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आँख उठाकर न देखना: चिंटू हिरण और उसकी एकाग्रता की कहानी

पढ़िए "आँख उठाकर न देखना" पर आधारित एक नई जंगल कहानी। जानिए कैसे नन्हे चिंटू हिरण ने अपनी विनम्रता और एकाग्रता से मुश्किल रास्तों को पार किया। बच्चों के लिए एक बड़ी सीख।

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क्या है 'आँख उठाकर न देखना' का असली मतलब?

अक्सर हम 'आँख उठाकर न देखना' का मतलब केवल शर्म या संकोच से जोड़ते हैं, लेकिन बच्चों के लिए इसका एक गहरा अर्थ एकाग्रता (Focus) और विनम्रता (Humility) भी है। जब हम अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं, तो रास्ते में बहुत से लोग हमें डराने या भटकाने की कोशिश करते हैं। उस समय अपनी नज़रें नीची रखकर केवल अपने काम पर ध्यान देना ही सबसे बड़ी जीत है। एकाग्रता (Focus) की शक्ति को समझाने वाली यह कहानी 'हरि-द्वीप' के एक नन्हे हिरण चिंटू की है, जिसने साबित किया कि विनम्रता ही असली साहस है।

हरि-द्वीप का शांत नन्हा हीरो: चिंटू

हरे-भरे पेड़ों और मीठी नदियों के बीच एक सुंदर द्वीप था, जिसे 'हरि-द्वीप' कहा जाता था। यहाँ के जानवर बहुत मिलनसार थे, लेकिन इस द्वीप के उत्तरी हिस्से में पहाड़ी भेड़ियों का राज था। इसी द्वीप के सुरक्षित हिस्से में एक नन्हा हिरण रहता था, जिसका नाम था चिंटू

चिंटू बहुत ही शांत और शर्मीला था। उसकी एक खास पहचान थी—वह अपने गले में हमेशा एक 'शतरंज जैसी काली-सफ़ेद घंटी' (Checkered Bell) पहनता था। जब वह चलता, तो वह घंटी 'टिन-टिन' नहीं बल्कि एक मधुर धुन निकालती थी। चिंटू का स्वभाव था कि वह बड़ों के सामने हमेशा अपनी नज़रें नीची रखता था। कुछ जानवर इसे उसकी कमज़ोरी समझते थे, लेकिन उसकी माँ कहती थी, "बेटा, असली ताकत आवाज़ में नहीं, इरादों में होती है।"

'हवाओं का पुल' और कठिन चुनौती

एक बार हरि-द्वीप पर एक बड़ी समस्या आ गई। द्वीप की सबसे पुरानी हिरण, जिन्हें सब 'दादी नानी' कहते थे, बहुत बीमार पड़ गईं। उन्हें ठीक करने के लिए 'चाँदी के झरने' का जादुई पानी चाहिए था। वह झरना पहाड़ी भेड़ियों के इलाके के ठीक पीछे था। वहाँ जाने का केवल एक ही रास्ता था—'हवाओं का पुल'

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यह पुल बहुत ऊँचा और संकरा था। नीचे गहरी खाई थी और तेज़ हवाएं चलती थीं। सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि उस पुल के किनारों पर पहाड़ी भेड़िये बैठे रहते थे जो वहाँ से गुज़रने वाले हर जीव को डराते और उनका मज़ाक उड़ाते थे।

जब किसी की हिम्मत नहीं हुई, तब चिंटू ने आगे आकर कहा, "मैं दादी नानी के लिए जादुई पानी लेकर आऊँगा।"

सब चौंक गए। घमंडी खरगोश 'तेज़ू' हँसकर बोला, "अरे चिंटू! तुम तो किसी की आँखों में आँखें डालकर देख भी नहीं सकते, उन खूँखार भेड़ियों का सामना कैसे करोगे?"

चिंटू ने बस अपनी नज़रें नीची कीं और अपनी घंटी को सहलाते हुए कहा, "मुझे भेड़ियों से लड़ना नहीं है, मुझे बस पानी लाना है।"

भेड़ियों का जाल और चिंटू का मौन

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चिंटू अपनी पीठ पर एक छोटा सा मटका लेकर 'हवाओं के पुल' पर पहुँचा। जैसे ही उसने पुल पर पहला कदम रखा, भेड़ियों का सरदार 'ज़ोरबा' सामने आ गया। ज़ोरबा की पहचान थी कि वह अपने गले में एक 'नुकीला काला पट्टा' (Spiky Collar) पहनता था।

ज़ोरबा ने गुर्राते हुए कहा, "ओए छोटे! कहाँ जा रहा है? इधर देख, मेरी आँखों में देख! क्या तुझे डर नहीं लगता?"

चिंटू ने ज़ोरबा की तरफ आँख उठाकर भी नहीं देखा। उसने अपना ध्यान केवल अपने अगले कदम पर लगाया। उसे पता था कि अगर वह ऊपर देखेगा, तो ऊँचाई देखकर उसे चक्कर आ सकते हैं और भेड़ियों का डरावना चेहरा उसे विचलित कर सकता है।

भेड़िये शोर मचाने लगे। कोई उसके कानों के पास आकर चिल्लाता, तो कोई उसके पैरों के पास कंकड़ फेंकता। एक भेड़िये ने कहा, "देखो तो, यह डरपोक हिरण तो इतना डरा हुआ है कि आँख उठाकर देख भी नहीं रहा!"

लेकिन चिंटू का मन शांत था। वह अपने मन में एक धुन गुनगुना रहा था और अपनी घंटी की आवाज़ पर ध्यान दे रहा था। उसके लिए 'आँख उठाकर न देखना' कोई डर नहीं, बल्कि उसकी रणनीति थी।

एकाग्रता की अद्भुत जीत

पुल के बीचों-बीच हवा बहुत तेज़ हो गई। चिंटू के पैर लड़खड़ाने लगे। ज़ोरबा ने कहा, "अब तो तू गिरेगा! बस एक बार मेरी तरफ देख, मैं तुझे रास्ता दे दूँगा।"

चिंटू समझ गया कि यह एक जाल है। वह जानता था कि अगर उसने अपनी नज़रें रास्ते से हटाईं, तो वह अपना संतुलन खो देगा। उसने अपनी गर्दन और नीची कर ली और अपने खुरों (hooves) की पकड़ पत्थर पर मज़बूत कर ली। उसने मन ही मन सोचा—"मेरा लक्ष्य केवल वह जादुई पानी है, इन भेड़ियों की बातें नहीं।"

चिंटू की इस शांति और एकाग्रता ने भेड़ियों को हैरान कर दिया। उन्हें लगा कि शायद चिंटू को कुछ सुनाई नहीं दे रहा या वह कोई जादू जानता है। धीरे-धीरे, चिंटू पुल पार कर गया। भेड़िये उसे देखते ही रह गए, वे उसे छू भी नहीं पाए क्योंकि चिंटू ने उन्हें अपने ऊपर हावी होने का मौका ही नहीं दिया था।

सफलता और नई पहचान

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चिंटू जादुई पानी लेकर वापस आया। दादी नानी ने वह पानी पीया और वे कुछ ही देर में स्वस्थ हो गईं। पूरे हरि-द्वीप में खुशियाँ छा गईं। जब जानवरों ने चिंटू से पूछा कि उसने उन खूँखार भेड़ियों का सामना कैसे किया, तो चिंटू ने मुस्कुराते हुए कहा:

"मैंने उनका सामना किया ही नहीं। मैंने तो बस अपना रास्ता देखा। जब हम आँख उठाकर उन लोगों को नहीं देखते जो हमें डराना चाहते हैं, तो उनकी ताकत अपने आप खत्म हो जाती है।"

अब 'तेज़ू' खरगोश और दूसरे जानवरों को समझ आया कि चिंटू की विनम्रता उसकी कमजोरी नहीं, उसका सबसे बड़ा हथियार थी। उस दिन के बाद, 'आँख उठाकर न देखना' हरि-द्वीप के बच्चों के लिए डर का नहीं, बल्कि 'अटूट एकाग्रता' का मुहावरा बन गया।

कहानी की सीख (Moral)

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि "अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते समय दुनिया के शोर और बाधाओं की तरफ ध्यान न देना ही सबसे बड़ी समझदारी है।" जब हम अपनी विनम्रता और एकाग्रता को नहीं छोड़ते, तो बड़ी से बड़ी मुसीबत भी हमारा रास्ता नहीं रोक सकती। शांत रहकर किया गया काम चिल्लाकर की गई कोशिशों से कहीं अधिक शक्तिशाली होता है।

विकिपीडिया लिंक (Wikipedia Link)

एकाग्रता और मानसिक दृढ़ता के बारे में और जानने के लिए: Focus/Attention 

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