थे, लेकिन कोई भी हार मानने को तैयार नहीं था। दोनों बुरी तरह थक चुके थे और हांफ रहे थे।
तभी, पास की झाड़ियों में छिपा एक चालाक शिकारी यह सब देख रहा था। उसकी आँखों में चमक आ गई।
सिंह ने जब देखा कि वह अब और नहीं लड़ सकता और सूअर उसे मार डालेगा, तो उसकी नज़र उस शिकारी पर पड़ी। सिंह ने अपनी जान बचाने के लिए एक चाल चली। वह धीरे से पीछे हटा और शिकारी के पास पहुँचा।
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सिंह ने शिकारी से कहा, 'सुनो भाई इंसान! यह जंगली सूअर बहुत खतरनाक है। यह आज मुझे मार डालेगा और कल तुम्हें भी नुकसान पहुँचा सकता है। अगर तुम मेरी मदद करो, तो हम इसे खत्म कर सकते हैं।'
शिकारी ने मन ही मन सोचा, 'यह तो बहुत अच्छा मौका है।' उसने ऊपर से अनजान बनते हुए पूछा, 'लेकिन मैं तुम्हारी मदद कैसे कर सकता हूँ? उसके दांत बहुत तेज हैं।'
सिंह ने योजना बताई, 'मैं सामने से जाकर उसका ध्यान भटकाता हूँ। तुम पीछे से जाकर अपनी जहरीली बरछी उसकी गर्दन में मार देना। उसका शिकार करके तुम्हें ढेर सारा मांस मिलेगा और उसकी कीमती खाल भी।'
शिकारी मान गया। योजना के मुताबिक, सिंह ने फिर से सूअर पर हमला किया। जैसे ही सूअर का पूरा ध्यान सिंह पर गया, शिकारी ने पीछे से अपनी बरछी पूरी ताकत से सूअर की गर्दन में दे मारी। सूअर चीखा और कुछ ही देर तड़पने के बाद ढेर हो गया।
सिंह ने राहत की सांस ली और शिकारी से कहा, 'शुक्रिया इंसान! अब तुम्हारा रास्ता साफ है, और यह शिकार भी तुम्हारा हुआ। मैं चलता हूँ।'
सिंह जैसे ही मुड़ा, उसे एक तेज दर्द महसूस हुआ। उसने देखा कि शिकारी ने दूसरी बरछी उसकी तरफ तान रखी थी।
सिंह ने दर्द से कराहते हुए पूछा, 'यह क्या? हमने तो समझौता किया था। मैंने तुम्हें इतना बड़ा शिकार दिलवाया है।'
शिकारी जोर से हंसा, 'हा हा हा! अरे मूर्ख जानवर! मैंने शिकार के लिए समझौता किया था। अब जब यह सूअर मर चुका है और तुम भी इतने घायल और थके हुए हो कि अपना बचाव नहीं कर सकते, तो मैं तुम्हें क्यों छोड़ूँ? तुम्हारी खाल भी तो बाज़ार में ऊँचे दामों पर बिकेगी। आज तो मेरी चाँदी ही चाँदी है!'
सिंह पछतावे के आँसू रोने लगा। उसने सोचा, 'अगर मैंने उस सूअर से नाहक दुश्मनी न की होती और हम मिलकर रहते, तो आज इस तीसरे की इतनी हिम्मत न होती कि हमारा फायदा उठाए। मैंने दूसरे को हराने के चक्कर में अपनी भी कब्र खोद ली।'
आखिरकार, उस चालाक शिकारी ने दोनों का शिकार कर लिया।"
कहानी खत्म करके काका हरिराम चुप हो गए। बरगद के नीचे सन्नाटा छा गया।
काका ने फिर गंभीर आवाज़ में कहा, "रामदीन और भोला! तुम दोनों भी उस सिंह और सूअर की तरह ही कर रहे हो। तुम दोनों की आपसी लड़ाई में गाँव के कुछ मतलबी लोग मजे ले रहे हैं। जिस दिन तुम दोनों बुरी तरह टूट जाओगे, कोई तीसरा बाहरी व्यक्ति आकर तुम्हारी ज़मीन-जायदाद हड़प लेगा, जैसे उस शिकारी ने दोनों जानवरों का फायदा उठाया। याद रखना, घर की फूट ही बाहर वालों को अंदर आने का रास्ता देती है।"
रामदीन और भोला का सिर शर्म से झुक गया। उन्हें काका की बात समझ में आ गई थी। उन्हें एहसास हुआ कि वे अपनी ईर्ष्या में अंधे होकर अपना ही नुकसान कर रहे थे।
उस दिन के बाद से, गाँव वालों ने फिर कभी रामदीन और भोला को लड़ते हुए नहीं देखा। वे समझ गए थे कि 'जैसे को तैसा' का खेल अपनों के साथ नहीं खेला जाता।
सीख (Moral of the Story)
इस सर्वश्रेष्ठ हिंदी कहानी (best hindi story) से हमें यह बहुमूल्य सीख मिलती है कि आपसी फूट और झगड़े का परिणाम हमेशा विनाशकारी होता है। जब दो लोग आपस में लड़ते हैं, तो वे कमजोर हो जाते हैं और कोई तीसरा चालाक व्यक्ति आसानी से उनकी इस कमजोरी का फायदा उठा लेता है। समझदारी इसी में है कि हम मिलजुल कर रहें और बाहरी ताकतों को अपने बीच आने का मौका न दें।
