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विनम्रता और मित्रता का महत्व
अक्सर हमें अपनी ताकत, धन या सुंदरता पर इतना घमंड हो जाता है कि हम अपने आस-पास के लोगों का सम्मान करना भूल जाते हैं। हमें लगता है कि हमें कभी किसी की मदद की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता। "शेलू मगरमच्छ का पछतावा" एक ऐसी ही कहानी है जो हमें सिखाती है कि शरीर से बड़ा होना या ताकतवर होना ही सब कुछ नहीं है। असली ताकत दूसरों का दिल जीतने में और मुसीबत के समय काम आने में है। यह कहानी 'नील-सरोवर' के उस मगरमच्छ की है जिसने अपनी गलतियों से सीखा कि पछतावे की आग से निकलकर ही इंसान नेक बन सकता है।
नील-सरोवर का अहंकारी राजा: शेलू मगरमच्छ
हिमालय की वादियों के पास एक बहुत बड़ी और गहरी झील थी जिसका नाम था 'नील-सरोवर'। इस झील का पानी इतना साफ़ था कि आकाश की परछाई उसमें साफ दिखाई देती थी। झील के किनारे बहुत सारे जीव-जंतु रहते थे। इसी झील के सबसे गहरे कोने में शेलू नाम का एक विशाल मगरमच्छ रहता था।
शेलू की कद-काठी देखकर ही बड़े-बड़े जानवर डर जाते थे। उसकी पीठ पर सख्त हरे रंग की ढाल जैसी खाल थी और उसके जबड़े इतने मज़बूत थे कि वे एक ही बार में लकड़ी के लट्ठे को तोड़ सकते थे। लेकिन शेलू जितना ताकतवर था, उतना ही बदतमीज और अहंकारी भी था। वह झील के किनारे आने वाले छोटे जानवरों को डराता, पानी पीते हुए हिरणों को परेशान करता और कछुओं का मज़ाक उड़ाता था।
शेलू का मानना था— "ताकतवर को किसी दोस्त की ज़रूरत नहीं होती। डर ही सबसे बड़ा सम्मान है।"
वह मनहूस दोपहर और असहनीय दर्द
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एक दिन, शेलू ने झील के किनारे एक बड़ी मछली का शिकार किया। वह अपनी आदत के मुताबिक जल्दबाजी में और बड़े-बड़े टुकड़ों में मछली खा रहा था। अचानक, मछली की एक बहुत ही नुकीली और सख्त हड्डी उसके मसूड़े में जाकर गहराई तक धँस गई।
शेलू ने सोचा कि यह अपने आप निकल जाएगी, लेकिन कुछ ही घंटों में उसका पूरा जबड़ा सूज गया। वह दर्द से कराहने लगा। मगरमच्छ के जबड़े ऐसे होते हैं कि वे खुद अपने दाँतों के बीच फंसी चीज़ नहीं निकाल सकते। वह दर्द इतना बढ़ गया कि शेलू पानी की सतह पर आकर छटपटाने लगा।
उसने पहले तो अपनी पूंछ पटककर दर्द कम करने की कोशिश की, फिर किनारे के पत्थरों पर अपना मुँह रगड़ा, पर हड्डी और भी अंदर धँस गई। अब शेलू का मुँह भी ठीक से बंद नहीं हो पा रहा था।
मदद की तलाश और सन्नाटा
शेलू धीरे-धीरे रेंगते हुए झील के किनारे पहुँचा। वहाँ एक टीटू नाम का कछुआ धूप सेक रहा था। शेलू ने कराहते हुए कहा, "टीटू भाई, मेरी मदद करो। मेरे मुँह में एक हड्डी फँस गई है, इसे निकाल दो।"
टीटू कछुआ अपनी जगह से थोड़ा पीछे हटा और बोला, "शेलू, याद है पिछले हफ्ते तुमने मेरी पीठ पर चढ़कर मुझे पानी के अंदर धकेल दिया था और हँस रहे थे? आज तुम दर्द में हो, तो मुझे भाई कह रहे हो। मुझे डर है कि अगर मैं तुम्हारे मुँह के पास आया, तो तुम मुझे ही खा जाओगे।" टीटू पानी में तैरकर चला गया।
शेलू आगे बढ़ा। उसे एक हिरण मिला, फिर एक बंदर। लेकिन हर किसी ने वही जवाब दिया— "तुमने हमेशा हमें डराया है शेलू, आज हम तुम्हारी मदद क्यों करें? तुम अपनी ताकत से खुद ही निकाल लो।"
शेलू को पहली बार अहसास हुआ कि उसने अपने चारों ओर 'दोस्त' नहीं, बल्कि सिर्फ 'दुश्मन' और 'डरने वाले' बनाए थे। वह किनारे पर अपनी आँखें बंद करके पड़ा रहा, उसकी आँखों से मोटे-मोटे आँसू गिर रहे थे। यह सिर्फ दर्द के आँसू नहीं थे, बल्कि यह 'शेलू मगरमच्छ का पछतावा' था।
नन्ही चिड़िया 'मीतू' और निस्वार्थ सेवा
तभी वहाँ एक छोटी सी चिड़िया उड़ती हुई आई, जिसका नाम था मीतू। मीतू एक 'क्रोक-बर्ड' (Plover) प्रजाति की चिड़िया थी, जो अक्सर मगरमच्छों के दाँत साफ करने के लिए जानी जाती है। लेकिन शेलू इतना खूंखार था कि उसने कभी किसी चिड़िया को अपने पास भटकने भी नहीं दिया था।
मीतू ने शेलू को रोते हुए देखा। उसने हिम्मत जुटाई और उसके पास गई। "शेलू भाई, क्या मैं आपकी मदद कर सकती हूँ?"
शेलू ने धीरे से आँखें खोलीं और कहा, "नन्ही चिड़िया, तुम दूर रहो। मैं बहुत दर्द में हूँ, कहीं तुम्हें चोट न लग जाए। वैसे भी, मैं इस मदद के काबिल नहीं हूँ। मैंने सबको दुखी किया है।"
मीतू ने बड़ी समझदारी से कहा, "गलती करना बुरा है, पर उसे मान लेना अच्छाई की शुरुआत है। आप अपना मुँह खोलिए, मैं कोशिश करती हूँ।"
शेलू ने अपना विशाल जबड़ा खोला। मीतू बिना डरे उसके मुँह के अंदर घुसी। उसने देखा कि एक बड़ी हड्डी मसूड़े को चीर चुकी थी। मीतू ने अपनी चोंच से उस हड्डी को पकड़ा और एक झटके में बाहर निकाल दिया।
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शेलू का हृदय परिवर्तन
हड्डी निकलते ही शेलू को जन्नत जैसा सुकून मिला। उसने अपनी आँखें खोलीं और मीतू को धन्यवाद दिया। लेकिन वह अभी भी दुखी था।
मीतू ने पूछा, "अब क्या हुआ शेलू भाई? अब तो दर्द खत्म हो गया।"
शेलू ने भारी आवाज़ में कहा, "मीतू, शारीरिक दर्द तो खत्म हो गया, पर मेरे मन का दर्द अभी बाकी है। मैंने अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल किया। मैंने उन लोगों को रुलाया जो मेरे साथ रह सकते थे। क्या वे मुझे कभी माफ़ करेंगे?"
मीतू ने मुस्कुराकर कहा, "पछतावा ही माफ़ी का पहला कदम है। आप अपनी ताकत का इस्तेमाल अब उनकी रक्षा के लिए कीजिए, उन्हें डराने के लिए नहीं। देखिएगा, नील-सरोवर फिर से खिल उठेगा।"
निष्कर्ष: नील-सरोवर का नया रक्षक
उस दिन के बाद शेलू पूरी तरह बदल गया। उसने कछुओं को अपनी पीठ पर सैर कराई, छोटे हिरणों को पानी पीने के लिए सुरक्षित रास्ता दिया और मीतू को अपना सबसे अच्छा दोस्त बनाया। अब वह 'नील-सरोवर का राक्षस' नहीं, बल्कि 'नील-सरोवर का रक्षक' बन चुका था।
शेलू की इस कहानी ने पूरे जंगल को सिखाया कि क्षमा और सेवा ही असली ताकत है। शेलू आज भी झील के किनारे पड़ा रहता है, पर अब कोई उससे डरता नहीं, बल्कि बच्चे उसकी पूंछ के पास खेलते हैं।
कहानी की सीख (Moral of the Story)
यह कहानी हमें सिखाती है कि "घमंड और बदतमीजी इंसान को अकेला कर देती है, जबकि विनम्रता और दयालुता हमें सच्चे दोस्त दिलाती है।" अपनी ताकत पर कभी गर्व नहीं करना चाहिए क्योंकि वक्त आने पर एक छोटी सी चिड़िया भी वह काम कर सकती है जो एक विशाल मगरमच्छ नहीं कर सकता। पछतावा वह जरिया है जिससे हम अपनी पुरानी गलतियों को सुधारकर एक बेहतर इंसान बन सकते हैं।
मगरमच्छ और चिड़ियों के इस अनोखे प्राकृतिक रिश्ते के बारे में और अधिक जानने के लिए आप मगरमच्छ - विकिपीडिया देख सकते हैं।
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