/lotpot/media/media_files/2026/01/14/suraj-ki-roshni-motivational-story-kids-1-2026-01-14-16-30-49.jpg)
जीवन में प्रकाश का महत्व
संसार में 'रोशनी' केवल दिन और रात का अंतर नहीं बताती, बल्कि यह ऊर्जा, आशा और नए जीवन का प्रतीक है। जिस प्रकार सूर्य बिना किसी भेदभाव के पूरी दुनिया को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार हमारे विचार और मेहनत भी दूसरों के जीवन में उजाला ला सकते हैं। अक्सर हम छोटी-छोटी मुश्किलों से घबराकर अंधेरे में बैठ जाते हैं, लेकिन जो व्यक्ति सूरज की तरह तपना जानता है, वही दुनिया को रोशन कर पाता है। यह कहानी 'धुंधलपुर' नामक एक अनोखे गाँव की है, जहाँ सूरज की रोशनी को लोग भूल चुके थे। आइए जानते हैं आदित्य के साहस की यह जादुई दास्तान।
धुंधलपुर का सन्नाटा और डरे हुए लोग
/filters:format(webp)/lotpot/media/media_files/2026/01/14/suraj-ki-roshni-motivational-story-kids-2-2026-01-14-16-30-49.jpg)
हिमालय की वादियों के बीच एक गाँव था जिसका नाम था 'धुंधलपुर'। यहाँ का नाम ऐसा इसलिए था क्योंकि यहाँ साल के बारह महीने घनी धुंध छाई रहती थी। सूरज की रोशनी यहाँ के ऊँचे पहाड़ों को पार करके मुश्किल से ही नीचे पहुँच पाती थी। यहाँ के लोग बहुत ही सुस्त और डरे हुए थे। उनका मानना था कि सूरज की रोशनी आँखों के लिए हानिकारक है और वे केवल मशालों की हल्की रोशनी में रहना पसंद करते थे।
इसी गाँव में आदित्य नाम का एक 12 साल का लड़का रहता था। आदित्य बाकी बच्चों से अलग था। वह अक्सर ऊँचे पेड़ों पर चढ़कर यह देखने की कोशिश करता था कि उन घने बादलों के पार क्या है। उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जिसे गाँव के बड़े-बूढ़े 'पागलपन' कहते थे।
आदित्य की दादी उसे अक्सर पुराने समय की कहानियाँ सुनाती थीं— "बेटा, एक समय था जब यहाँ की मिट्टी सोना उगलती थी और सूरज की रोशनी हमारी फसलों को चूमती थी। लेकिन फिर लोगों ने आलस किया और पहाड़ों पर इतने घने पेड़ लगा दिए कि सूरज का रास्ता ही रुक गया।"
आदित्य का सपना और पहाड़ की चुनौती
आदित्य ने ठान लिया था कि वह 'सूरज की रोशनी' को वापस लाएगा। उसने गाँव के बच्चों से कहा, "दोस्तों, क्या तुम नहीं चाहते कि हम भी नीला आसमान देखें? क्या तुम नहीं चाहते कि हमारे खेतों में फिर से सुनहरी बालियाँ लहलहाएँ?"
गाँव के सबसे शरारती लड़के 'कालू' ने उसका मज़ाक उड़ाया, "अरे आदित्य! तू तो सूरज की बातें ऐसे कर रहा है जैसे वह तेरी जेब में रखा हो। हम यहाँ सुरक्षित हैं, हमें उस तेज़ रोशनी की ज़रूरत नहीं।"
लेकिन आदित्य नहीं रुका। उसने तर्क (Logic) लगाया कि अगर वह सबसे ऊँची चोटी 'स्वर्ण शिखर' पर चढ़ जाए, तो वह उन बादलों के ऊपर पहुँच सकता है और शायद रोशनी का कोई रास्ता निकाल सके। उसने अपने बस्ते में कुछ औजार और अपनी दादी का आशीर्वाद लिया और यात्रा शुरू की।
चढ़ाई का संघर्ष और अकेलापन
स्वर्ण शिखर की चढ़ाई बहुत कठिन थी। रास्ता फिसलन भरा था और चारों ओर अंधेरा था। कई बार आदित्य का पैर फिसला, कई बार उसे लगा कि कालू सही था। लेकिन जब भी वह थकने लगता, उसे अपनी दादी की कही बात याद आती— "सूरज कभी हार नहीं मानता, वह हर रात के बाद फिर से उदय होता है।"
चलते-चलते आदित्य को एक गुफा मिली। वहाँ एक बूढ़ा आदमी बैठा था, जो बरसों से पत्थर तराश रहा था। उस आदमी ने आदित्य से पूछा, "बेटा, इस अंधेरे में कहाँ जा रहे हो?"
आदित्य ने कहा, "बाबा, मैं सूरज की रोशनी ढूँढने जा रहा हूँ।"
बूढ़े ने हंसकर कहा, "रोशनी बाहर नहीं, तुम्हारे इरादों में है। अगर तुम इस पहाड़ के उस पत्थर को हटा सको जो बरसों से झरने के मुँह पर पड़ा है, तो शायद पहाड़ की दूसरी तरफ की रोशनी यहाँ पहुँच सके।"
तर्क और विज्ञान का मेल
आदित्य ने उस पत्थर को देखा। वह बहुत विशाल था। उसे हटाना किसी बच्चे के बस की बात नहीं थी। लेकिन आदित्य ने हार मानने के बजाय 'लिवर' (Leverage) के सिद्धांत का इस्तेमाल किया। उसने एक मज़बूत लकड़ी और एक छोटे पत्थर की मदद से उस विशाल पत्थर को धीरे-धीरे खिसकाना शुरू किया।
पसीने से लथपथ आदित्य ने अपनी पूरी जान लगा दी। और अचानक— धड़ाम!
पत्थर खिसकते ही एक अद्भुत नज़ारा दिखा। पहाड़ के उस पार से 'सूरज की रोशनी' की एक तेज़ और सुनहरी किरण उस छेद से होती हुई सीधे धुंधलपुर की घाटी में गिरी। वह रोशनी इतनी पवित्र और जादुई थी कि जहाँ-जहाँ वह पड़ी, वहाँ की धुंध पल भर में छंट गई।
धुंधलपुर का हृदय परिवर्तन
/filters:format(webp)/lotpot/media/media_files/2026/01/14/suraj-ki-roshni-motivational-story-kids-3-2026-01-14-16-30-49.jpg)
गाँव के लोग जब सुबह उठे, तो वे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं कर सके। बरसों बाद उन्होंने अपनी परछाईं देखी थी। वे डरे नहीं, बल्कि उस गर्माहट को महसूस करके रोने लगे। आदित्य ऊपर से चिल्लाया, "देखो! सूरज की रोशनी दुश्मन नहीं, हमारी मित्र है!"
आदित्य नीचे आया, तो उसका स्वागत एक विजेता की तरह हुआ। उसने सबको समझाया कि केवल पहाड़ का पत्थर हटाना काफी नहीं है, हमें अपने मन के आलस और डर को भी हटाना होगा। उसने गाँव वालों के साथ मिलकर उन घने जंगलों की छंटाई की जो सूरज का रास्ता रोक रहे थे।
निष्कर्ष: खुद सूरज बनें
आज धुंधलपुर का नाम बदलकर 'प्रकाशपुर' हो गया है। वहाँ अब केवल सूरज की रोशनी ही नहीं, बल्कि ज्ञान और मेहनत की रोशनी भी चमकती है। आदित्य ने साबित कर दिया कि एक छोटा सा बच्चा भी अगर अटल इरादा कर ले, तो वह पूरी दुनिया का अंधेरा मिटा सकता है।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
यह कहानी हमें सिखाती है कि "कठिन परिश्रम और दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी अंधेरे को दूर किया जा सकता है।" 'सूरज की रोशनी' हमारे भीतर की वह सकारात्मकता है जिसे हमें कभी बुझने नहीं देना चाहिए। जब हम खुद को बेहतर बनाने की कोशिश करते हैं और दूसरों के जीवन में प्रकाश लाते हैं, तो हम स्वयं सूरज की तरह चमकने लगते हैं। कभी भी परिस्थितियों के अंधेरे से हार न मानें, बल्कि अपनी मेहनत से रोशनी का रास्ता बनाएं।
सूरज और सौर मंडल के बारे में और अधिक जानने के लिए आप सूर्य - विकिपीडिया देख सकते हैं।
और पढ़ें :
अकबर बीरबल : मूर्ख चोर का पर्दाफाश
प्रेरक कहानी: कौओं की गिनती का रहस्य
प्रेरक कथा- राजा की चतुराई और ब्राह्मण की जीत
बीरबल की चतुराई: अंडे की मस्ती भरी कहानी
Tags : Hindi Motivational Stories | Hindi Motivational Story | hindi motivational story for kids | Kids Hindi Motivational Stories | Kids Hindi Motivational Story | kids motivational stories | kids motivational stories in hindi | kids motivational story | moral motivational story for kids
