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बच्चों के लिए राजा की बुद्धिमानी की एक अनोखी कहानी। जानिए कैसे राजा विक्रम ने अपनी प्रजा की परीक्षा ली और सिखाया कि हर मुसीबत के पीछे एक बड़ा अवसर छिपा होता है। एक शानदार Motivational Story in Hindi.
प्यारे बच्चों, क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि रस्ते में कोई बड़ी रुकावट आ गई हो और आपने सोचा हो, "उफ्फ! यह मुसीबत मेरे ही साथ क्यों होनी थी?" हम अक्सर परेशानियों को देखकर शिकायत करते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उन परेशानियों में भी मौका ढूंढ लेते हैं। आज की कहानी 'रत्नपुर' के समझदार राजा और एक साधारण किसान की है। यह कहानी आपको सिखाएगी कि Raja Ki Buddhimani कैसे एक आम पत्थर को भी किस्मत की चाबी बना सकती है।
रत्नपुर के राजा की चिंता
पुराने समय की बात है, भारतवर्ष के दक्षिण में 'रत्नपुर' नाम का एक खुशहाल राज्य था। वहां के राजा विक्रम सिंह बहुत ही न्यायप्रिय और बुद्धिमान थे। उनका राज्य धन-धान्य से भरा था, लेकिन राजा को एक बात की चिंता हमेशा सताती थी।
वह देखते थे कि उनकी प्रजा धीरे-धीरे आलसी होती जा रही है। लोग अपनी समस्याओं को सुलझाने के बजाय, हर छोटी-बड़ी बात के लिए सरकार या भगवान को दोष देते थे। अगर सड़क पर गड्ढा होता, तो लोग उसे भरने के बजाय गिरते-पड़ते निकल जाते और राजा को कोसते।
राजा विक्रम ने सोचा, "मुझे अपनी प्रजा को एक सबक सिखाना होगा। उन्हें समझाना होगा कि हाथ पर हाथ धरे बैठने से कुछ नहीं होता।"
राजा की अनोखी परीक्षा
एक अंधेरी रात में, राजा विक्रम ने अपने दो भरोसेमंद सैनिकों के साथ मिलकर शहर के मुख्य रास्ते के बीचों-बीच एक विशाल चट्टान (बड़ा पत्थर) रखवा दी। यह रास्ता बाजार जाने वाला सबसे मुख्य मार्ग था।
पत्थर रखवाने के बाद, राजा पास ही की झाड़ियों के पीछे छिप गए। वह देखना चाहते थे कि कौन इस पत्थर को रास्ते से हटाता है।
शिकायत करने वालों की भीड़
अगली सुबह हुई। सबसे पहले वहां से राज्य के सबसे अमीर व्यापारी, सेठ धनीराम अपनी बैलगाड़ी लेकर गुजरे। बैलगाड़ी पत्थर के पास आकर रुक गई। सेठ धनीराम नीचे उतरे और नाक-भौं सिकोड़ते हुए बोले, "हद्द है! राजा कितना लापरवाह हो गया है। बीच सड़क पर इतना बड़ा पत्थर पड़ा है और कोई हटाने वाला नहीं। मैं इतना टैक्स भरता हूँ, फिर भी यह हाल है।" सेठ जी ने अपनी गाड़ी को बड़ी मुश्किल से पत्थर के किनारे से निकाला और राजा को बुरा-भला कहते हुए चले गए।
कुछ देर बाद, राज्य के राज-ज्योतिषी वहां से गुजरे। उनका ध्यान आसमान में तारों की गणना करने में था कि तभी उनका पैर पत्थर से टकराया। "आह! मेरा पैर!" वह चिल्लाए। "यह पत्थर यहाँ किस मनहूस ने रखा है? राजा को अपने कर्मचारियों पर सख्ती करनी चाहिए," ज्योतिषी जी बड़बड़ाए और लंगड़ाते हुए आगे बढ़ गए।
दोपहर तक कई लोग वहां से गुजरे—सैनिक, मंत्री, और आम नागरिक। सबने पत्थर को देखा, सबने राजा को कोसा, लेकिन किसी ने भी उस पत्थर को हटाने की कोशिश नहीं की।
भोला किसान और उसकी कोशिश
शाम ढलने वाली थी। राजा विक्रम झाड़ियों के पीछे छिपे-छिपे निराश हो चुके थे। तभी उन्होंने देखा कि एक गरीब किसान, जिसका नाम भोला था, सिर पर सब्जियों की भारी टोकरी लिए आ रहा है।
भोला ने देखा कि एक विशाल पत्थर रास्ते को रोके हुए है। उसने सोचा, "अरे! इतना बड़ा पत्थर? अभी तो दिन है, लेकिन रात के अंधेरे में अगर कोई यहाँ से गुजरा और उसे यह नहीं दिखा, तो किसी को गहरी चोट लग सकती है। कोई बच्चा या बुजुर्ग इससे टकराकर गिर सकता है।"
भोला को अपनी थकान की परवाह नहीं थी। उसने अपनी सब्जियों की टोकरी नीचे रखी और पत्थर को हटाने के लिए आगे बढ़ा।
संघर्ष और सफलता
पत्थर बहुत भारी था। भोला ने उसे धकेला, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। "हे भगवान! शक्ति देना," भोला ने मन ही मन प्रार्थना की। उसने अपनी धोती कसी और पूरी ताकत लगाकर पत्थर को धक्का दिया। पसीने से उसका चेहरा भीग गया था। उसके हाथ छिल गए, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने सोचा कि यह किसी की सुरक्षा का सवाल है।
काफी मशक्कत के बाद, आखिर पत्थर थोड़ा हिला। भोला ने एक अंतिम ज़ोरदार धक्का दिया और पत्थर लुढ़कते हुए रास्ते के किनारे जा गिरा। "शुक्र है! अब रास्ता साफ़ है," भोला ने राहत की सांस ली।
पत्थर के नीचे का खजाना
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जैसे ही भोला अपनी सब्जियों की टोकरी उठाने के लिए झुका, उसकी नज़र उस जगह पर पड़ी जहां वह पत्थर रखा था। वहां जमीन पर एक मखमली थैली (Purse) और एक पत्र पड़ा था।
भोला ने डरते-डरते थैली उठाई। जैसे ही उसने थैली खोली, उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। वह थैली सोने के सिक्कों से भरी हुई थी!
तभी झाड़ियों के पीछे से राजा विक्रम बाहर आए। भोला घबरा गया और राजा के चरणों में गिर पड़ा। "क्षमा महाराज! मैंने तो बस रास्ता साफ़ किया था।"
राजा ने मुस्कुराते हुए उसे उठाया और कहा, "डरो मत भोला। यह सोने के सिक्के तुम्हारे लिए ही हैं। यह तुम्हारा इनाम है।"
राजा ने वह पत्र उठाया और जोर से पढ़ा, ताकि वहां जमा हो रही भीड़ सुन सके: "यह खजाना उस व्यक्ति के लिए है, जिसमें इस पत्थर को हटाने की हिम्मत और दूसरों के लिए सेवा-भाव है।"
राजा ने समझाया, "बाकी सबने केवल समस्या की शिकायत की, लेकिन तुमने समस्या को सुलझाया। याद रखो, हर रुकावट अपने साथ एक अवसर लेकर आती है। जो लोग मुसीबतों से भागते हैं, वे खजाने से भी चूक जाते हैं।"
भोला की आँखों में खुशी के आंसू थे। उस दिन वह सिर्फ अमीर ही नहीं हुआ, बल्कि पूरे राज्य के लिए एक मिसाल बन गया।
कहानी से सीख (Moral of the Story)
राजा की इस बुद्धिमानी और भोला की मेहनत से हमें तीन अनमोल बातें सीखने को मिलती हैं:
समस्या नहीं, समाधान बनो: शिकायत करना आसान है, लेकिन जो व्यक्ति समस्या को हल करता है, असली सफलता उसी को मिलती है।
हर मुश्किल में एक मौका है: जिसे हम मुसीबत समझते हैं (जैसे भारी पत्थर), उसके नीचे अक्सर कोई बड़ा इनाम (सोने के सिक्के) छिपा होता है।
परोपकार का फल: भोला ने दूसरों की भलाई के लिए पत्थर हटाया, और उसे उसका फल मिला। अच्छे कर्म कभी व्यर्थ नहीं जाते।
क्या आप जानते हैं? इतिहास में राजा विक्रमादित्य अपनी बुद्धिमानी और न्याय के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। उनके दरबार में 'नवरत्न' (नौ विद्वान) हुआ करते थे। राजाओं और उनके इतिहास के बारे में और अधिक जानने के लिए आप Wikipedia पढ़ सकते हैं।
लेखक की कलम से: बच्चों, अगली बार जब होमवर्क मुश्किल लगे या कोई काम कठिन लगे, तो याद रखना—शायद यह वही 'भारी पत्थर' है जिसके नीचे आपकी सफलता का 'सोने का सिक्का' छिपा है!
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