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रघु काका की परीक्षा | नैतिक बाल कहानी :- शहरों में हम अक्सर लोगों को उनके कपड़ों और काम से जज करते हैं। अगर कोई सूट-बूट में है तो 'जेंटलमैन', और अगर कोई सड़क पर रेहड़ी लगा रहा है तो 'चोर-उचक्का'। लेकिन क्या हो जब एक साधारण Ice Cream Wala शहर के सबसे बड़े अमीर को शराफत का पाठ पढ़ा दे? यह कहानी 'मेट्रो सिटी' के एक व्यस्त चौराहे पर खड़े रघु काका और एक हड़बड़ी में रहने वाले बिज़नेसमैन मिस्टर मेहरा की है। एक खोया हुआ वॉलेट, पुलिस का सायरन और एक ऐसा क्लाइमेक्स जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा।
कहानी: ठंडी आइसक्रीम, गर्म दिमाग
जून की तपती दोपहर
मेट्रो सिटी का 'घंटाघर चौक'। दोपहर के 2 बज रहे थे। सूरज आग बरसा रहा था। एसी गाड़ियों के शीशे चढ़े हुए थे, और बाहर खड़े ट्रैफिक पुलिस वाले पसीने से तर-बतर थे।
उसी चौक के एक कोने में रघु काका की पुरानी आइसक्रीम कार्ट खड़ी थी। कार्ट पर एक बड़ा सा संतरी छाता (Orange Umbrella) लगा था, जो रघु काका को कम और आइसक्रीम को ज़्यादा धूप से बचा रहा था। रघु काका की उम्र 60 के पार थी—सफेद दाढ़ी, एक धुली हुई नीली शर्ट और सिर पर एक गांधी टोपी।
"कुल्फी! ठंडी-ठंडी मलाई कुल्फी!" उनकी आवाज़ ट्रैफ़िक के शोर में दब जाती थी, लेकिन जिसे खानी होती, वो पहुँच ही जाता।
तभी वहां एक चमचमाती हुई काली एसयूवी (SUV) आकर रुकी। कार से एक सूट-बूट पहने व्यक्ति उतरे—मिस्टर मेहरा। उनके साथ उनका 10 साल का बेटा आर्यन था। "पापा! मुझे वो वाली खानी है, चोको-बार!" आर्यन चिल्लाया।
मिस्टर मेहरा फ़ोन पर किसी पर चिल्ला रहे थे, "मुझे वो डील आज ही चाहिए! बहाने मत बनाओ!" उन्होंने फ़ोन कंधे और कान के बीच फंसाया और जेब से वॉलेट निकाला। "ए भाई! दो चोको-बार देना। जल्दी करना, टाइम नहीं है," उन्होंने रघु काका की तरफ देखे बिना आर्डर दिया।
हड़बड़ी की गड़बड़ी
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रघु काका ने जल्दी से दो आइसक्रीम निकालीं और दीं। मिस्टर मेहरा ने वॉलेट से 500 का नोट निकालकर काउंटर पर रखा। रघु काका खुले पैसे ढूँढ़ने लगे। तभी मिस्टर मेहरा का फ़ोन हाथ से फिसलने लगा। उसे पकड़ने के चक्कर में उन्होंने अपना मोटा लेदर वॉलेट आइसक्रीम कार्ट के साइड वाले काउंटर पर रख दिया।
"अरे रख लो खुले पैसे!" मिस्टर मेहरा ने झुंझलाकर कहा और आर्यन का हाथ पकड़कर वापस कार की तरफ भागे क्योंकि पीछे से हॉर्न बजने लगे थे। वे कार में बैठे और धूल उड़ाते हुए निकल गए।
रघु काका ने पीछे से आवाज़ दी, "साहब! साहब! आपका..." लेकिन एसी कार के बंद शीशों तक उनकी आवाज़ नहीं पहुँची। रघु काका ने काउंटर पर देखा। वहां मिस्टर मेहरा का वॉलेट रखा था। उन्होंने उसे उठाया। वह काफी भारी था। उन्होंने उसे खोलकर नहीं देखा, बस अपने आइस-बॉक्स के नीचे एक सुरक्षित सूखे डिब्बे में रख दिया। उन्होंने सोचा, "साहब को याद आएगा तो वापस आएंगे।"
सीन 3: इल्ज़ाम का तूफ़ान
शाम के 6 बज गए। रघु काका जाने की तैयारी कर रहे थे। तभी अचानक टायरों के चीखने की आवाज़ आई। वही काली एसयूवी वापस आई और रघु काका की रेहड़ी के ठीक सामने ब्रेक लगाकर रुकी।
मिस्टर मेहरा कार से बाहर निकले। इस बार उनका चेहरा गुस्से से लाल था। उनके साथ दो हट्टे-कट्टे पुलिस वाले भी थे। "यही है वो! यही खड़ा था मैं दोपहर में!" मिस्टर मेहरा ने उंगली उठाई।
रघु काका ने हाथ जोड़े, "साहब..." "चुप रहो!" मिस्टर मेहरा ने डंडा (काल्पनिक) चलाया। "मेरा वॉलेट कहाँ है? दोपहर में मैं यहीं भूल गया था। उसमें 50 हज़ार कैश और क्रेडिट कार्ड्स थे। सीधे-सीधे दे दो वरना पुलिस तुम्हें थाने ले जाएगी।"
रघु काका घबरा गए। भीड़ जमा होने लगी। "साहब, मैं तो आपका इंतज़ार..." "झूठ मत बोलो!" मिस्टर मेहरा चिल्लाए। "तुम जैसे लोगों को मैं जानता हूँ। मौका मिलते ही हाथ साफ़ कर देते हो। इंस्पेक्टर, इसे गिरफ्तार करो और मेरी रेहड़ी की तलाशी लो।"
भीड़ में खड़े लोग फुसफुसाने लगे। "अरे, गरीब आदमी है, लालच आ गया होगा।" आर्यन कार की खिड़की से सहम कर देख रहा था। उसे रघु काका का चेहरा याद था, वो चोर नहीं लग रहे थे।
सीन 4: सच्चाई की ठंडक (Logic & Twist)
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इंस्पेक्टर ने रघु काका का कॉलर पकड़ा। "चल बे बुड्ढे, थाने में बोलेगा तू।" रघु काका की आँखों में आंसू आ गए। उन्होंने कांपते हाथों से इंस्पेक्टर का हाथ हटाया और अपनी कार्ट के नीचे वाले डिब्बे की तरफ इशारा किया। "साहब, तलाशी लेने की ज़रूरत नहीं है। वो रहा इनका पर्स।"
रघु काका ने वो डिब्बा खोला और उसमें से वही लेदर वॉलेट निकाला। "साहब, धूप बहुत तेज़ थी। मुझे लगा कहीं गर्मी से आपके कार्ड खराब न हो जाएं या कोई और न उठा ले, इसलिए मैंने इसे बर्फ वाले डिब्बे के नीचे छिपा दिया था। मैं 4 घंटे से यहीं खड़ा हूँ कि आप आएंगे।"
मिस्टर मेहरा सन्न रह गए। उन्होंने वॉलेट छीना और चेक किया। एक-एक नोट, एक-एक कार्ड सलामत था। वहां खड़ी भीड़, जो अभी रघु काका को चोर समझ रही थी, अब मिस्टर मेहरा को घूर रही थी।
इंस्पेक्टर ने मेहरा जी को देखा। "सर, वॉलेट मिल गया। सब कुछ ठीक है?" मिस्टर मेहरा का गुस्सा पानी हो गया। शर्म के मारे उनकी गर्दन झुक गई। उन्होंने एक गरीब आइसक्रीम वाले पर बिना सबूत के चोरी का इल्ज़ाम लगाया था, जबकि वो आदमी उनकी अमानत की रखवाली कर रहा था।
क्लाइमेक्स: शराफत की कीमत
मिस्टर मेहरा ने वॉलेट से 2000 रुपये निकाले और रघु काका की तरफ बढ़ाए। "ये... ये लो। इनाम। और सॉरी, मैंने तुम्हें गलत समझा।"
रघु काका ने पैसे लेने से मना कर दिया। उन्होंने अपनी टोपी ठीक की और हल्की मुस्कान के साथ बोले, "साहब, हम गरीब ज़रूर हैं, पर बेईमान नहीं। यह इनाम आप अपने पास रखिये। बस अगली बार किसी गरीब को देखकर उसे चोर मत समझियेगा। इज़्ज़त 50 हज़ार से ज़्यादा कीमती होती है।"
मिस्टर मेहरा के पास कोई शब्द नहीं थे। उन्होंने चुपचाप सिर झुकाया और कार में बैठ गए। आर्यन ने पीछे मुड़कर देखा। रघु काका अब दूसरे बच्चों को आइसक्रीम बांट रहे थे। उस दिन आर्यन को समझ आ गया कि असली 'हीरो' वो नहीं जिसके पास महंगी कार हो, बल्कि वो है जिसके पास साफ़ दिल हो।
इस कहानी से सीख (Moral)
इस कहानी से हमें यह सबक मिलता है:
किसी को जज न करें (Don't Judge): इंसान की पहचान उसके कपड़ों या काम से नहीं, बल्कि उसके चरित्र से होती है।
ईमानदारी सबसे बड़ा धन है: पैसा तो आता-जाता रहता है, लेकिन ईमानदारी से कमाया गया सम्मान हमेशा रहता है।
Wikipedia Link
अधिक जानकारी के लिए देखें: ईमानदारी - विकिपीडिया
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