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रंक से राजा: ईमानदार दीपक और सुवर्णपुर का असली उत्तराधिकारी - बच्चों के लिए कहानी

पढ़िए 'रंक से राजा' बनने की एक प्रेरणादायक कहानी। जानिए कैसे एक गरीब खिलौने बेचने वाले लड़के दीपक ने अपनी ईमानदारी और सच्चाई के दम पर सुवर्णपुर का सिंहासन जीता।

By Lotpot
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सुवर्णपुर का संकट और राजा की चिंता

हिमालय की तलहटी में बसा 'सुवर्णपुर' एक बहुत ही समृद्ध राज्य था। यहाँ के राजा, महाराज भूपेंद्र, अपनी न्यायप्रियता के लिए मशहूर थे। प्रजा सुखी थी, लेकिन राजा के मन में एक गहरी चिंता थी। उनकी कोई संतान नहीं थी और उनकी उम्र बढ़ती जा रही थी। वे चाहते थे कि उनके बाद राज्य की बागडोर किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ में हो जो न केवल बुद्धिमान हो, बल्कि जिसका चरित्र कांच की तरह साफ़ हो।

राजा ने फैसला किया कि वे पूरे राज्य के बच्चों के बीच एक अनोखी परीक्षा लेंगे। उन्होंने घोषणा करवाई, "राज्य का जो भी बच्चा इस परीक्षा में सफल होगा, उसे मेरा उत्तराधिकारी और सुवर्णपुर का भावी राजा बनाया जाएगा।"

दीपक: एक साधारण खिलौने बेचने वाला (रंक)

उसी राज्य के एक छोटे से कोने में दीपक नाम का एक लड़का रहता था। वह अनाथ था और मिट्टी के छोटे-छोटे खिलौने बनाकर बाज़ार में बेचता था। उसकी झोपड़ी टूटी-फूटी थी और उसके पास खाने के लिए कभी-कभी केवल एक वक्त की रोटी होती थी। लोग उसे 'रंक' (गरीब) कहकर बुलाते थे, लेकिन दीपक के पास एक बेशकीमती खज़ाना था—उसकी सच्चाई। वह कभी झूठ नहीं बोलता था और दूसरों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहता था।

जब राजा की घोषणा दीपक के कानों तक पहुँची, तो उसने भी इस परीक्षा में हिस्सा लेने की ठानी। उसे राजा बनने का लालच नहीं था, वह बस यह देखना चाहता था कि महाराज की वह जादुई परीक्षा है क्या।

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अनोखी परीक्षा: 'चमत्कारी बीज' का रहस्य

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निर्धारित दिन पर, राज्य के हज़ारों बच्चे राजमहल के सामने जमा हुए। राजा भूपेंद्र ने सबको संबोधित करते हुए कहा, "मेरे प्यारे बच्चों! मैं आप सबको एक-एक विशेष 'जादुई बीज' दे रहा हूँ। आपको इसे एक साल तक एक गमले में उगाना है। जिसकी फसल सबसे सुंदर और अनोखी होगी, वही इस राज्य का राजा बनेगा।"

दीपक को भी एक छोटा सा, भूरे रंग का बीज मिला। वह बड़ी खुशी के साथ उसे घर ले आया। उसने एक साफ़ मिट्टी का गमला तैयार किया और बड़ी श्रद्धा से उस बीज को बो दिया। वह रोज़ सुबह-शाम उस बीज को पानी देता, धूप दिखाता और उसके अंकुरित होने का इंतज़ार करता।

इंतज़ार और निराशा का दौर

एक महीना बीत गया, दो महीने बीते, फिर छह महीने बीत गए। लेकिन दीपक के गमले में कुछ नहीं उगा। दूसरी ओर, गाँव के बाकी बच्चे शेखी बघार रहे थे। कोई कह रहा था, "मेरे गमले में तो नीले रंग के फूल खिले हैं," तो कोई कह रहा था, "मेरे पौधे की पत्तियाँ सोने जैसी चमक रही हैं।"

दीपक बहुत दुखी था। उसने सोचा, "शायद मुझसे ही कोई गलती हुई है। मैंने तो बीज का पूरा ख्याल रखा, फिर भी यह अंकुरित क्यों नहीं हुआ?" उसके दोस्तों ने उसे सलाह दी कि वह बाज़ार से कोई दूसरा बीज लेकर बो दे, ताकि राजा को पता न चले। लेकिन दीपक ने मना कर दिया। उसने कहा, "चाहे जो हो जाए, मैं सच्चाई का साथ नहीं छोड़ूँगा। अगर राजा का दिया बीज नहीं उगा, तो मैं खाली गमला ही लेकर जाऊँगा।"

न्याय का दिन: खाली गमला बनाम सुंदर फूल

एक साल पूरा हुआ। सभी बच्चे अपने-अपने पौधों के साथ राजमहल पहुँचे। महल का प्रांगण रंग-बिरंगे फूलों और खुशबूदार पौधों से भर गया था। कोई बच्चा लाल फूलों वाला पौधा लाया था, तो कोई अजीबोगरीब आकृतियों वाले फल।

दीपक भी वहाँ पहुँचा, लेकिन उसके हाथ में एक खाली गमला था जिसमें सिर्फ गीली मिट्टी थी। उसे देखकर दूसरे बच्चे हँसने लगे। "अरे देखो! यह रंक क्या लेकर आया है? इसके गमले में तो घास भी नहीं उगी!"

राजा भूपेंद्र एक-एक करके सभी बच्चों के पौधों को देखने लगे। वे मुस्कुरा तो रहे थे, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी उदासी थी। अंत में, वे दीपक के पास पहुँचे। दीपक ने शर्म के मारे अपना सिर झुका लिया।

राजा ने पूछा, "बेटा, तुम्हारा पौधा कहाँ है?"

दीपक ने कांपती आवाज़ में कहा, "महाराज, मैंने पूरे साल मेहनत की। इसे सही समय पर पानी और खाद दी, पर यह बीज नहीं उगा। मुझे क्षमा करें, मैं असफल रहा।"

सच्चाई का पुरस्कार: रंक से राजा बनने का सफर

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अचानक राजा के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान खिल उठी। उन्होंने दीपक का हाथ पकड़ा और उसे ऊँचे सिंहासन के पास ले गए। राजा ने घोषणा की, "मेरे प्यारे देशवासियों! मुझे सुवर्णपुर का नया राजा मिल गया है। दीपक ही इस राज्य का उत्तराधिकारी होगा।"

सब सन्न रह गए। एक दरबारी ने हिम्मत करके पूछा, "महाराज, यह कैसे संभव है? इसके गमले में तो कुछ भी नहीं है, जबकि बाकी बच्चों के पास कितने सुंदर फूल हैं!"

राजा हँसे और बोले, "यही तो इस परीक्षा का रहस्य था। जो बीज मैंने आप सबको दिए थे, उन्हें मैंने पहले ही उबाल दिया था। उबले हुए बीज कभी उग नहीं सकते। यहाँ मौजूद बाकी सभी बच्चों ने जब देखा कि उनका बीज नहीं उग रहा, तो उन्होंने झूठ का सहारा लिया और बाज़ार से दूसरे पौधे लाकर मेरे सामने रख दिए। केवल दीपक ही वह बच्चा है जिसने ईमानदारी दिखाई और खाली गमला लाने की हिम्मत जुटाई। एक राजा के लिए चतुराई से ज़्यादा उसकी सच्चाई और ईमानदारी ज़रूरी है।"

पूरा दरबार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। वह रंक बालक दीपक, आज अपनी ईमानदारी के कारण सुवर्णपुर का राजा बन गया था।

सीख (Moral of the Story):

सच्चाई और ईमानदारी का रास्ता भले ही कठिन हो, लेकिन अंत में जीत हमेशा सत्य की ही होती है। सफलता पाने के लिए कभी भी झूठ का सहारा नहीं लेना चाहिए, क्योंकि 'रंक से राजा' वही बनता है जिसका चरित्र अटूट हो। 

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