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Raah Ka Saathi: ब्रह्मदत्त और उसके अनोखे मित्र की कहानी

पंचतंत्र की प्रसिद्ध कहानी 'राह का साथी' पढ़ें। जानिए कैसे एक माँ की ज़िद और एक छोटे से केकड़े ने ब्राह्मण कुमार ब्रह्मदत्त की जान बचाई। उसे क्या पता था कि यही छोटा सा केकड़ा यमराज से उसकी रक्षा करेगा।

By Lotpot
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हम अक्सर बड़ों की बातों को यह सोचकर टाल देते हैं कि वे बहुत ज्यादा चिंता करते हैं। लेकिन बड़ों का अनुभव और उनकी दूरदर्शिता कई बार हमारी जान बचाने के काम आती है। आज की कहानी 'राह का साथी' (Raah Ka Saathi) पंचतंत्र के पन्नों से ली गई है। यह कहानी है ब्रह्मदत्त नाम के एक युवक की, जिसे अपनी माँ की बात मानकर एक छोटे से केकड़े (Crab) को साथ रखना पड़ा। उसे क्या पता था कि यही छोटा सा केकड़ा यमराज से उसकी रक्षा करेगा।

कहानी: माँ का आशीर्वाद और कपूर की खुशबू

ब्रह्मदत्त की यात्रा और माँ की चिंता

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बहुत समय पहले की बात है, एक नगर में ब्रह्मदत्त नाम का एक ब्राह्मण युवक रहता था। वह सीधा-सादा और नेकदिल इंसान था। एक बार उसे किसी ज़रूरी काम से दूसरे गाँव जाना पड़ा। उस ज़माने में गाड़ियाँ नहीं होती थीं, लोग पैदल ही सफर करते थे और रास्ते में घने जंगल पड़ते थे।

जब ब्रह्मदत्त जाने लगा, तो उसकी बूढ़ी माँ ने उसे रोका। "बेटा, रास्ता लंबा है और जंगल बिहड़ है। अकेले जाना ठीक नहीं। किसी को साथ ले लो।"

ब्रह्मदत्त हँसा और बोला, "माँ, तुम बेकार में डरती हो। मैं अब बड़ा हो गया हूँ और रास्ते में कोई डर नहीं है। मेरे पास कोई साथी नहीं है, तो क्या मैं काम पर न जाऊँ?"

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माँ ने देखा कि बेटा नहीं मान रहा, लेकिन उनका दिल गवाही नहीं दे रहा था। वह दौड़कर घर के पिछवाड़े वाले तालाब पर गईं। वहाँ उन्हें एक केकड़ा दिखा। उन्होंने उसे कपड़े में लपेटा और ब्रह्मदत्त को थमा दिया।

माँ बोलीं, "बेटा, अगर कोई इंसान साथ नहीं है, तो कम से कम इस केकड़े को ही रख ले। कहते हैं, राह का साथी होना चाहिए, चाहे वह कोई भी हो। इसे अपनी कपूर की डिबिया में रख ले, यह ठंडा रहेगा।"

ब्रह्मदत्त को माँ की बात थोड़ी अजीब लगी, लेकिन उनका मन रखने के लिए उसने केकड़े को कपूर वाली डिबिया में रखा और डिबिया को अपने झोले में डाल लिया।

सुहानी नींद और मौत की दस्तक

ब्रह्मदत्त चलते-चलते थक गया। जेठ की दुपहरी थी और सूरज आग बरसा रहा था। उसने सोचा कि थोड़ी देर आराम कर लिया जाए। वह रास्ते में एक बड़े से पीपल के पेड़ के नीचे रुका। ठंडी हवा चल रही थी, इसलिए उसने अपना झोला सिर के नीचे रखा और उसे गहरी नींद आ गई।

उसे अंदाज़ा भी नहीं था कि वह जिस पेड़ के नीचे सो रहा है, उसकी जड़ में एक काले नाग का बिल है।

जंगल में सन्नाटा था। तभी ब्रह्मदत्त के झोले से कपूर (Camphor) की भीनी-भीनी खुशबू आने लगी। साँपों को कपूर की गंध बहुत आकर्षित करती है। बिल के अंदर बैठे काले नाग ने जब यह खुशबू सूंघी, तो वह मदहोश होकर बाहर निकल आया।

केकड़े का साहसिक वार

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नाग रेंगता हुआ सीधा ब्रह्मदत्त के झोले के पास पहुँचा। उसे लगा कि उस डिबिया में कोई बहुत स्वादिष्ट चीज़ है। ब्रह्मदत्त गहरी नींद में था, उसे भनक भी नहीं लगी कि मौत उसके सिरहाने खड़ी है।

नाग ने अपना फन उठाया और झोले के अंदर घुसकर उस डिबिया को निगलने की कोशिश करने लगा, जिसमें केकड़ा बंद था। डिबिया का ढक्कन थोड़ा ढीला था।

जैसे ही नाग ने अपना मुंह डिबिया पर मारा, अंदर बैठे केकड़े को खतरा महसूस हुआ। केकड़े ने देखा कि एक काला नाग उसे खाने आ रहा है। केकड़े के पंजों (Claws) की पकड़ बहुत मजबूत होती है। उसने तुरंत अपने दोनों नुकीले पंजों से नाग की गर्दन को कसकर जकड़ लिया।

नाग दर्द से तड़पने लगा। वह जितना छुड़ाने की कोशिश करता, केकड़े की पकड़ उतनी ही कसती जाती। थोड़ी ही देर में नाग का दम घुट गया और वह वहीं ब्रह्मदत्त के सिरहाने ढेर हो गया। केकड़े ने उसे तब तक नहीं छोड़ा जब तक वह मर नहीं गया।

माँ की बात का असली मतलब

शाम को जब ब्रह्मदत्त की आँख खुली, तो उसने जो नज़ारा देखा, उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसके झोले के पास एक विशाल काला नाग मरा पड़ा था और कपूर की डिबिया से निकला हुआ केकड़ा अभी भी उसकी गर्दन पकड़े बैठा था।

ब्रह्मदत्त सब कुछ समझ गया। "हे भगवान! अगर आज यह केकड़ा मेरे साथ न होता, तो यह सांप मुझे डस लेता और मैं कभी घर वापस नहीं जा पाता।"

उसने हाथ जोड़कर आसमान की तरफ देखा और अपनी माँ को धन्यवाद दिया। उसे समझ आ गया था कि माँ ने उसे वह केकड़ा क्यों दिया था। वह राह का साथी भले ही छोटा था, लेकिन उसी ने उसकी जान बचाई थी।

निष्कर्ष

ब्रह्मदत्त ने उस केकड़े को बड़े आदर के साथ वापस तालाब में छोड़ा और यह कसम खाई कि वह कभी भी बड़ों की नसीहत को छोटा नहीं समझेगा।

इस कहानी से सीख (Moral)

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है:

  1. बड़ों की बात मानें: माता-पिता की सलाह के पीछे हमेशा हमारा भला और सुरक्षा छिपी होती है।

  2. राह का साथी ज़रूरी है: सफर में अकेले रहने से बेहतर है कि कोई न कोई साथी हो, चाहे वह कितना भी छोटा या तुच्छ क्यों न लगे।

Wikipedia Link

अधिक जानकारी के लिए देखें: पंचतंत्र - विकिपीडिया

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