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सम्राट और बूढ़ा आदमी: बहुत समय पहले की बात है, भारत के प्राचीन शहर पाटलिपुत्र (Pataliputra) में एक बहुत ही शक्तिशाली सम्राट राज्य करता था। उसका नाम था 'सम्राट विक्रमसेन'। विक्रमसेन बहुत ही वीर था, लेकिन उसे लगता था कि इस दुनिया में हर काम सिर्फ अपने फायदे के लिए किया जाता है। वह मानता था कि जो काम हमें आज फल न दे, उसे करना समय की बर्बादी है।
सम्राट अक्सर अपने मंत्रियों से कहता, "हमें केवल वही योजनाएं बनानी चाहिए जिनका लाभ मुझे मेरे जीवनकाल में मिल सके। भविष्य किसने देखा है?" राज्य में सब उसकी बात मानते थे, लेकिन एक दिन एक साधारण बूढ़े आदमी ने सम्राट की सोच को बदल दिया।
बूढ़े आदमी की लगन
एक दिन सम्राट विक्रमसेन अपने रथ पर सवार होकर राज्य का दौरा कर रहे थे। रास्ते में एक छोटे से गाँव से गुजरते समय उनकी नज़र एक बहुत ही बुजुर्ग आदमी पर पड़ी। वह आदमी लगभग 80 साल का होगा। उसकी कमर झुक गई थी, बाल पूरी तरह सफेद थे और हाथ कांप रहे थे।
फिर भी, वह कड़ी धूप में पसीना बहाते हुए सड़क के किनारे गड्ढा खोद रहा था और एक नन्हा सा आम का पौधा लगा रहा था। सम्राट को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने रथ रुकवाया और उस बूढ़े आदमी के पास गए।
सम्राट ने हँसते हुए पूछा, "बाबा! आपकी उम्र तो देखिए। आप एक पैर कब्र में लटकाए बैठे हैं और यहाँ आम का पौधा लगा रहे हैं? क्या आपको लगता है कि आप इसके फल खाने के लिए जिंदा रहेंगे?"
निस्वार्थ कर्म का पाठ
बूढ़ा आदमी रुका, उसने माथे से पसीना पोंछा और मुस्कुराते हुए सम्राट की ओर देखा। उसने बहुत ही शांत स्वर में कहा, "महाराज! आप सही कह रहे हैं। मैं शायद इसके फल खाने के लिए जीवित न रहूँ। लेकिन क्या मैं सिर्फ अपने लिए ही जीता हूँ?"
सम्राट हैरान रह गए। "मतलब?"
बूढ़े ने समझाया, "महाराज, आज जिन पेड़ों के मीठे आम मैंने खाए हैं, क्या वे मैंने लगाए थे? नहीं, वे मेरे पूर्वजों ने लगाए थे। अगर उन्होंने सिर्फ अपने बारे में सोचा होता, तो आज मुझे और मेरे बच्चों को फल नहीं मिलते। मैं यह पेड़ इसलिए लगा रहा हूँ ताकि मेरे जाने के बाद, मेरे पोते-पोतियां और राहगीर इसके फल खा सकें और मुझे याद कर सकें। यह मेरे लिए नहीं, आने वाली पीढ़ी के लिए है।"
यह बात सम्राट के दिल में सीधे उतर गई। उन्होंने कभी इस तरह से सोचा ही नहीं था। वह हमेशा 'आज' के फायदे में खोए रहते थे, जबकि यह साधारण बूढ़ा आदमी 'कल' के लिए मेहनत कर रहा था, बिना किसी लालच के।
सम्राट का बदलाव और इनाम
सम्राट विक्रमसेन की आँखों से घमंड का पर्दा हट गया। उन्हें एहसास हुआ कि असली महानता अपने लिए जीने में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए कुछ करके जाने में है। सम्राट ने सम्मान से सिर झुकाया और कहा, "बाबा, आप मुझसे भी बड़े राजा हैं। आपका दिल सोने का है।"
सम्राट ने अपनी जेब से सोने के सिक्कों की एक थैली निकाली और बूढ़े आदमी को दे दी। "यह आपकी निस्वार्थ सेवा का छोटा सा इनाम है," सम्राट ने कहा।
बूढ़ा आदमी फिर मुस्कुराया। उसने थैली ली और बोला, "देखा महाराज! मेरे पेड़ ने तो मुझे अभी फल दे दिया। आमतौर पर पेड़ सालों बाद फल देते हैं, लेकिन मेरे इस नन्हे पौधे ने तो मुझे लगाने के तुरंत बाद ही 'सोने के फल' दे दिए।"
सम्राट और उनके मंत्री बूढ़े की हाज़िरजवाबी और सकारात्मक सोच (Positive Thinking) पर बहुत खुश हुए।
कर्म ही पूजा है
सम्राट महल वापस लौटे, लेकिन वह अब पहले जैसे नहीं थे। उन्होंने राज्य में कई ऐसे काम शुरू करवाए जिनका फायदा आने वाली पीढ़ियों को मिलने वाला था - जैसे नहरें खुदवाना, धर्मशालाएं बनवाना और विद्यापीठ खोलना।
बच्चों, हिंदी कहानियां (Hindi Stories) में यह कहानी सबसे खास है क्योंकि यह हमें 'स्वार्थ' से ऊपर उठकर 'परमार्थ' (परोपकार) करना सिखाती है।
इस कहानी से सीख (Moral of the Story):
निस्वार्थ सेवा: हमें केवल अपने लाभ के लिए काम नहीं करना चाहिए, बल्कि दूसरों की भलाई के लिए भी सोचना चाहिए।
भविष्य की चिंता: आज हम जो अच्छे काम करेंगे, उसका फल हमारी आने वाली पीढ़ियों को मिलेगा।
सकारात्मक सोच: हर काम में अच्छाई देखना ही सुखी जीवन का मंत्र है।
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