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दोस्ती की अग्नि-परीक्षा | Jungle Story

मुसीबत में अकेले रहने से अच्छा है मिलजुल कर सामना करना। पढ़िए 'एक से भले दो' की यह प्रेरणादायक कहानी, जहाँ दो अधूरे दोस्तों ने मिलकर एक-दूसरे को पूरा किया।

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Ek Se Bhale Do: बादल और चुलबुल की अनोखी यात्रा

अक्सर हम अपनी कमियों को लेकर दुखी रहते हैं। हमें लगता है कि अगर हमारे पास सबकुछ नहीं है, तो हम बेकार हैं। लेकिन प्रकृति का नियम है कि कोई भी पूर्ण नहीं होता। जब दो लोग अपनी-अपनी ताकतों को मिला लेते हैं, तो वे अजेय हो जाते हैं। यही असली मतलब है Ek Se Bhale Do (Unity is Strength) का। यह कहानी 'सुंदरवन' के दो ऐसे जानवरों की है—बादल (एक अंधा घोड़ा) और चुलबुल (एक लंगड़ा बंदर)—जिन्हें जंगल के बाकी जानवर लाचार समझते थे। लेकिन जब जंगल पर आग की विपत्ति आई, तो इन्ही दोनों ने साबित किया कि साथ मिलकर बड़ी से बड़ी मुसीबत को हराया जा सकता है।

कहानी: दो अधूरे, बने एक पूरे

बादल और चुलबुल का अकेलापन

सुंदरवन के किनारे, एक पुरानी हवेली के खंडहर के पास बादल नाम का एक सफेद घोड़ा रहता था। जवानी में बादल बहुत तेज़ दौड़ता था, लेकिन अब बूढ़ा होने के साथ-साथ उसकी आँखों की रोशनी चली गई थी। वह देख नहीं सकता था, इसलिए वह एक ही जगह खड़ा रहता और आस-पास की घास खाकर गुज़ारा करता। जंगल के शरारती सियार अक्सर उसे परेशान करते और वह लाचारी से बस हिनहिना कर रह जाता।

उसी खंडहर की छत पर चुलबुल नाम का एक बंदर रहता था। एक बार पेड़ से गिरने के कारण चुलबुल का एक पैर टूट गया था, जो कभी ठीक नहीं हुआ। वह लंगड़ा कर चलता था और बाकी बंदरों की तरह तेज़ी से पेड़ पर नहीं चढ़ पाता था। उसका झुंड उसे पीछे छोड़कर चला गया था।

दोनों अकेले थे। दोनों को लगता था कि उनका जीवन बेकार है। बादल के पास पैर थे, पर आँखें नहीं। चुलबुल के पास आँखें थीं, पर तेज़ पैर नहीं। वे अक्सर एक-दूसरे के पास रहते थे, लेकिन कभी बात नहीं करते थे।

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जंगल में आफत
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गर्मियों का मौसम था। दोपहर की तेज़ धूप में सूखे पत्ते बारूद की तरह तप रहे थे। अचानक, जंगल के पश्चिमी छोर से धुआं उठता दिखाई दिया। हवा के झोंकों ने एक छोटी सी चिंगारी को भयानक दावानल (Forest Fire) में बदल दिया।

"आग! आग! भागो!" जंगल में भगदड़ मच गई। शेर, हिरण, खरगोश—सब अपनी जान बचाने के लिए नदी की तरफ भागने लगे। आसमान धुएं से काला हो गया। पंछी शोर मचाते हुए उड़ने लगे।

खंडहर के पास भी गर्मी बढ़ने लगी। चुलबुल बंदर ने ऊपर से देखा कि लाल रंग की लपटें तेज़ी से उनकी तरफ बढ़ रही हैं। वह घबरा गया। वह लंगड़ाते हुए भागने की कोशिश करने लगा, लेकिन उसे पता था कि आग की रफ़्तार उससे कहीं ज़्यादा है।

नीचे खड़ा बादल (घोड़ा) धुएं की गंध सूंघकर बेचैन हो रहा था। वह हिनहिना रहा था और इधर-उधर भागने की कोशिश कर रहा था, लेकिन अंधा होने के कारण वह पत्थरों से टकराकर गिर रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि किस दिशा में जाना सुरक्षित है।

एक से भले दो (द टर्निंग पॉइंट)

चुलबुल ने ऊपर से बादल की हालत देखी। उसे दया आ गई। उसने सोचा, "मैं भाग नहीं सकता, और यह देख नहीं सकता। अगर हम अलग-अलग रहे, तो दोनों मरेंगे।"

चुलबुल ने हिम्मत करके नीचे छलांग लगाई (जितना वह अपने लंगड़े पैर से लगा सकता था)। वह बादल के पास गया और चिल्लाया, "बादल काका! डरो मत! मैं चुलबुल हूँ।"

बादल घबराहट में बोला, "चुलबुल! चारों तरफ आग की लपटें हैं। मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा। मैं कहाँ जाऊं?"

चुलबुल ने एक पल सोचा और बोला, "काका, मेरे पास एक उपाय है। मेरे पास आँखें हैं, मैं रास्ता देख सकता हूँ। तुम्हारे पास मज़बूत पैर हैं, तुम दौड़ सकते हो। अगर हम एक हो जाएं, तो हम इस आग से जीत सकते हैं।"

बादल ने पूछा, "लेकिन कैसे?"

चुलबुल ने कहा, "मुझे अपनी पीठ पर बैठने दो। मैं तुम्हें रास्ता बताऊंगा—दाएं, बाएं या सीधे। तुम बस मेरी आवाज़ सुनकर दौड़ना।"

बादल के पास और कोई चारा नहीं था। उसने घुटने मोड़े और चुलबुल उसकी पीठ पर चढ़ गया। चुलबुल ने कसकर बादल की अयाल (Mane) पकड़ ली।

मौत से रेस

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"सीधे चलो काका! तेज़!" चुलबुल चिल्लाया। बादल ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। वह हवा से बातें करने लगा। चुलबुल ऊपर बैठा हुआ एक सारथी (Driver) की तरह उसे निर्देश दे रहा था।

"दाएं मुड़ो! वहां एक बड़ा पेड़ गिर रहा है!" चुलबुल ने चेतावनी दी। बादल ने तुरंत दाईं ओर छलांग लगाई और जलते हुए पेड़ से बाल-बाल बचा।

"अब बाएं! वहां झाड़ियों में आग लगी है!" दोनों का तालमेल इतना सटीक था कि लग ही नहीं रहा था कि घोड़ा अंधा है या बंदर लंगड़ा। वे एक शरीर और एक जान बन गए थे। धुआं उनकी आँखों और सांसों में भर रहा था, गर्मी से खाल जल रही थी, लेकिन उन्होंने रुकने का नाम नहीं लिया।

रास्ते में उन्होंने देखा कि कई जानवर, जिनके पास आँखें और पैर दोनों थे, वे भी घबराहट में रास्ता भटक गए थे। लेकिन बादल और चुलबुल, अपनी कमियों के बावजूद, सबसे आगे थे क्योंकि उनके पास सहयोग की शक्ति थी।

नदी का किनारा और जीत

आखिरकार, उन्हें ठंडी हवा का झोंका महसूस हुआ। सामने नदी थी। "काका, बस पहुँच गए! सामने पानी है!" चुलबुल खुशी से चिल्लाया।

बादल ने एक आखिरी लंबी छलांग लगाई और सीधे नदी के उथले पानी में जा खड़ा हुआ। ठंडा पानी उनके जलते हुए शरीर को सुकून देने लगा। वे सुरक्षित थे। आग नदी के उस पार नहीं आ सकती थी।

दोनों ने गहरी सांस ली। बादल ने कहा, "बेटा चुलबुल, आज अगर तुम न होते, तो मैं राख बन गया होता।" चुलबुल ने मुस्कुराते हुए कहा, "और अगर आपके मज़बूत पैर न होते काका, तो मैं भी वहीं भुन जाता। आज हम इसलिए बचे क्योंकि हम 'एक से भले दो' हो गए।"

निष्कर्ष: नई दोस्ती

उस दिन के बाद, सुंदरवन में एक अनोखी जोड़ी मशहूर हो गई। एक अंधा घोड़ा और उसकी पीठ पर बैठा लंगड़ा बंदर। अब वे कभी अकेले नहीं थे। चुलबुल, बादल की आँखें बन गया और बादल, चुलबुल के पैर। उन्होंने जंगल को दिखा दिया कि कमियां हमें कमज़ोर नहीं बनातीं, बल्कि हमें एक-दूसरे से जुड़ने का मौका देती हैं।

इस कहानी से सीख (Moral)

इस कहानी से हमें यह बहुमूल्य सीख मिलती है:

  1. सहयोग में शक्ति है: जो काम हम अकेले नहीं कर सकते, वह साथ मिलकर आसानी से किया जा सकता है।

  2. कोई बेकार नहीं है: हर किसी में कोई न कोई गुण होता है। हमें एक-दूसरे की कमियों को पूरा करना चाहिए, न कि उनका मज़ाक उड़ाना चाहिए।

Wikipedia Link

अधिक जानकारी के लिए देखें: सहयोग (Cooperation) - विकिपीडिया

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