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भारत के दक्षिणी हिस्से में एक बहुत ही विशाल और घना जंगल था, जिसे 'नीलगिरी वन' कहा जाता था। इस जंगल में ऊंचे-ऊंचे पेड़, खूबसूरत झरने और तरह-तरह के जानवर रहते थे। इसी जंगल के बीचों-बीच एक छोटा सा और गहरा तालाब था। इस तालाब में सैकड़ों मेंढक (Frog) रहा करते थे।
इन मेंढकों की दुनिया बस वह तालाब और उसके आस-पास की कुछ झाड़ियाँ ही थीं। उनके लिए वही उनका पूरा ब्रह्मांड था। लेकिन उन्हीं मेंढकों के बीच एक नन्हा सा हरे रंग का ट्री-फ्रॉग (Tree Frog) रहता था, जिसका नाम था 'मोंटी'। मोंटी दूसरे मेंढकों से बहुत अलग था। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी और चमकीली थीं। वह अक्सर तालाब के किनारे बैठकर ऊपर आसमान की तरफ देखता रहता था।
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तालाब के ठीक बगल में एक बहुत ही विशाल और पुराना बरगद का पेड़ (Banyan Tree) था। वह पेड़ इतना ऊंचा था कि उसकी फुनगी (Top) बादलों को छूती हुई लगती थी। मोंटी हमेशा सोचता था कि इस पेड़ के सबसे ऊपर से यह दुनिया कैसी दिखती होगी। उसकी इसी आदत के कारण जंगल के सभी लोग कहते थे कि मोंटी की ऊँची सोच एक दिन उसे बहुत आगे ले जाएगी।
सपनों का मजाक और मोंटी का दृढ़ निश्चय
एक दिन मोंटी ने तालाब के सबसे बुजुर्ग और मुखिया मेंढक 'दादा टर्र-टर्र' से कहा, "दादाजी! मैं इस बरगद के पेड़ की सबसे ऊंची चोटी पर चढ़ना चाहता हूँ। मैं देखना चाहता हूँ कि आसमान के पार क्या है।"
यह सुनते ही तालाब के सारे मेंढक ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे। एक मोटे मेंढक ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा, "अरे ओ मोंटी! तू एक छोटा सा मेंढक है, कोई गरुड़ या चील नहीं। हमारा काम पानी में तैरना और कीड़े खाना है। पेड़ पर चढ़ना हमारा काम नहीं है।"
दादा टर्र-टर्र ने भी उसे समझाते हुए कहा, "बेटा, पागलपन छोड़ो। जो लोग अपनी औकात से बड़ी बातें सोचते हैं, वे हमेशा गिरकर मुँह की खाते हैं।"
लेकिन मोंटी के इरादे पक्के थे। उसने लोटपोट की प्रेरणादायक कहानी में पढ़ा था कि अगर मन में विश्वास हो, तो कुछ भी असंभव नहीं है। उसने तय कर लिया कि वह अपनी ऊँची सोच को हकीकत में बदलकर दिखाएगा। वह अपनी बात पर अड़ा रहा और अगले दिन सुबह-सुबह बरगद के पेड़ की जड़ के पास पहुँच गया।
साहसिक यात्रा की शुरुआत
सूरज की पहली किरण के साथ मोंटी ने पेड़ के तने पर छलांग लगाई। पेड़ की छाल बहुत खुरदरी और फिसलन भरी थी। शुरुआत में वह कई बार फिसला और नीचे गिरा। नीचे तालाब में बैठे मेंढक उसकी नाकामी पर हँस रहे थे। "देखा! हमने तो पहले ही कहा था कि यह नहीं हो सकता," एक मेंढक चिल्लाया।
लेकिन मोंटी ने हार नहीं मानी। उसने अपने छोटे लेकिन चिपचिपे पंजों को पेड़ की छाल पर मजबूती से जमाया और धीरे-धीरे ऊपर की ओर खिसकने लगा। उसकी इस साहसिक यात्रा ने जंगल के कुछ अन्य जानवरों का ध्यान भी अपनी ओर खींच लिया। पेड़ पर बैठी एक गिलहरी ने कहा, "वाह नन्हे मेंढक! तुम्हारी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी।"
जैसे-जैसे मोंटी ऊपर जा रहा था, हवा तेज़ होने लगी और चढ़ाई कठिन होती गई। लेकिन नीचे देखने पर तालाब अब एक छोटी सी कटोरी जैसा लग रहा था। यह नज़ारा देखकर मोंटी का हौसला और बढ़ गया।
सबसे बड़ा खतरा: हरा सांप 'कालिया'
मोंटी जब पेड़ के बीचों-बीच पहुँचा, तो उसके सामने एक बहुत बड़ी चुनौती आ खड़ी हुई। पेड़ की एक मोटी डाल पर 'कालिया' नाम का एक खतरनाक हरा सांप कुंडली मारे बैठा था। कालिया की नज़र मोंटी पर पड़ गई। उसने अपनी जीभ लपलपाते हुए कहा, "वाह! आज तो मेरा नाश्ता खुद चलकर मेरे पास आ गया है।"
मोंटी एक पल के लिए डर गया। लेकिन फिर उसे याद आया कि हिंदी कहानियां में हमेशा बताया जाता है कि मुसीबत के समय घबराना नहीं चाहिए, बल्कि अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना चाहिए।
मोंटी ने तुरंत दिमाग लगाया और बिल्कुल शांत स्वर में बोला, "कालिया जी, आप मुझे खा सकते हैं, लेकिन मुझे खाने से पहले आपको ऊपर बैठे गरुड़ महाराज से पूछना होगा। उन्होंने ही मुझे पेड़ की चोटी पर बुलाया है। अगर आप मुझे खाएंगे, तो वे आपको नहीं छोड़ेंगे।"
'गरुड़' का नाम सुनते ही कालिया सांप डर के मारे कांपने लगा, क्योंकि गरुड़ सांपों का सबसे बड़ा दुश्मन होता है। कालिया ने तुरंत मोंटी को रास्ता दे दिया और खुद पेड़ के खोखले तने में छिप गया। मोंटी की सूझबूझ और ऊँची सोच ने आज उसकी जान बचा ली थी।
चोटी पर विजय और अद्भुत नज़ारा
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लगातार कई घंटों की कड़ी मेहनत के बाद, मोंटी आखिरकार बरगद के पेड़ की सबसे ऊपरी पत्ती पर पहुँच गया। जब उसने वहाँ से चारों तरफ देखा, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।
वहाँ से पूरा नीलगिरी जंगल एक विशाल हरे कालीन जैसा लग रहा था। नदियां चाँदी की चमकती लकीरों की तरह बह रही थीं और दूर पहाड़ों के पीछे से सूरज ढल रहा था, जिसने पूरे आसमान को सुनहरे और नारंगी रंग में रंग दिया था। यह दुनिया उस छोटे से तालाब से लाखों गुना बड़ी और खूबसूरत थी।
मोंटी ने महसूस किया कि अगर वह दूसरे मेंढकों की बात मानकर तालाब में ही रहता, तो वह इस अद्भुत सुंदरता को कभी नहीं देख पाता। उसकी ऊँची सोच ने उसे दुनिया का सबसे खुशकिस्मत मेंढक बना दिया था।
वापस लौटकर दी गई सीख
अगले दिन जब मोंटी वापस तालाब में पहुँचा, तो उसने सभी मेंढकों को ऊपर की दुनिया के बारे में बताया। उसने बताया कि दुनिया हमारे कुएं (तालाब) से बहुत बड़ी है।
पहले तो किसी ने विश्वास नहीं किया, लेकिन पेड़ पर रहने वाले पक्षियों ने मोंटी की कहानी की पुष्टि की। दादा टर्र-टर्र ने आगे बढ़कर मोंटी को गले लगा लिया और कहा, "मोंटी, तुमने साबित कर दिया कि शरीर छोटा होने से सपने छोटे नहीं होते। तुम्हारी सोच ने आज हम सबकी आँखें खोल दी हैं।"
उस दिन के बाद से, तालाब के कई युवा मेंढक मोंटी से प्रेरित होकर नई-नई चीजें सीखने लगे।
इस कहानी से सीख (Moral of the Story):
सोच बड़ी रखें: हमारी सफलता हमारी सोच पर निर्भर करती है। अगर सोच ऊँची होगी, तो लक्ष्य भी बड़ा हासिल होगा।
दूसरों की नकारात्मकता (Negativity) से न डरें: लोग हमेशा नया काम करने वालों का मज़ाक उड़ाते हैं, लेकिन दृढ़ निश्चय वाले लोग उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते।
बुद्धि और साहस: रास्ते में आने वाली बाधाओं को शारीरिक ताकत से नहीं, बल्कि बुद्धि और साहस से पार किया जा सकता है।
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