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जब स्वाद और लालच का मेल हो जाए
दुनिया में दो चीजें कभी नहीं छुपतीं—एक सच और दूसरा स्वादिष्ट अचार की खुशबू! अक्सर लोग सोचते हैं कि वे बहुत चालाक हैं और किसी को भी 'चूना' लगा सकते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि हर शेर के ऊपर एक सवा शेर बैठा होता है। आज की हमारी कहानी 'हीरे और आम का अचार' इसी कशमकश के इर्द-गिर्द घूमती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि ईमानदारी का रास्ता ही सबसे सही होता है, वरना लालच में इंसान अपना 'अचार' और 'विचार' दोनों खराब कर बैठता है।
रंगीलापुर का मशहूर जौहरी और एक सुनहरा मौका
एक समय की बात है, एक बहुत ही खुशहाल और रंगीन शहर था जिसका नाम था 'रंगीलापुर'। यहाँ के लोग खाने-पीने के उतने ही शौकीन थे जितने कि सजने-संवरने के। इसी शहर में हीराचंद नाम के एक बहुत ही मशहूर जौहरी रहते थे। हीराचंद के बनाए गहनों की चमक ऐसी थी कि लोग उन्हें दूर-दूर से देखने आते थे।
एक दिन हीराचंद को सात समंदर पार से महारानी का एक शाही खत मिला। खत में लिखा था, "हीराचंद जी, हम आपकी कला के मुरीद हैं। हम चाहते हैं कि आप हमारे दरबार में आएं और हमारे लिए कुछ नायाब हीरे के हार बनाएं।"
हीराचंद खुशी से झूम उठे। उन्होंने सोचा, "अरे वाह! यह तो मेरी किस्मत बदलने वाला मौका है। लेकिन..." तभी उनका ध्यान शहर की बढ़ती चोरियों की तरफ गया। उन्होंने देखा कि उनकी दुकान के बाहर सिपाही एक चोर को पकड़ कर ले जा रहे थे। हीराचंद के माथे पर पसीना आ गया। "इतने सारे कीमती हीरों को दुकान में छोड़कर जाना तो खुद ही चोरों को दावत देना है। क्या करूं?"
दिमाग की बत्ती और अचार की बरनी
हीराचंद सोच ही रहे थे कि तभी गली में एक आवाज़ गूँजी—"ताज़ा चटपटा आम का अचार ले लो! सालों साल चलने वाला खट्टा-मीठा अचार!"
यह सुनते ही हीराचंद के दिमाग की बत्ती जल गई। उन्होंने सोचा, "अचार! कौन चोर अचार की बरनी चुराएगा? सब गहने और पैसे ढूंढेंगे, कोई पुराना खट्टा अचार नहीं।" उन्होंने तुरंत अचार वाले को बुलाया और एक बड़ी सी मिट्टी की बरनी खरीदी।
हीराचंद ने बड़ी सावधानी से बरनी का आधा अचार एक बर्तन में निकाला। फिर उन्होंने अपने सारे बेशकीमती हीरे एक थैली में भरे और उन्हें बरनी के बिल्कुल नीचे रख दिया। ऊपर से उन्होंने वापस सारा आम का अचार डाल दिया और बरनी का मुँह कसकर कपड़े से बांध दिया। हीराचंद खुद से बोले, "वाह हीराचंद! तेरी अकल का कोई जवाब नहीं। अब ये हीरे पूरी तरह सुरक्षित हैं।"
दोस्त 'मक्खन लाल' पर भरोसा
हीराचंद ने सोचा कि बरनी को दुकान में रखना भी ठीक नहीं है, अगर चोरों ने भूख के मारे अचार खा लिया तो? तभी वहाँ उनका बचपन का दोस्त मक्खन लाल आ गया। मक्खन लाल नाम की तरह ही चिकनी-चुपड़ी बातें करने में माहिर था।
हीराचंद ने कहा, "मक्खन भाई, मुझे एक जरूरी काम से 6 महीनों के लिए विदेश जाना पड़ रहा है। माँ ने घर से बड़े प्यार से ये अचार की बरनी भेजी है, लेकिन मेरे घर में चूहे बहुत हैं। क्या तुम इसे अपने पास रख सकते हो?"
मक्खन लाल ने दांत चमकाते हुए कहा, "बस इतनी सी बात? अरे दोस्त, मैं इसे अपनी जान से भी ज्यादा संभाल कर रखूँगा। इसे मेरे घर के कोने में छोड़ दो, कोई परिंदा भी पर नहीं मारेगा।" हीराचंद को राहत मिली और वे निश्चिंत होकर विदेश चले गए।
6 महीने बाद: लौट के बुद्धू घर को आए
महारानी का काम खत्म करके जब हीराचंद वापस लौटे, तो वे बिल्कुल बदल चुके थे। उन्होंने कोट-पेंट पहना था और उनके बात करने का अंदाज़ा भी शाही हो गया था। वे सबसे पहले मक्खन लाल के घर पहुँचे।
"मक्खन भाई! मैं वापस आ गया। मेरी अचार की बरनी दे दो, उसका स्वाद चखने के लिए मैं तड़प रहा हूँ," हीराचंद ने कहा।
मक्खन लाल ने बड़े ही साधारण तरीके से बरनी पकड़ा दी और कहा, "ये लो भाई, तुम्हारी अमानत। मैंने तो इसे देखा तक नहीं।"
हीराचंद बरनी लेकर घर आए और खुशी-खुशी उसे उलटा किया। लेकिन यह क्या! बरनी से सिर्फ आम के टुकड़े और तेल ही निकला। हीरे गायब थे! हीराचंद का सिर चकरा गया। "मेरे हीरे कहाँ गए? क्या हीरे भी गलकर अचार बन गए? नहीं, ज़रूर इस मक्खन ने मुझे चूना लगाया है!"
हीराचंद गुस्से में मक्खन लाल के पास पहुँचे, लेकिन मक्खन लाल साफ़ मुकर गया। "अरे हीराचंद, अचार की बरनी से हीरे निकलेंगे क्या? लगता है विदेश जाकर तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है।"
महाराजा गोल-मटोल का दरबार और चतुर चाचा
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मामला शहर के राजा महाराजा गोल-मटोल के दरबार में पहुँचा। वहाँ चतुर चाचा नाम के एक वयोवृद्ध और बुद्धिमान सलाहकार थे, जो अपनी सूझबूझ के लिए मशहूर थे।
महाराजा ने पूछा, "हीराचंद, क्या तुम्हारे पास कोई सबूत है कि तुमने बरनी में हीरे रखे थे?" हीराचंद ने सिर झुकाकर कहा, "नहीं महाराज, मैंने तो भरोसे में आकर ये काम किया था।"
मक्खन लाल हाथ जोड़कर बोला, "महाराज, मैं तो बेकसूर हूँ। मैंने तो बरनी को छुआ तक नहीं।"
चतुर चाचा सब देख रहे थे। उन्होंने गौर किया कि मक्खन लाल बार-बार अपनी उंगलियां चाट रहा था, जैसे उसके हाथ में अभी भी अचार का स्वाद हो। चाचा ने मुस्कुराते हुए कहा, "महाराज, इस केस को सुलझाने के लिए हमें शहर के सबसे बड़े रसोइए 'स्वादु जी' को बुलाना होगा।"
स्वाद का इम्तिहान
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स्वादु जी दरबार में आए। चतुर चाचा ने वह बरनी उनके सामने रखी और कहा, "स्वादु जी, जरा इस अचार को चखकर बताइए कि यह कितना पुराना है?"
स्वादु जी ने एक टुकड़ा मुँह में रखा, आँखें बंद कीं और बोले, "वाह! क्या ज़ायका है। लेकिन महाराज, यह अचार तो ताज़ा है। इसे बने मुश्किल से एक महीना हुआ है।"
यह सुनते ही मक्खन लाल के पसीने छूटने लगे। चतुर चाचा दहाड़े, "मक्खन लाल! अगर हीराचंद ने यह बरनी 6 महीने पहले तुम्हें दी थी और तुमने इसे छुआ तक नहीं, तो इसमें एक महीने पुराना ताज़ा अचार कहाँ से आया?"
मक्खन लाल घुटनों पर गिर पड़ा और रोने लगा। उसने कबूल किया, "महाराज, मुझे माफ़ कर दीजिए! एक दिन मेरे घर में अचार खत्म हो गया था। मैंने सोचा हीराचंद की बरनी से थोड़ा सा अचार निकाल लेता हूँ, उसे क्या पता चलेगा। लेकिन जैसे ही मैंने चम्मच डाला, मुझे कुछ सख्त महसूस हुआ। बाहर निकाला तो वह हीरा था! लालच में आकर मैंने सारे हीरे निकाल लिए और पकड़े जाने के डर से उसमें नया अचार भर दिया।"
ईमानदारी की जीत
महाराजा गोल-मटोल ने मक्खन लाल को आदेश दिया कि वह तुरंत हीराचंद के सारे हीरे लौटाए और साथ ही उस पर भारी जुर्माना भी लगाया। हीराचंद को उनके हीरे वापस मिल गए और उन्होंने चतुर चाचा का शुक्रिया अदा किया।
पूरे रंगीलापुर में यह बात फैल गई कि बुद्धि की ताकत सबसे बड़ी होती है।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
यह कहानी हमें सिखाती है कि "लालच का फल हमेशा कड़वा होता है"। हमें कभी भी किसी के भरोसे को नहीं तोड़ना चाहिए। साथ ही, सच को छिपाने के लिए आप चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, सच्चाई किसी न किसी रास्ते से बाहर आ ही जाती है। अपनी अकल और तर्क (Logic) का सही इस्तेमाल करके हम किसी भी मुश्किल समस्या का हल निकाल सकते हैं।
अचार के इतिहास और उसके प्रकारों के बारे में अधिक जानने के लिए आप अचार - विकिपीडिया देख सकते हैं।
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